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‘रिसोर्स पॉलिटिक्स’ था जयपाल सिंह का राजनीतिक और आर्थिक दर्शन

पुण्यतिथि पर विशेष

  • अनुसूचित क्षेत्र के संसाधनों पर आदिवासियों की हिस्सेदारी की वकालत

Sudhir Paul

यूरोपीय चकाचौंध और भारत के एलिट सर्किल में दो दशकों से ज्यादा समय तक रहने के बाद जयपाल सिंह जब बिहार (अब झारखण्ड) लौटे तो उन्हें लगा कि हजारों घूरती आंखों से वे मुंह मोड़ रहे थे. इतने वर्षों में वे बदले थे और उनका जग भी बदला था. यह दु:स्वप्न था जिसने उन्हें नींद से जगा दिया था. बहुत कुछ बदल गया था. जंगल का आकर्षण आतंक में बदल गया था. पहाड़ों पर पहरा था.

और आदिवासियों की जिन्दगी पहाड़-सी हो गयी थी. एलिट सर्किल के बीच रहते हुए भी जो नस्लीय भेदभाव, निम्न समझने और अलगाव को उन्होंने महसूस किया था, यहां गांवों में यह हर समय ज्यादा नग्न और साफ़-साफ़ दिख रहा था.

आदिवासियों के परम्परागत संसाधनों की लूट मची थी और आदिवासियों को क़ानूनी जंजीरों में बांध दिया गया था. बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद को दिसम्बर, 1938 को लिखे पत्र में जयपाल सिंह ने कहा था-राजनीति में दिलचस्पी नहीं रही है लेकिन अपने लोगों की बदतर हालात से कैसे अलग रह सकता हूं. यही वह समय था जब वे आजीविका की तलाश में भी थे.

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राजनीति में आने को लेकर संशय और ऊहापोह बना हुआ था. एक ओर आजीविका का संकट था तो दूसरी ओर आदिवासियत की लड़ाई. उधेड़बुन और अनिर्णय की मन:स्थिति में वे बिहार प्रांत के तत्कालीन गवर्नर सर मोरिस हालेट से पटना में मिले.

संभवतः दिसम्बर, 1938 का शुरुआती सप्ताह रहा होगा. सर हालेट जयपाल सिंह की खूबियों को जानते थे और उनकी सीमाओं को महसूस करते थे. उन्होंने बस इतना ही कहा था-…नौकरी, कामधाम तो बहुत मिल जाएगा, यहां नहीं तो कहीं और सही.

लेकिन तुम्हें अपने लोगों के लिए सोचना चाहिए…जो जंगलों, पहाड़ों में भयावह हालत में हैं. कांग्रेस की प्राथमिकता में तुम्हारे आदिवासी नहीं हैं. लगभग इसी ढंग की सलाह रसेल की रही. राबर्ट रसेल बिहार का मुख्य सचिव था और ऑक्सफ़ोर्ड के दिनों से जयपाल को जानता था.

पटना की इस यात्रा से जयपाल सिंह के मन में उमड़ते-घुमड़ते संशय के बादल छंट गये. गुरु केनन की इच्छा को अमली जामा पहनाने के दृढ़ संकल्प के साथ वे रांची लौटे. राजनीति के मैदान में उतरने का फैसला हो गया था. इधर अलग-अलग खेमों में बंटे छोटे-छोटे आदिवासी संगठनों को समझ आ गया था कि अलग राज्य की लड़ाई अकेले नहीं बल्कि साझा ही लड़ी जा सकती है.

साइमन कमीशन ने अलग राज्य के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. और 1935 के अंतरिम चुनाव में आदिवासी संगठनों की हार ने कांग्रेस को और आक्रमक बना दिया था.

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कांग्रेस आदिवासी आकांक्षाओं के प्रति कभी संवेदनशील रही ही नहीं. उनके लिए आदिवासी अस्मिता और अलग छोटानागपुर राज्य के सवाल कुछ आदिवासी नेताओं की अराजक नेतृत्व की पराकाष्ठा थी.

