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#Jharkhand: खुफिया तंत्र की विफलता और पुलिस की लापरवाही के चलते पिछले 8 माह में हुईं 5 बड़ी वारदात

Saurav Singh

Ranchi: 19 जनवरी को पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुदड़ी में हुए सात लोगों का सामूहिक नरसंहार और उसके चार दिन बाद ही लोहरदगा में सीएए के समर्थन में निकाली गयी रैली पर पथराव व आगजनी की घटना ने झारखंड पुलिस की लापरवाही और खुफिया तंत्र की विफलता उजागर की है.

पिछले आठ महीने के दौरान राज्य के लातेहार, सरायकेला में बड़ी नक्सल घटनाएं हुईं. इसकी भी भनक पुलिस और खुफिया तंत्र को नहीं लगी. इन सभी घटनाओं को अंजाम देने की योजना पहले से बन रही थी, लेकिन पुलिस तंत्र बेखबर रहा.

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पुलिस के सूचना तंत्र विफलता का लाभ उठा रहे नक्सली

राज्य के नक्सल प्रभावित जिलों को नक्सल समस्या से मुक्त करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से लाख प्रयास किये जा रहे हों, स्थानीय स्तर पर पुलिस प्रशासन के उदासीन रवैये के कारण केंद्र का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है.

पुलिस व्यवस्था को संचालित करने में नेटवर्क और सूचनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है. पर झारखंड में पुलिस का सूचना तंत्र विफल साबित हो रहा है जिसका लाभ नक्सली उठा रहे हैं.

पिछले आठ महीनों के दौरान राज्य में नक्सलियों ने जिस ढंग से सरायकेला और लातेहार में पुलिसकर्मियों की हत्या की वारदात को अंजाम दिया, उससे यह साफ हो गया है कि उन्हें राज्य की कानून व्यवस्था का कोई डर नहीं.

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खुफिया तंत्र में 1800 जवान और अफसर

राज्य के खुफिया तंत्र में करीब 1800 जवान और अधिकारी काम करते हैं. विशेष शाखा के हेड एडीजी होते हैं. सरकार सबसे भरोसेमंद अधिकारी को इस पद पर तैनात करती है.

एडीजी का काम सूचना एकत्र कर सरकार को अवगत कराना होता है. हर जिले में एक डीएसपी खुफिया तंत्र का इंचार्ज होता है. उसके अधीन थाना स्तर पर दारोगा, इंस्पेक्टर और जवान तैनात रहते हैं.

विशेष शाखा मुख्यालय में एडीजी के अलावा कम से कम तीन डीआइजी, दो आइजी, सात एसपी और 28 डीएसपी तैनात हैं.

सरायकेला में खुफिया विभाग द्वारा सचेत किये जाने के बाद भी नक्सलियों के जाल में फंस गयी थी पुलिस

सरायकेला-खरसावां जिले के खरसावां में पिछले वर्ष मई माह में नक्सलियों ने एक के बाद एक आइईडी विस्फोट करके पुलिस की रणनीति पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया था.

कोल्हान में आइईडी ब्लास्ट की पहले से ही खुफिया रिपोर्ट थी. इसके बावजूद पुलिस नक्सलियों के जाल में फंस गयी.

चुनाव के संबंध में कोल्हान के तीनों जिले के एसपी ने चुनाव ड्यूटी में तैनात पुलिसकर्मियों व सीआरपीएफ जवानों को बकायदा आइईडी ब्लास्ट से बचने का उपाय भी बताये थे.

खुफिया रिपोर्ट में भी अंदेशा जताया गया था कि चुनाव के दौरान नक्सली जिले के कुछ इलाकों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं.

खुफिया तंत्र द्वारा अलर्ट करने के बाद पुलिस ने बरती लापरवाही

बीते वर्ष 14 जून को सरायकेला में नक्सली हमले में पांच जवानों के शहीद होने की घटना के पूर्व खुफिया विभाग ने सरायकेला पुलिस को अलर्ट किया था कि नक्सली पुलिस को निशाना बना सकते हैं और हथियार लूट सकते हैं.

इसके बाद भी पुलिस के स्तर से जो सतर्कता बरतनी चाहिए थी, वह नहीं बरती गयी और पांच जवानों की शहादत के तौर पर परिणाम सामने आया.

हालांकि, नक्सली घटना को तिरुलडीह थाना क्षेत्र में ही अंजाम देंगे, ऐसी कोई जानकारी अलर्ट के दौरान नहीं दी गयी थी.

