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जमशेदपुरः कुर्मी, आदिवासी और शहरी वोटरों के त्रिकोण में छिपा है चंपई और विद्युतबरण का भविष्य

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  • सोरेन के उम्मीदवार बनने से आदिवासी मतों का बिखराव हो सकता है कम
  • कुर्मी वोट बड़ा फैक्टर, पिछले 10 सांसदों में 7 बार कुर्मी उम्मीदवार ने की है जीत दर्ज

Nitesh Ojha

राज्य की 4 सीटों (दुमका, राजमहल, गिरीडीह और जमशेदपुर) पर चुनाव लड़ रहे जेएमएम के लिए इस बार दो सीटें काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं. उनमें गिरिडीह के साथ जमशेदपुर सीट भी शामिल हैं. दोनों ही सीटों पर कुर्मी वोट गेमचेंजर की भूमिका निभा सकते हैं. गिरिडीह सीट से कुर्मी समुदाय से ताल्लुक रखनेवाले जगरनाथ महतो ही उम्मीदवार हैं. जमेशदपुर में कहानी कुछ अलग है. पार्टी उम्मीदवार चंपई सोरेन को कुर्मी वोट पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है. पिछले आंकड़ों को देखें तो 10 में से 7 बार कर्मी जाति के उम्मीदवार यहां से संसद का रास्ता तय कर चुके हैं.

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इस संसदीय क्षेत्र की 6 विधानसभा में से पांच ( मुख्यमंत्री रघुवर दास, मंत्री सरयू राय, मेनका सरदार, लक्ष्मण टुडू और रामचंद्र सहिस) पर एनडीए का कब्जा है. जानकार बताते हैं कि इन पांच विधानसभा क्षेत्र से बढ़त हासिल करना भी चंपई सोरेन के लिए एक ब़ड़ी चुनौती है. चंपई सोरेन के लिए राहत की बात यह है कि जमशेदपुर से सांसद रह चुके डॉ अजय कुमार भी यहां काफी सक्रिय हैं. इसके अलावा बहरागोड़ा से विधायक कुणाल षाड़ंगी के क्षेत्र से भी उन्हें काफी मदद मिल सकती है.

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आदिवासी वोटर हैं अहम

जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र में करीब 2.50 लाख कुर्मी वोट हैं. कुर्मी उम्मीदवार होने की स्थिति में उन्हें ज्यादा वोट मिलना स्वाभाविक है. जेएमएम के शैलेंद्र महतो, सुनील कुमार महतो और सुमन महतो और बीजेपी के विद्युत बरण महतो के जीत इन्हीं वोटों की बदौलत मानी जाती रही है.

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बीजेपी की ताकत शहरी वोट

पिछले चुनाव के बाद यह साफ हो गया है कि यहां पर बीजेपी की एक सबसे बड़ी ताकत शहरी वोटर भी है. जमेशदुपर ईस्ट और वेस्ट पर बीजेपी के दो कद्दावार नेता क्रमशः सीएम रघुवर दास और मंत्री सरयू राय की मजबूत पकड़ है. ऐसे में जेएमएम उम्मीदवार को आदिवासी वोटरों पर ज्यादा ही निर्भर रहना पड़ सकता है. देखा जाये, तो आदिवासी समुदाय यहां कुर्मी से भी ज्यादा डोमिनेंट है. संख्या के हिसाब से देखें, तो इस क्षेत्र पर आदिवासी वोटरों की संख्या भी करीब 4.50 लाख तक है. इसमें करीब 2.75 लाख की संख्या संथाल आदिवासियों की है. जाहिर है कि जेएमएम की नजर आदिवासी समुदाय के वोटरों पर ज्यादा है. माना जा रहा है कि सोरेन के उम्मीदवार बनने से आदिवासी मतों का बिखराव कम होगा.

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शहरी वोटरों पर डॉ. अजय कुमार की है जबरदस्त पकड़

वहीं जमशेदुपर सीट पर डॉ अजय कुमार की छवि भी अच्छी है. उनकी शहरी वोटरों पर जबरदस्त पकड़ है. आइपीएस से राजनेता बने डॉ. अजय कुमार की लोकप्रियता का असर था कि 2011 में जमशेदपुर में लोकसभा उपचुनाव में वे 1.50 लाख से ज्यादा वोटों से जीते. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर में वे चुनाव हार गये. डॉ अजय कुमार के अलावा बहरागोड़ा विधायक कुषाल षांड़गी भी चंपई सोरेन के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं. उनकी इलाके में अच्छी पैठ है. गैर आदिवासी होते हुए भी आदिवासी समाज में उनकी पकड़ प्लस प्वाइंट है.

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भाजपा की मजबूत कड़ी हैं रघुवर दास और सरयू राय

जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र में जमशेदपुर ईस्ट और वेस्ट के दो बीजेपी विधायक क्रमशः रघुवर दास और सरयू राय चाहें भाजपा की मजबूत कड़ी हैं. इन दोनों की उपस्थित से महागठबंधन की रणनीति पर ब्रेक लग सकता है. पिछले विधानसभा चुनाव की स्थिति को देखें, तो वर्तमान सीएम ने जहां अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के भारती दुबे को करीब 30,000 से ज्यादा और सरयू राय ने कांग्रेस के बन्ना गुप्ता को करीब 10,000 के करीब वोटों से हराया था. दोनों ही संख्या एक विधानसभा रिजल्ट के लिहाज से काफी मायने रखती है.

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मजदूर नेता के रूप में बनायी है छवि, सभी वर्गों का मिलेगा समर्थन : चंपई सोरेन

न्यूज विंग से बातचीत में जेएमएम उम्मीदवार चंपई सोरेन ने बताया कि अपने पांच साल की सत्ता में बीजेपी ने विकास का कोई काम नहीं किया है. इस लिहाजा से बीजेपी के किसी भी उम्मीदवार को जनता के पास जाने से कोई फायदा नहीं है. वहीं कुर्मी और आदिवासी वोट के समीकरण पर चंपई सोरेन ने कहा कि उनकी छवि एक मजदूर नेता की रही है. उन्होंने सभी वर्गों के बीच जाकर काम किया है. ऐसे में क्या कुड़मी और क्या आदिवासी, सभी का समर्थन इस बार के चुनाव में उन्हें ही मिलेगा.

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