30 -31 मई, 1938 को लगभग सभी आदिवासी संगठनों ने रांची में साझा मंच का गठन कर लिया. छोटानागपुर-संथाल परगना को मिलाकर एक अलग प्रांत की मांग के प्रस्ताव को पारित किया गया. अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के नेतृत्व में अलग प्रांत की लड़ाई को धार देने पर सहमति बनी. यह लड़ाई अंग्रेजों से नहीं बल्कि कांग्रेस से लड़नी थी.

इस बड़ी लड़ाई के लिए बौद्धिक, वैचारिक और प्रखर राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत शिद्दत से महसूस की जा रही थी. उस समय जयपाल सिंह से योग्य और सक्षम दूसरा आदिवासी नेता कोई नहीं था.

आदिवासी महासभा ने जयपाल सिंह को हाथों-हाथ लिया और महासभा का नेतृत्व उन्हें सौंप दिया. आदिवासी महासभा के नेताओं को पता था कि यह लड़ाई मैदान में भी लड़ी जानी है, सदन में भी और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के साथ भी. जयपाल सिंह का नजरिया साफ़ था. राजनीतिक दांव –पेंच उन्हें पता था.

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उन्हें पता था वो जो कुछ कर रहे है…इतिहास में दर्ज़ हो रहा है. लन्दन में रहते हुए प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व राजनीति में हुए बदलाव के निकट के दर्शक थे. युद्ध की राजनीति, राजनीति और अर्थ का गठजोड़ और राजनीति में राष्ट्रवाद को वो नजदीक से देखे हुए थे.

कूटनीति और राजनीति के कौशल से वे परिचित थे. आंतरिक उपनिवेशवाद को वे केवल जानते नहीं थे बल्कि उनके रणनीतिकारों के साथ उठते-बैठते भी रहे थे. वे ठीक उसी समय भारत से लन्दन पहुंचे थे जब प्रथम विश्व युद्ध के खत्म होने की औपचारिक घोषणा हो गयी थी.

20 जनवरी, 1939 को रांची में आदिवासी महासभा की सभा आयोजित हुई. गांव-गांव से हजारों का हुजूम 19 की शाम से ही जुटने लगा था. पुरानी रांची के खुले मैदान में एक लाख से ज्यादा लोग कडाके की ठंड जमे थे. जयपाल सिंह के भाषण की उष्मा से वे पिघल रहे थे, उबल रहे थे. उन्होंने कहा था- ‘यह आदिवासियों की आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी की लड़ाई है.

हमें अपने पुरखों के सपनों का राज्य बनाना है.’ इस सभा ने जयपाल सिंह को जादुई नेता के तौर पर स्थापित कर दिया. कांग्रेस को पहली बार अपनी राजनीतिक जमीन पर एक सशक्त प्रतिद्वंदी की धमक सुनाई देने लगी थी.

‘लो बिर सेंदरा एन ऑटोबायोग्राफी’ में जयपाल सिंह लिखते हैं कि कांग्रेस को मुझे समझने में भूल हुई. उन्हें लगा कोर्ट-टाई पहनने वाला यह आदमी कहां राजनीति के धूल-धक्कड़ में टिक पायेगा. ….मेरे खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हुआ….ईसाइयों का एजेंट है. आन्दोलन की आड़ में आदिवासियों को ईसाई बनाया जाएगा… आदि-आदि.

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जयपाल सिंह को पता था कि बेहतर राजनीतिक पारी के लिए जरूरी है कि पुरखों की माटी और माटी से जुड़े लोगों से जुड़ें. समुदाय, समाज, सत्ता और संसाधनों की बेहतर समझ बनाने के लिए वे गांव-गांव घूमते रहे. लोगों को संगठित करते रहे. मई, 1939 के रांची और सिंहभूम के निकाय चुनाव में आदिवासी महासभा की धमाकेदार उपस्थिति ने कांग्रेस को सकते में डाल दिया था.

