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झारखंड डीजीपी नियुक्ति विवादः उगिलत लीलत प्रीत घनेरी…

Baijnath Mishra

शुक्रवार की शाम झारखंड सरकार की एक अधिसूचना प्रकाश में आयी. इसमें कहा गया है कि झारखंड के वर्तमान डीजीपी नीरज सिन्हा 11 फरवरी 2023 तक अपने पद पर बने रहेंगे. यानी वह बतौर डीजीपी 2 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. वैसे नीरज सिन्हा 31 जनवरी 2022 को रिटायर होनेवाले थे. इस प्रकार वह 60 साल में नहीं 61 साल की उम्र में रिटायर होंगे.

झारखंड सरकार की अधिसूचना पर 13 जुलाई की तिथि अंकित है, जबकि वह प्रकाश में आयी है 16 जुलाई को. आमतौर पर इसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन खास बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई को ही झारखंड सरकार से पूछ लिया है कि कमल नयन चौबे को न्यूनतम 2 साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही डीजीपी पद से क्यों हटा दिया गया. राज्य सरकार इस सवाल का क्या जवाब देगी और सुप्रीम अदालत उससे कितना संतुष्ट होगी, यह अभी विचारणीय विषय नहीं है. दरअसल राजेश कुमार नामक एक व्यक्ति ने झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाया है.

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उसी याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार तथा यूपीएससी को नोटिस भेज कर जवाब मांगा है. संभवतः कोर्ट की सख्ती के मद्देनजर ही जैसी नीरज सिन्हा को फिक्सड टर्म (दो साल) तक डीजीपी बने रहने की अधिसूचना जारी की गयी है. अब सवाल यह है कि क्या इतने भर से काम चल जायेगा और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला खत्म हो जायेगा?

वस्तुतः झारखंड सरकार ने डीजीपी नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दो बार अवहेलना यानी अवमानना की है. पहला केएन चौबे को 2 साल से पहले डीजीपी पद से हटा कर आनन-फानन में एमबी राव को प्रभारी डीजीपी बनाना और दूसरा विहित प्रक्रिया पूरी किये बिना नीरज सिन्हा को डीजीपी की कुर्सी पर बैठाना. याचिकाकर्ता ने इन दोनों नियुक्तियों को न्यायालय की अवमानना बताया है. प्रकाश सिंह बनाम अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट आदेश दे चुका है कि राज्य के डीजीपी का कार्यकाल कम से कम 2 साल का होगा.

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दूसरी ओर डीजीपी नियुक्ति की एक प्रक्रिया यूपीएससी से भी जुड़ी है. राज्य सरकारों को उन्हीं अधिकारियों के पैनल में से किसी एक को डीजीपी बनाने का अधिकार होता है, जिस पैनल की संपुष्टि यूपीएससी ने कर दी हो. इन दोनों कसौटियों पर कसें तो झारखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को तो ठेंगा दिखाया ही है, यूपीएससी की सूचीबद्धता की अनिवार्यता को भी दरकिनार कर दिया है. इस पूरे प्रकरण में कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी है. मई 2019 में डीके पांडेय के रिटायर करने के बाद 31 मई 2019 को केएन चौबे झारखंड के डीजीपी बने थे. उनका नाम उस समय यूपीएससी से संस्तुत पैनल में था.

उस पैनल में वीएच देशमुख और नीरज सिन्हा का भी नाम था. जब केएन चौबे मई 2019 में डीजीपी बन गये तब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार उन्हें मई 2021 तक डीजीपी बने रहना चाहिए था, लेकिन राज्य सरकार ने मार्च, 2020 में केएन चौबे को हटा दिया और सर्वगुणसंपन्न एमवी राव को प्रभारी डीजीपी बना दिया. क्यों, इसका कोई विश्वसनीय या तार्किक कारण राज्य सरकार ने अब तक नहीं बताया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को तो बताना ही पड़ेगा.

अब सवाल यह है कि क्या एक बार कोई अधिकारी डीजीपी बन जाये तो उसे 2 साल से पहले नहीं हटाया जा सकता है? इसके लिए भी कुछ दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं. यदि कोई डीजीपी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चला जाये या जाना चाहे या वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ले या वह मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो जाये या वह किसी आपराधिक मामले में अदालत द्वारा दोषी ठहरा दिया जाये.

