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झारखंड: नहीं उठ रही बच्चों के अधिकारों की आवाज, 5 माह से रामभरोसे बाल संरक्षण आयोग

Ranchi : झारखंड में नहीं उठ रही बच्चों के अधिकारों की आवाज क्योंकि झारखंड बाल संरक्षण आयोग पर झारखंड सरकार ध्यान नहीं दे रही है. जिसका परिणाम ये है कि करीब पांच महीने से योग के अध्यक्ष सहित सभी पद खाली पड़े हुए हैं.

अप्रैल महीने में आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब तक सरकार की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया गया है.

ऐसे में बच्चों के अधिकार और उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार के रवैये पर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि बताया जा रहा है कि सरकार ने बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और सदस्य पद के लिए आवेदन निकाले है.

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आयोग में कुल 7 पद स्वीकृत

झारखंड बाल संरक्षण आयोग में एक अध्यक्ष सहित कुल सात पद स्वीकृत है. जिनमें पिछले 3 वर्षों से अध्यक्ष सहित तीन सदस्य ही काम कर रहे थे. बाकी के तीन पद खाली पड़े हुए थे.

20 अप्रैल तक 3 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया. जबकि 22 अप्रैल को अध्यक्ष आरती कुजूर का भी कार्यकाल पूरा हो चुका है. जिसके बाद से बाल संरक्षण आयोग के सभी पद खाली पड़े हुए है.

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बाल संरक्षण आयोग का दायित्व

18 वर्ष तक के बच्चों को संवैधानिक अधिकार मुहैया कराने के लिए बाल संरक्षण आयोग का गठन झारखंड में 18 जून 2012 को हुआ. आयोग को राष्ट्रीय स्तर पर तय होने वाली बाल संरक्षण से संबद्ध नीतियों, संचालित कार्यक्रमों और इससे संबद्ध प्रशासनिक गतिविधियों पर सीधे हस्तक्षेप की शक्ति प्रदान की गयी है. व्यवहार न्यायालय की ही तरह बच्चों के अधिकार से जुड़े मामलों की यह सुनवाई कर सकता है.

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मानव तस्करी के शिकार हुए बच्चों की रेस्क्यू पर पड़ रहा असर

झारखंड में एक तरफ जहां ह्यूमन ट्रैफिकर्स के खिलाफ लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तस्कर बेलगाम होते जा रहे हैं. उन्हें रोक पाना पुलिस और प्रशासन के बूते से बाहर की बात नजर आ रही है.

रूरल एरिया के सीधे-साधे लोगों को डरा-धमकाकर और दहशत फैलाकर चुप करा दिया जा रहा है. साथ ही नाबालिग बच्चों को काम के नाम पर दूसरे राज्यों में भेज दिया जा रहा है.

झारखंड में मानव तस्करी का कारोबार जोरों पर है. अमूमन रोजान कोई ना कोई बच्चा मानव तस्करी का शिकार हो रहा है. झारखंड बाल संरक्षण आयोग मानव तस्करी के शिकार हुए बच्चों की रेस्क्यू कराने में अहम भूमिका निभाता है.

लेकिन बाल संरक्षण आयोग के सभी पद खाली रहने के कारण मानव तस्करी के शिकार हुए बच्चों की रेस्क्यू कराने पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है.

वहीं तरह-तरह का झांसा देकर झारखंड के बच्चों की महानगरों में खरीद-बिक्री जारी है. हालांकि, मानव तस्करी के विरुद्ध कार्रवाई भी कम नहीं हुई. लेकिन रेस्क्यू कर लाये गये बच्चे फिर महानगरों तक पहुंच जाते हैं.

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