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झारखंड डीएमएफ में 3700 करोड़ हुए जमा, लाभार्थियों की पहचान के बिना 1744 करोड़ खर्च

ओड़िशा के बाद सबसे ज्यादा 3700 करोड़ का कलेक्शन हुआ है झारखंड में

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Ranchi: राज्य के खनन प्रभावित क्षेत्र में पेयजल की समस्या काफी विकराल है. शुद्ध पेयजल की उपलब्धता खनन वाले इलाकों में सबसे कम है. जिसके कारण क्षेत्र में रहनेवाले लोग कई गंभीर रोगों का शिकार हो रहे हैं. यह स्थिति किसी खास क्षेत्र की नहीं बल्कि राज्य के अधिकांश खनन क्षेत्रों की है.

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खनन क्षेत्रों में रहनेवाले लोगों की सुविधा के लिए 2015 में केन्द्रीय खान और खनिज विकास और विनिमय अधिनियम 1957 में संशोधन कर डिस्ट्रिक्ट खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) का गठन करने का प्रवाधन किया गया. इसमें 2015 से पहले दी गयी लीज, पटटे की रॉयल्टी राशि का तीस प्रतिशत और इसके बाद की लीज के लिए 10 प्रतिशत रॉयल्टी राशि खनन क्षेत्र के लाभार्थियों को पहचान कर खर्च करने की बात कही गयी है. इसे देखते हुए झारखंड के सभी 24 जिलों में डीएमएफ का गठन इसी कानून के तहत किया गया है. जिसका कार्य खनन क्षेत्र के लोगों के जीवनस्तर को ऊपर उठाना है.

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बड़ा सवाल उठ रहा है

झारखंड में डीएमएफ के तहत देश में ओड़िशा के बाद सबसे ज्यादा 3700 करोड़ का कलेक्शन किया जा चुका है. इसमें 1744 करोड़ 2015 के मार्च से अब तक सिर्फ पेयजल और स्वच्छता के लिए खर्च किये जा चुके हैं. लेकिन राशि खर्च करने के लिए किसी भी जिला में इसकी पहचान नहीं की गयी. सवाल है कि आखिर जब लाभार्थी की शिनाख्त ही नहीं है, तो इतनी बड़ी राशि किन इलाकों में खर्च की जा रही है. यदि राशि खर्च हो रही है तो खनन से प्रभावित लोगों को क्या लाभ मिल रहा है. झारखंड में डीएमएफ को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है.

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क्या है नियम राशि खर्च करने के लिए

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प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना के मार्गदर्शन के अनुसार खर्च किया जाना है. प्राथमिकता निर्धारण उन योजनाओं के लिए की जानी है जो खनन प्रभावित क्षेत्र में समस्या के रूप में मौजूद हैं. खनिज फाउण्डेशन ट्रस्ट से संचालित योजनाओं की तकनीकी स्वीकृति जरूरी है. साथ ही वार्षिक अंकेक्षण करना भी जरूरी है. कानून के मुताबिक हर जिले में एक डीएमएफ कार्यालय होना चाहिए, लेकिन झारखंड के किसी भी जिले में कार्यालय नहीं है, जो नियम के विरुद्ध है.

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किनके लिए खनिज फाउण्डेशन ट्रस्ट की राशि की जानी है खर्च

खनन क्षेत्र में रहनेवाली आबादी को डीएमएफ का लाभ प्राथमिकता के आधार पर मिलना है, जो कि नहीं मिल पा रहा है. सही मायने में डीएमएफ की राशि का उपयोग राज्य में किया जाये तो खनन क्षेत्र की तकदीर बदल सकती है. राज्य में सबसे अधिक कोयला से प्राप्त रॉयल्टी डीएमएफ निधि में आता है.

डीएमएफ का अपने नियम और कानून की भावना के अनुरूप अनुपालन भी राज्य में नहीं किया जा रहा है. अब तक हुए खर्च का बड़ा हिस्सा जलापूर्ति योजनाओं पर किया गया है, जो धरातल पर भी नहीं उतर सका. बड़ी पेयजल परियोजनाओं में 279 करोड़ खर्च किये जा चुके हैं, वहीं शौचालय निर्माण में 233 करोड़ खर्च हुए हैं.

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