रांची में 16 और सिंहभूम में 22 सीटों पर महासभा को सफलता मिली थी. हालांकि, निकाय चुनाव का सीधा वास्ता अलग राज्य के उनके बड़े लक्ष्य से नहीं था लेकिन इस जीत के राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक मायने काफी बड़े थे. आदिवासी समुदायों की आंखों में शोषण, भय और भेदभाव से मुक्ति के पल रहे सपने को पुख्ता और ठोस बनाने में यह जीत उत्प्रेरक साबित हुआ.

अपने को ’निम्न’ और ‘कमतर’ समझने की ग्रंथि से आदिवासी समुदायों को बाहर लाना जयपाल सिंह की बड़ी चुनौती थी. लेकिन इसके बगैर आगे की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती थी. और यह तभी संभव था जब कोई करिश्मा हो.

करीब-करीब स्वतंत्रता संग्राम का यह अंतिम दौर था. आसन्न स्वतंत्र भारत के सपने लोगों की आंखों में पलने लगे थे. देश में यह माहौल बन गया था कि कांग्रेस के खिलाफ का मतलब ‘देश’ के खिलाफ, ‘देश की स्वतन्त्रता’ के खिलाफ और ‘अंग्रेजी राज’ के साथ.

छोटानागपुर के इलाके में आदिवासी महासभा और जयपाल सिंह की लोकप्रियता चरम पर थी और एक ढंग से यह आदिवासियों का प्रतिनिधि संगठन बन गया था. राजनीतिक संतुलन की बाजीगरी में जयपाल सिंह प्रशिक्षित तो नहीं थे लेकिन लन्दन और ऑक्सफ़ोर्ड में रहते हुए वे राजनीतिक शास्त्र के कई दक्ष लोगों के संपर्क में थे.

प्रथम विश्व युद्ध से बदले सत्ता समीकरण और बदली भौगोलिक सीमाओं और इसके इर्द-गिर्द के राजनीतिक बहसों में वे दर्जनों बार शामिल रहे थे. भले देश और काल अलग था लेकिन राजनीति और कूटनीति की बुनियादी बातों की जानकारी उन्हें थी.

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उन्हें पता था कि अलग राज्य की लड़ाई को हर हाल में ‘आदिवासी अस्मिता’ और ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ के फ्रेम में ही रखना है. इस फ्रेम से बाहर जाने का मतलब था, प्रतिद्वंदियों द्वारा आन्दोलन को ‘अलगाववादी’ चिन्हित कर दिया जाना.

बिहार कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने आदिवासी इलाकों में हो रहे आन्दोलन पर घोर नाराजगी दिखायी थी. जयपाल सिंह को लगभग चेताते हुए कहा था, यह आन्दोलन … स्वतंत्रता आन्दोलन को कमजोर कर सकता है.

ऑक्सफ़ोर्ड में रहते हुए वे ब्रिटेन के खासकर भारत और अफ्रीका महाद्वीप के देशों में ‘रिसौर्स पॉलिटिक्स’ की नीतियों की थोड़ी समझ रखते थे.

16 जनवरी, 1939 को राजेन्द्र प्रसाद को लिखे पत्र में जयपाल सिंह ने स्पष्ट किया था कि बिहार के एक तिहाई हिस्से आदिवासी इलाके हैं और राज्य के राजस्व के एक तिहाई हिस्से पर आदिवासियों पर उनका हक बनता है. आदिवासी इलाके के खनिज और अन्य संपदाओं का लाभ आदिवासियों को नहीं मिल रहा है. उनके कल्याण के कार्यक्रम ठीक से नही चल रहे हैं. यह आदिवासियों को न्याय दिलाने का आन्दोलन है.

