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Jharkhand: बोर्ड-निगमों के गठन को लेकर सीएम तैयार, कांग्रेस-राजद को सता रहा है कुनबा भरभराने का डर

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Ranchi: झारखंड में बोर्ड निगमों के गठन का मामला मुख्यमंत्री के कारण नहीं रुका हुआ है. इसके गठन नहीं के पीछे सहयोगी दलों का आंतरिक कलह है. राज्य में बोर्ड निगम के गठन को लेकर महागठबंधन में शामिल दल झामुमो, कांग्रेस और राजद ने कई दौर की बैठक की. बैठक के बाद जिलावार बंटवारा भी हो गया था लेकिन लगभग तीन महीने का समय बीत जाने के बाद भी यह तिलिस्म अबतक नहीं खुला है.

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पहले यह कहा जा रहा था कि मुख्यमंत्री के कारण बोर्ड-निगमों के गठन का मामला अटका हुआ है. जबकि सच्चाई कुछ और ही है. दरअसल, सरकार में शामिल सहयोगी दल कांग्रेस और राजद इसको लेकर अंदरूनी राजनीति कर रहे हैं. दोनों ही दलों को यह भय सता रहा है कि यदि बोर्ड-निगमों के गठन का मामला सलत जाएगा तो उनका कुनबा भरभरा सकता है.

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सहयोगी दलों से पूछिए मुख्यमंत्री तैयार नहीं हैं क्या : हेमंत

लगातार यह खबर सामने आ रही थी कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के कारण राज्य में बोर्ड- निगमों, 20 सूत्री और निगरानी कमेटी का गठन नहीं हो रहा है. 28 दिसंबर को मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस तरह की खबर को एक सिरे से ख़ारिज किया और साफ़ शब्दों में कहा कि सहयोगी दलों से पूछिए कि इस मामले पर मुख्यमंत्री तैयार नहीं हैं क्या? कहा कि इस विषय पर सबों को मिलकर निर्णय लेना है. हम हमेशा तैयार हैं. पहले नाम तो तय करके लायें.

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आखिर कहाँ है पेंच

अब सवाल यह उठता है कि जब मुख्यमंत्री बोर्ड-निगमों के गठन को लेकर तैयार हैं तो पेंच कहाँ है. झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं की बैठक में यह तय हुआ था कि 13 जिला झामुमो को, 10 जिला कांग्र्तेस और एक जिला राजद के खाते में जाएगा. यह निर्णय कोई अदना नेताओं की बैठक में नहीं हुआ था बल्कि कांग्रेस की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर थे, झामुमो की तरफ से स्टीफन मरांडी, मथुरा महतो और चम्पई सोरेन जैसे नेता थे. इसके बाद उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि सबकुछ तय हो गया है और जल्द घोषणा हो जायेगी. अबतक बैठक पर अमल नहीं हुआ.

यहाँ गौर करनेवाली बात यह है कि महागठबंधन में शामिल सभी दलों के कार्यकलापों पर नजर डालें तो यह साफ़ है कि इसमें अबतक सबसे ज्यादा अनुशासित झामुमो के ही नेता और कार्यकर्ता हैं. पिछले दो वर्षों में दर्जनों बार बोर्ड-निगमों के गठन को लेकर सहयोगी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के द्वारा मांग हुई लेकिन झामुमो की तरफ से कभी मांग नहीं की गयी.

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झामुमो के किसी भी नेता ने कभी इसको लेकर दवाब नहीं बनाया. ना ही कभी झामुमो के किसी विधायक ने इसको लेकर मुख्यमंत्री के समक्ष नाराजगी जाहिर की. सबसे ज्यादा आवाज कांग्रेस की तरफ से उठा. राजद भी कभी कभार बोलता रहा. अब सबसे ज्यादा डर कांग्रेस पार्टी को इस बात का है कि बोर्ड-निगमों के बंटवारे के बाद उनकी पार्टी में ही महाभारत ही न शुरू हो जाए. यही वजह है कि अभी यह मामला ठन्डे बस्ते में दिख रहा है.

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