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शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही

चंद्रमौलि

पिछले एक हफ्ते से झारखंड की हेमंत सरकार को गिराने की साजिश की जांच चल रही है. इस सिलसिले में झारखंड पुलिस दिल्ली, मुंबई में छानबीन कर रही है. लेकिन अभी तक वह ना तो कुछ छान पाई है, न बीन पाई है. इसी बीच कांग्रेस विधायक दल के नेता आलमगीर आलम और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सह राज्य के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव ने अपने उन विधायकों को क्लीन चिट दे दी है जिनकी भूमिका को संदेहास्पद मानते हुए सरकार इस मामले की जांच करा रही है. इस प्रकरण में कांग्रेस विधायक इरफान अंसारी और उमाशंकर अकेला तथा निर्दलीय विधायक अमित यादव का नाम सामने आया है. इन विधायकों पर आरोप है कि वे सरकार गिराने में शामिल कथित बिचौलियों के साथ एक ही पीएनआर के हवाई टिकट पर दिल्ली गए थे. वहां एक होटल में साथ ठहरे थे और वहीं महाराष्ट्र के दो नेताओं से मिले थे जिनके संबंध भाजपा से हैं. इस प्रकरण में पुलिस गिरफ्त में आए तीन लोगों में से एक अभिषेक दुबे ने अपने स्वीकारोक्ति बयान में तो यह बताया ही है, दिल्ली गई पुलिस टीम ने भी इसकी पुष्टि की है.

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लेकिन अब झारखंड सरकार के दो वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्री अपने विधायकों को दुग्ध धवल बता रहे हैं और कह रहे हैं कि किसी के टिकट पर किसी के साथ यात्रा करना तथा होटल में ठहरना सरकार गिराने की साजिश का प्रमाण नहीं है. यह महज संयोग है, कोई प्रयोग नहीं है. लेकिन इन दोनों महानुभावों ने अपने विधायक जयमंगल सिंह उर्फ अनूप सिंह से यह पूछना जरूरी नहीं समझा कि उन्होंने बिना किसी ठोस प्रमाण के सरकार गिराने की साजिश की प्राथमिकी कोतवाली में क्यों दर्ज कराई? इन दिग्गज नेताओं ने यह कहना भी मुनासिब नहीं समझा कि इस प्रकरण में गिरफ्तार तीनों लोग बेकुसूर हैं. विपक्ष शुरू से कह रहा है कि सब्जी-फल बेचने वाले, मजदूरी करने वाले लोग भला सरकार गिराने की साजिश रचने की हिमाकत कैसे कर सकते हैं? यह भी कि इनके पास से बरामद मात्र दो लाख रुपये में कितने विधायक खरीदे-बेचे जा सकते हैं?

अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस के दोनों इंगित विधायक निर्दोष हैं तो फिर दोष किसका है? इन विधायकों को आरोपी बनाये बगैर इस साजिश की कहानी आगे बढ़ेगी कैसे? क्या मामला कुछ और है और कहानी कुछ और बताई जा रही है? यदि ऐसा नहीं है तो जनाब आलमगीर साहब और रामेश्वर उरांव को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को बताना चाहिए कि यह मामला हवा-हवाई है, अटकलबाजी पर आधारित है, लिहाजा पुलिस की अग्रेतर जांच बंद करानी चाहिए, सरकार का पैसा बचाना चाहिए और दर्ज प्राथमिकी में फाइनल रिपोर्ट दाखिल करते हुए गिरफ्तार लोगों को छोड़ देना चाहिए. लेकिन कांग्रेस के नेता ऐसा नहीं कह रहे हैं. वे केवल अपने विधायकों को क्लीन चिट दे रहे हैं जो या तो एकपक्षीय है या फिर छलावा.

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लाजिमी तौर पर सवाल यह भी है यदि कोतवाली में दर्ज प्राथमिकी गलत साबित हुई तो क्या प्राथमिकी दर्ज कराने वाले के खिलाफ पुलिस कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगी? यानी ऐसे पेचों का खुलना अभी बाकी है. मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार आलमगीर आलम ने यह भी कहा है कि भाजपा सरकार गिराने की साजिश में लगी हुई है और कांग्रेस विधायकों को प्रलोभन देती रहती है. यानी आलम साहब मानते हैं कि हेमंत सरकार में कांग्रेस एक कमजोर कड़ी है. झामुमो नेता भी कहते रहे हैं कि कांग्रेस अपना घर दुरुस्त रखे. लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या भाजपा झारखंड में इस स्थिति में है कि वह हेमंत सरकार गिरा कर अपनी सरकार बना ले?

विधानसभा में सदस्यों के आंकड़े इसकी गवाही नहीं देते हैं. भाजपा यदि कांग्रेस के एक दर्जन विधायकों को तोड़ भी दे, तो उसकी सरकार नहीं बन पाएगी. मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गोवा में तख्तापलट इसलिए संभव हो सका कि वहां भाजपा बहुमत के करीब थी और इस्तीफा देने वाले विधायकों को अपने सिंबल पर जिताने की हैसियत भी रखती थी. झारखंड में वह स्थिति नहीं है. दूसरी बात यह है कि भाजपा इस समय चतुर्दिक समस्याओं से स्वयं घिरी हुई है इसलिए वह झारखंड सरकार को अस्थिर करने से दूर ही रहना चाहेगी.

तीसरी और आखिरी बात यह है कि यदि भाजपा कुछ करना भी चाहेगी तो उसकी भनक सरकार के कारिंदों को तब लगेगी जब मिशन पूरा होने की स्थिति में आ जाएगा. इसलिए बराय मेहरबानी इस किस्सा-ए-हातिमताई का पटाक्षेप हो जाना चाहिए. शीशे की अदालत में पत्थरों की गवाहियां सिर्फ और सिर्फ नुकसान ही करती हैं.

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