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झारखंड : चाइल्ड केयर प्रोग्राम में दूसरे राज्यों की तुलना में आधे पैसों पर काम कर रहे कॉन्ट्रैक्ट कर्मी, राज्यपाल से शिकायत

Ranchi : राज्य में बाल ट्रैफिकिंग, बाल विवाह, बाल श्रमिक सहित बच्चों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर राज्य सरकार गंभीरता नहीं दिखा रही. आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण ऐसे विषय लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं. बावजूद इसके राज्य में जिला बाल संरक्षण इकाई और राज्य बाल संरक्षण इकाई को मजबूत किये जाने पर सकारात्म रूख देखने को नहीं मिल रहा है.

झारखंड राज्य अनुबंध कर्मचारी महासंघ, रांची ने इस पर चिंता जतायी है. महासंघ के मुताबिक बाल संरक्षण इकाईयों को ही लावारिस इकाई के तौर पर सरकार देख रही है. विभागीय स्तर से बाल कल्याण के दायित्वों को देखने को पूर्ण कालीन सचिव, निदेशक एवं कार्यालय कर्मी तक नहीं हैं.

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इससे बाल कल्याण से संबंधित योजनाओं में जिला से लेकर मुख्यालय तक कर्मियों का अभाव दिख रहा. बाल हित में काम कर रहे संविदा कर्मियों को समय पर मानदेय नहीं मिल रहा. दूसरे राज्यों की तुलना में केंद्र समर्थित प्रोग्राम में यहां के संविदा कर्मी आधे मानदेय पर ही काम करने को विवश हैं. महासंघ के केंद्रीय समिति सदस्य महेश सोरेन ने अब राज्यपाल रमेश बैस को पत्र लिखकर फरियाद लगायी है. कर्मियों के नियमितीकरण के लिये अनुरोध किया है.

 

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श्रम कानून का उल्लंघन

महेश सोरेन के मुताबिक राज्य में बाल संरक्षण के कर्मियों, पदाधिकारियों को वर्तमान में मिल रहा मानदेय बेहद कम है. श्रम कानून के तहत तय न्यूनतम वेतन अधिनियम का भी पालन नहीं हो रहा है. पोषण अभियान, प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना, आईसीडीएस, तेजस्विनी सहित प्रोजेक्ट में काम कर रहे कर्मियों की तुलना में बाल संरक्षण के काम में लगे कर्मियों का मानदेय अन्यायपूर्ण है. ऐसे में उनके मासिक मानदेय के फिर से पुनर्निर्धारण की जरूरत है.

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आंध्र प्रदेश में कंप्यूटर ऑपरेटरों और आउटरीच कार्यकर्ता को 16,400 से 49,870 रुपया तक प्रतिमाह दिया जाता है. बिहार में इसके लिये 12,000 से 21 हजार तक मिलते हैं. मणिपुर में तो ग्रेड पे के साथ सभी कर्मियों को स्थायी कर दिया गया है. अकाउंटेंट, आंकड़ा विश्लेषक, सामाजिक कार्यकर्ता को बिहार में 21 हजार से 25 हजार तक दिये जाते हैं. आंध्र प्रदेश में इसके लिये 18,400 से 55,410 रुपये तक का मानदेय तय है. वहीं झारखंड में मात्र 14,000 रुपये दिये जाते हैं. यानि दूसरे राज्यों की तुलना में यहां पर संविदा कर्मी आधे से भी कम मानदेय पर काम कर रहे हैं.

कॉन्ट्रैक्ट वर्करों के साथ भेदभाव

महासंघ ने राज्यपाल से शिकायत करते हुए कहा है कि बाल संरक्षण से जुड़े कर्मियों, पदाधिकारियों के मसले पर कई स्तरों पर बात रखी गयी है. पर समाज कल्याण विभाग सहित किसी की रुचि इस समस्या के निदान में नहीं है. आवेदनों को डम्प कर फेंक दिया जाता है और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती. स्थायी कर्मियों, पदाधिकारियों का रवैया कॉन्ट्रैक्ट वर्करों के मामले में बहुत ही खराब है. ऐसे में राज्यपाल के स्तर से पहल होने पर सकारात्मक परिणाम होंगे.

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