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जामताड़ा : सादगी के साथ मनाया गया हूल दिवस, स्पीकर रवींद्रनाथ महतो ने किया माल्यार्पण

Jamtara : हूल दिवस को जिले भर में सादगी के साथ मनाया गया. झारखंड के स्पीकर सह नाला विधायक ने हूल दिवस पर अपने विधानसभा क्षेत्र में माल्यर्पण किया. उन्होंने कुंडहित, सपसपिया, महेशमुंडा, बाजोपाड़ा,मुगाबोनि, बगदाहा, आगैया सहित अन्य जगहों पर माल्यार्पण किया.

मौके पर स्पीकर रवींद्रनाथ महतो ने सभी को भीड़ से बचने की सलाह दी. कहा कि कोरोना का संभावित तीसरा लहर आ रहा है. लोगों को सतर्क रहने की जरुरत है.

मौके पर स्पीकर रवींद्रनाथ महतो ने हूल दिवस पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि जिस दिन झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाया था यानी विद्रोह किया था, उस दिन को हूल क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है.

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आजादी के लिए पहली क्रांती हालांकि 1857 में मानी जाती है. लेकिन झारखंड के आदिवासियों ने 1855 में ही विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया था. 30 जून 1855 को सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में मौजूदा साहेबगंज जिले के भगनाडीह गांव से विद्रोह शुरू हुआ था. इस मौके पर सिद्धू ने नारा दिया था, ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’.

उन्होंने कहा कि मौजूदा संथाल परगना का इलाका बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन पहाड़ियों एवं जंगलों से घिरा क्षेत्र था. इस इलाके में रहने वाले पहाड़िया, संथाल और अन्य निवासी खेती-बाड़ी करके जीवन-यापन करते थे और जमीन का किसी को राजस्व नहीं देते थे.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्व बढ़ाने के मकसद से जमींदार की फौज तैयार की जो पहाड़िया, संथाल व अन्य निवासियों से जबरन लगान वसूलने लगे. लगान देने के लिए उनलोगों को साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता व साहूकार के भी अत्याचार का सामना करना पड़ता था.

इससे लोगों में असंतोष की भावना बढ़ती गयी. सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव चारों भाइयों ने लोगों के असंतोष को आंदोलन में बदल दिया.

30 जून 1855 को 400 गांवों के करीब 50 हजार आदिवासी भगनाडीह गांव पहुंचे और आंदोलन की शुरुआत हुई. इसी सभा में यह घोषणा कर दी गई कि वे अब मालगुजारी नहीं देंगे. इसके बाद अंग्रेजों ने सिद्धू, कान्हू, चांद एवं भैरव- इन चारों भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बहराइच में अंग्रेजों और आंदोलनकारियों की लड़ाई में चांद और भैरव शहीद हो गए.

कहा जाता है जब तक एक भी आंदोलनकारी जिंदा रहा, वह लड़ता रहा. इस युद्ध में करीब 20 हजार आदिवासियों ने अपनी जान दी थी. सिद्धू और कान्हू के करीबी साथियों को पैसे का लालच देकर दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 26 जुलाई को दोनों भाइयों को भगनाडीह गांव में खुलेआम एक पेड़ पर टांगकर फांसी की सजा दे दी गयी. इस तरह सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई कर अपने प्राणों की आहुति दे दी.

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