‘रिसोर्स पॉलिटिक्स’ की रणनीति के तहत वे ‘टिस्को’ कम्पनी पर लगातार आदिवासी हितों की उपेक्षा का आरोप लगाते रहे थे. वे कहते-‘ ब्रिटिश सरकार ने टिस्को कम्पनी के लिए आदिवासियों की लगभग 7000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था. उस पर खदान खुले और कारखाने चल रहे हैं लेकिन काम करने वाले ज्यादातर लोग बाहर के हैं.

आदिवासियों की जमीन मात्र 14 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से ली गयी है. सोनारी, साकची, कदमा, बेलड़ी सहित दर्जनों आदिवासी गांवों का नक्शा मिट गया है.’ जन सभाओं में वे प्रश्न उठाते, टिस्को से आदिवासियों को क्या मिल रहा है? आदिवासी अपनी ही जमीन पर धांगर हो गया है.

उन्हें पता था कि टिस्को कम्पनी कांग्रेस का दुलरवा है, बावजूद इसके उन्होंने ‘लेबर इन्क्क्वायेरी कमेटी’ में आदिवासी मजदूरों के प्रतिनिधित्व की मांग की थी. जयपाल सिंह अप्रत्यक्ष रूप से यह बताने में सफल रहे थे कि बिहार सरकार के इशारे पर टिस्को कम्पनी आदिवासियों के साथ भेदभाव करती है. कांग्रेस को अपनी छवि बचाने के लिए राजेन्द्र प्रसाद को सफाई देनी पड़ी.

28 मई, 1939 को श्री कृष्ण सिन्हा को पत्र लिखकर राजेन्द्र प्रसाद बताते हैं कि टिस्को में बिहार सरकार के इशारे पर आदिवासियों के साथ भेदभाव हो रहा है, यह सच नहीं है.

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जनजातीय समुदायों में गरीबी और भूमिहीनता काफी व्यापक है. ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा के नीचे गुजर–बसर करने वालों का राष्ट्रीय औसत 33.8 फीसदी है. जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कुल जनजातीय आबादी का 47.1 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहा है.

शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले जनजातीय समुदायों का राष्ट्रीय औसत 28.8 फीसदी है. जनजातीय समुदायों को भूमि अधिकारों के मामले में संवैधानिक सुरक्षा की गारंटी है. बावजूद इसके जनजातीय समुदाय की 9.4 फीसदी आबादी भूमिहीन है जबकि भूमिहीनों का राष्ट्रीय औसत 7.4 फीसदी है.

देश की कुल आबादी में जनजातीय समुदाय की हिस्सेदारी मात्र 8.6 फीसदी है, लेकिन विकास की वजह से विस्थापन की मार सबसे ज्यादा इन्हीं पर पड़ी है. अनुमान है कि 1951 से 1990 तक अवधि में बांधों, खान-खदानों, औद्योगिक विकास की इकाइयों, अभयारण्य एवं सेंचुरी निर्माण के कारण विस्थापित लोगों में से 40 फीसदी विस्थापित जनजातीय समुदाय से हैं.

इनमें से कई परिवार एक से अधिक बार विस्थापित हुए हैं. इस अवधि में विस्थापित जनजातीय आबादी का केवल 24.7 फीसदी ही पुनर्वासित हो पाया. राष्ट्र के विकास के लिए कुछ लोगों को कुर्बानी देनी पड़ती है और दुर्भाग्य से देश में हमेशा यह कुर्बानी आदिवासी समुदायों के खाते में डाला जाता रहा है. बांधों, खनन कार्यों और अन्य आर्थिक गतिविधियों में हुए विस्थापन और आदिवासियों के साथ इनके सह-संबंध के सांख्यिकीय आंकड़ों से सम्बंधित प्रमाणिक दस्तावेज मौजूद नहीं हैं.

अब भी सामाजिक और आर्थिक संकेतकों में निचले पायदान पर अनुसूचित जनजातियों का रहना हमारे लिए चिंतन-मनन का सवाल है. विशेष संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के बावजूद आखिर क्यों आदिवासी समुदाय पिछड़े हैं?

