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Jamtara: कांसे के बर्तन बनाने के कारोबार पर लॉकडाउन की मार, कर्मकारों की माली हालत बिगड़ी

अंबा गांव से बने बर्तन राज्य के अलावे दूसरे राज्यों में भी होते हैं सप्लाई

Jamtara: जामताड़ा जिले में बंगाल बॉर्डर के पास स्थित कुंडहित प्रखंड का अंबा गांव कांसे के बरतन के लिए मशहूर है. यह जिले का एकमात्र ऐसा गांव है जहां यह काम होता है. गांव में मुश्किल से 10 परिवार हैं, जो बारह महीने इसी काम को करते हैं. इसी से इनका सारा जीवन-यापन निर्भर है. लेकिन लॉक डाउन से इनका कारोबार काफी प्रभावित हुआ है. इस वजह से यहां के लोग आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं.

यहां बने कांसे के बर्तन राज्य के अलावे बंगाल भी सप्लाई होते हैं. लेकिन बर्तन बनानेवाले के दिन नही बदले. आज भी ये गुरबत की जिंदगी जी रहे हैं. एक तो पहले से गुरबत की जिंदगी, ऊपर से लॉक डाउन की मार से माली हालात खराब हो गई है.

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ऐसा नहीं है कि ये परिवार हाल फिलहाल इस पेशे से जुड़े हैं. यहां कर्मकार समुदाय के लोग सदियों से यह काम करते आ रहे हैं. एक तरह से कहा जाए तो कर्मकार समुदाय पीढ़ी दर पीढ़ी यहां कांसा का बरतन बनाने का काम करते आ रहे हैं.

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ये कारीगर दुमका से कच्चा माल मंगाते हैं और रोजाना मेहनत कर बर्तन तैयार करते हैं. बदले में इन्हें सिर्फ और सिर्फ मेहनताना मिलता है.

अंबा गांव में कई ऐसी भट्ठियां हैं जहां आप आसानी से बर्तन तैयार होते देख सकते हैं. कर्मकार समुदाय का यह पुश्तैनी धंधा है. कई पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन आज भी यहां कांसा के बर्तन बनाये जाते हैं. अब इस काम में नौजवान भी हाथ बंटाते हैं.

लेकिन लॉक डाउन के कारण आज इनका कारोबार प्रभावित हुआ है. इन्हें आर्थिक परेशानी के दौर से गुजरना पड़ रहा है. इनका कारोबार महीनों बंद रहा, जिससे इनके समक्ष रोजी-रोटी की समस्या उत्पन्न हुई. अब जब लॉक डाउन में छूट मिली है तो फिर से अपनी कारोबार में जुट गए हैं. लेकिन इनके ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ा हुआ है.

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कारोबार से जुड़े पंचानन दे ने कहा कि उनकी कई पीढ़ियां इस कारोबार से जुड़ी रही हैं. पुस्तैनी कारोबार को छोड़ अब दूसरे काम में मन भी नहीं लगता है.

कहा कि वह दुमका के व्यापारी से कच्चा माल लाते हैं और बर्तन तैयार कर उन्हें दे देते हैं. इससे उन्हें सिर्फ मजदूरी मिलती है. व्यापारी तो उस बर्तन को मन मुताबिक दामों में बेचते हैं. इससे उन्हें फायदा होता है. कारीगर को मजदूरी छोड़ कुछ नही मिलता है.

कहा कि सरकार की ओर से ऋण दिया जाता तो हमारा भी दिन बदलता. कहा कि दिन भर में 6 किलो का कच्चा माल से बर्तन बनाते है, जिससे उन्हें 15 सौ रुपये मिलते है. इसमें 4 लोग है, जिन्हें 3 सौ 50 रुपये की मजदूरी होती है.

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