पूर्व में प्रतिबंधित संगठन भाकपा माओवादी के नक्सलियों की गतिविधि तिरुलडीह में थी. लेकिन लंबे समय से उनके द्वारा इस थाना क्षेत्र में कोई वारदात को अंजाम नहीं दिया गया था.

शायद यही वजह रही कि पुलिस इस थाना क्षेत्र को शांत थाना क्षेत्र मान कर रोजमर्रा के काम तक सीमित रही. जबकि नक्सली अपने योजना बनाकर वारदात को अंजाम देने में कामयाब रहे.

लातेहार में पुलिसकर्मियों पर हमला खुफिया तंत्र की विफलता तो नहीं?

विधानसभा चुनाव के दौरान जहां एक ओर पुलिस केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के साथ नक्सल और उग्रवाद प्रभावित इलाके के जंगलों में अभियान चला रही थी, वहीं दूसरी ओर 22 नवंबर की रात नक्सलियों ने लातेहार जिले के चंदवा थाना क्षेत्र के लुकइया गांव के समीप खड़ी पीसीआर वैन पर हमला कर दिया.

इसमें पुलिसकर्मी और होमगार्ड के चार जवान शहीद हो गये थे. घटना को अंजाम देने के बाद नक्सलियों ने पुलिस और होमगार्ड के जवानों से हथियार भी लूट लिये.

इस मामले की सबसे गंभीर बात है कि नक्सली रवींद्र गंझू का दस्ता चंदवा थाना क्षेत्र के शहरी इलाके में पिछले तीन दिनों से सक्रिय था. लेकिन पुलिस ने उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की.

एक और बात यह भी सामने आयी है कि रवींद्र गंझू का दस्ता घटना से कुछ दिन पूर्व घटनास्थल से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर भी देखा गया था. उसके खिलाफ जंगल के प्रभावित इलाके में अभियान भी चलाया गया था.

लेकिन पुलिस और खुफिया विभाग को इस बात की सूचना नहीं थी कि रवींद्र गंझू पुलिस पर कब और कहां हमला कर सकता है.

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पुलिस और खुफिया तंत्र अगर रहते सतर्क, तो नहीं होती लोहरदगा में पत्थरबाजी

लोहरदगा में 23 जनवरी को सीएए के समर्थन में निकाली गयी रैली में पथराव और फिर उसके बाद बढ़े तनाव के मामलों में पुलिस व खुफिया तंत्र घटना के पहले स्थिति को भांपने में विफल रहे.

सूत्रों का कहना है कि लोहरदगा में सीएए और एनआरसी के पक्ष में निकाले जाने वाले जुलूस की अनुमति जिला प्रशासन ने दी थी.

इसके बाद अगर जुलूस पर पथराव और पथराव के बाद बिगड़ी स्थिति को लेकर जिला प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा तो इतना तय है कि असामाजिक तत्वों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी.

सूत्रों का दावा है कि कई घरों की छतों से पथराव किया गया. कहा जा रहा है कि इस घटना के पूर्व सोशल मीडिया पर कई तरह के आपत्तिजनक पोस्ट किए गये और स्थिति को बिगाड़ने की कोशिश की गयी.

स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस अगर समय रहते सचेत होती तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता था.

पत्थलगड़ी समर्थक और विरोधियों के बीच विवाद की पुलिस को नहीं लगी भनक

पश्चिमी सिंहभूम जिले के गुदड़ी में बीते 19 जनवरी को हुई सात लोगों की हत्या ने झारखंड पुलिस और पूरे खुफिया तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

मिली जानकारी के अनुसार यह घटना का कोई अचानक आवेश में अंजाम दी गयी वारदात नहीं है. इसकी योजना पहले से बनायी गयी होंगी, लेकिन पुलिसिया तंत्र बेखबर रहा.

सूत्रों का दावा है कि बुरुगुलीकेला गांव और आस-पास के इलके में 16 जनवरी के पहले से ही पत्थलगड़ी समर्थकों और विरोधियों के बीच तनाव की स्थिति थी. घटना के दिन दोनों पक्षों में मारपीट भी हुई थी.

मोटरसाइकिल पर सवार होकर कुछ लड़के गांव में आये थे और कई घरों में तोड़फोड़ की थी. मगर इसकी भनक पुलिस को नहीं लग सकी.

19 जनवरी को ग्रामीणों के साथ पत्थलगड़ी समर्थकों की बैठक हुई और विरोध करने वालों को पत्थलगड़ी समर्थकों ने अगवा कर लिया और उन्हें लेकर जंगल चले गये.

पुलिस तीन दिन बाद 22 जनवरी को गांव में तब पहुंची, जब सात लोगों की गर्दन रेतकर हत्या कर दी जा चुकी थी.

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