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#Jamshedpur: कुणाल षाड़ंगी के फैसले ने बढ़ा दी बीजेपी और जेएमएम दोनों की मुश्किलें, कुणाल लड़ेंगे चुनाव तो क्या करेंगे डॉ दिनेशानंद और समीर

Abinash Mishra

Jamshedpur: बहरागोड़ा की राजनीति में कुणाल षाड़ंगी के एक फैसले ने भूचाल खड़ा कर दिया है. एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़नेवाले तीन दिग्गजों के एक ही पार्टी में आने से राजनीति में नया ट्विस्ट आ गया है.

अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि कुणाल को बीजेपी मौका देगी तो फिर क्या होगा भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिनेशानंद गोस्वामी और जेवीएम छोड़ बीजेपी में शामिल हुए समीर मोहंती का.

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भाजपा के लिए असमंजस ये है कि पार्टी यदि कुणाल को टिकट देती है तो फिर डॉ दिनेशानंद और समीर मोहंती की क्या भूमिका होगी.

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क्यों बीजेपी में शामिल हुए कुणाल षाड़ंगी

बीजेपी में जाना कुणाल के लिए असल में घर वापसी है. कुणाल के पिता डॉ दिनेश षाड़ंगी बीजेपी से मंत्री भी रह चुके हैं. लेकिन 2014 के चुनाव से पहले बीजेपी के डॉ दिनेशानंद को टिकट देने से नाराज कुणाल ने जेएमएम का दामन थाम लिया, जिसका समर्थन उनके पिता डॉ दिनेश षाड़ंगी ने भी किया.

2014 के चुनाव में कुणाल ने डॉ दिनेशानंद गोस्वामी को 15000 से भी अधिक मतों से हराया था.

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बहरगोड़ा में भाजपा के तीन खेमे

2014 के ही चुनाव में जेवीएम से चुनाव लड़नेवाले समीर मोहंती भी किसी से कम नहीं हैं. कुणाल और डॉ दिनेशानंद के चुनावी मैदान में होने के बावजूद 42000 वोट लाकर समीर मोहंती ने भी अपनी धाक जमायी थी.

तीनों के एक ही पार्टी में आने से भाजपा तीन खेमे में बंट चुकी है. तीनों के समर्थक एक-दूसरे को देखना पसंद नहीं कर रहे हैं. साथ ही अलग-अलग बैठकों का दौर भी चल रहा है.

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ गोस्वामी बीते चुनाव में हारने के बाद भी सक्रिय थे. लगातार संगठन की बैठकों के अलावा सामूहिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. डॉ गोस्वामी को सामूहिक विवाह से लेकर रोजगार मेले का आयोजन करने से जनता के बीच पैठ बनाने में भी कामयाबी मिली.

कुणाल के भाजपा में शामिल होने के बाद डॉ दिनेशानंद के समर्थकों में आक्रोष है. लिहाजा तीनों खेमे में से कौन क्या गुल खिलायेगा ये कहा नहीं जा सकता.

असमंजस में जेएमएम

अब जेएमएम बहरागोड़ा में क्या करेगा, यह एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. कुणाल के भाजपा में जाने से जेएमएम में चेहरे का संकट खड़ा हो गया है. साथ में समर्थकों के बिदकने की भी चुनौती है.

फिलहाल वरीय नेता समर्थकों को एकजुट रखने के प्रयास में हैं. बहरागोड़ा में जेएमएम का कोई ऐसा चेहरा नहीं जो भाजपा को पसीने छुड़ा सके. लिहाजा जेएमएम के पास महागठबंधन का ही रास्ता बचा है जिसके जरिए पार्टी बहरागोड़ा में भाजपा के आगे टिक सकती है.

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