तो राज्य सरकारें उस डीजीपी को हटा कर 2 साल से पहले भी नया डीजीपी नियुक्त कर सकेंगी. लेकिन इसके लिए भी यूपीएससी के पास वरीय अधिकारियों की सूची भेजनी होगी और वहां से संस्तुत सूची में से ही किसी अधिकारी को नया डीजीपी बनाना होगा. परन्तु केएन चौबे न तो बीमार थे, न उन्होंने वीआरएस लिया न वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गये, न ही उन पर कोई आरोप लगा और न वे दोषी ठहराये गये. फिर उन्हें हटाया क्यों गया. यह सवाल यूपीएससी लगातार पूछ रही है. और अब तो यही प्रश्न सुप्रीम कोर्ट ने भी पूछ लिया है. गौरतलब यह भी है कि एमवी राव को कंफर्म डीजीपी बनाने के लिए यूपीएससी के पास वरीय अधिकारियों की सूची तब भेजी गयी, जब वीएस देशमुख और पीआरके नायडू रिटायर हो गये, क्योंकि ये दोनों अधिकारी एमवी राव से सीनियर थे.

एमवी राव को डीजीपी बनाने के लिए जो सूची भेजी गयी उसमें नीरज सिन्हा, एमवी राव, एसएन प्रधान, अजय भटनागर और अजय सिंह के नाम थे. यूपीएससी ने इन नामों पर गौर करने तथा नया पैनल भेजने के बदले राज्य सरकार से वही सवाल पूछ लिया कि केएन चौबे को हटाया क्यों? इस उधेड़बुन और उलझन के बीच राज्य सरकार ने फरवरी 2021 में एमवी राव को बैक टू पवेलियन करते हुए नीरज सिन्हा को डीजीपी बना दिया. एमवी राव को डीजीपी किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाया गया था और कौन सा मनोरथ पूरा नहीं करने या उद्देश्य प्राप्ति में गच्चा देने के कारण उन्हें हटाया गया. यह तो राव और सरकार के मुखिया ही जानते होंगे.

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लेकिन नीरज सिन्हा को कन्फर्म डीजीपी बनाने के लिए अधिकारियों का नया पैनल यूपीएससी को भेजना चाहिए था और वहां से संस्तुति मिलने के बाद ही उनकी नियुक्ति होनी चाहिए थी. सरकार तथा उसके खैरख्वाह यह तर्क दे सकते हैं कि जब केएन चौबे वाले पैनल में नीरज सिन्हा का नाम था तब नये पैनल की जरूरत ही नहीं थी. लेकिन वह पैनल तो उसी समय निष्प्रभावी हो गया था, जब एमवी राव के कंफर्ममेशन के लिए नया पैनल भेजा गया था. और उस पैनल पर यूपीएससी ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है. वैसे भी इस पैनल में एमवी राव का भी नाम था जो नयी सूची में नहीं हो सकता है. इसलिए अधिकारियों के नये नामों की सूची भेजनी चाहिए थी. लेकिन राज्य सरकार पुराने पैनल के तर्क पर ही कायम है.

बहरहाल देखना यह है कि यूपीएससी सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब देती है और राज्य सरकार अपना बचाव किस प्रकार करती है तथा सुप्रीम कोर्ट क्या निर्णय देता है. लेकिन इतना तय है कि एमवी राव को नियम विरुद्ध डीजीपी बना कर राज्य सरकार ने जो अविवेकी कृत्य किया था, उसकी अनुगूंज अभी मद्धिम नहीं पड़ी है. नीरज सिन्हा को 2 साल तक बतौर डीजीपी बरकरार रखने की अधिसूचना जारी कर राज्य सरकार ने पुरानी गलती सुधारने की एक कोशिश जरूर की है, लेकिन यह तो सब जानते हैं कि फटे हुए दूध को चाहे जितना मथ लो मक्खन नहीं बनता है. झारखंड सरकारकी स्थिति ऐसी हो गयी है कि वह इस पूरे प्रकरण से न तो पल्ला झाड़ सकती है औऱ न ही अपने निर्णय को सही ठहरा सकती है. इसी को कहते हैं- भई गति सांप छछुंदर केरी, उगिलत लीलत प्रीत घनेरी…

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