संसद और विधान सभाओं में जनजातीय समुदाय के सात दशकों से निरंतर प्रतिनिधित्व के प्रावधान, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर जनजातीय समुदायों के विशेष अधिकार और सकारात्मक भेदभाव के प्रावधानों के तहत आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद जनजातीय समुदाय देश के अन्य सभी समूहों की तुलना सबसे ज्यादा पिछड़ा, सबसे ज्यादा विस्थापित और सबसे शोषित-पीड़ित है.

खनन गतिविधियों से प्राप्त होने वाले राजस्व और मुनाफे का ब्योरा जुटा पाना थोडा मुश्किल है. ये आंकड़े एक साथ कहीं उपलब्ध नहीं हैं. खनन मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश में 2100 माइंस हैं और इनमें से लगभग 70 फीसदी यानि 1463 माइंस अनुसूचित क्षेत्र में हैं. इसमें हिमाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा के आंकड़े शामिल नहीं हैं.

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एमएमडीआर एक्ट, 2015 खनिज संपदाओं को ‘प्रमुख’और ‘लघु’ खनिज के तौर पर वर्गीकृत करता है. लघु खनिज के अंतर्गत बालू, रेट, पत्थर, गिट्टी,चिकनी मिटटी आदि आते हैं. केन्द्र सरकार की अधिसूचना के मुताबिक़ जो कुछ लघु खनिज के रूप में अधिसूचित नहीं हैं, वे प्रमुख खनिज माने जायेंगे. वर्ष 2015-16 में खनिज उत्पादन का मूल्य 2,76, 638 करोड़ आंका गया था.

खनिज उत्पादन में पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 65 फीसदी है. देश में खनन से मिलने वाली रॉयल्टी संग्रहण का 88.5 फीसदी अनुसूचित क्षेत्र के राज्यों से आता है. चूंकि खनन का जिलावार या प्रखंडवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, इसलिए जिलावार या प्रखंडवार खनन गतिविधियों या रॉयल्टी का ब्योरा संभव नहीं है. केवल राज्यवार आंकड़े ही उपलब्ध हैं.

सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट ने केन्द्र और राज्य सरकारों से सूचना अधिकार कानून के तहत खनन सम्बन्धी जानकारी मांगी थी. प्राप्त जानकारी के मुताबिक़ देश में 50 प्रमुख खनन जिले हैं. खनन के 50 प्रमुख जिलों में से 27 जिले अनुसूचित क्षेत्र के जिले हैं.

विचित्र किन्तु सत्य है कि लगभग 90 फीसदी खनन रॉयल्टी के बाद भी जनजातीय आबादी सबसे ज्यादा असुरक्षित और निर्धन है. जनजातीय समुदायों के पैरों के तले खनिज है और संविधान का सुरक्षा कवच लेकिन बावजूद इसके वे शोषित, उत्पीड़ित और विस्थापित हैं.

भारत के 640 जिलों में से 123 जिले अनुसूचित जिले हैं. इनमे से 104 पांचवीं अनुसूचित और 19 छठी अनुसूचित क्षेत्र के जिले हैं. 123 में से 51 जिले पूर्णत: अनुसूचित क्षेत्र हैं जबकि 72 जिलों के आंशिक हिस्से अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं.

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पूर्णत: अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 51 जिलों में से 36 पांचवीं और शेष 15 छठी अनुसूचित क्षेत्र के जिले हैं. देश की कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 13 फीसदी हिस्सा अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आता है. पांचवीं और छठी अनुसूचित क्षेत्र का आंकड़ा क्रमशः 11.3 और 1.7 फीसदी का है.

छत्तीसगढ़, झारखण्ड और त्रिपुरा का बड़ा हिस्सा क्रमशः पांचवीं और छठी अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आता है. इसके ठीक उलट राजस्थान, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा अनुसूचित क्षेत्र है. देश के 14 अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्यों में राजस्थान में अनुसूचित क्षेत्र का भौगोलिक क्षेत्रफल सबसे कम है.

जयपाल सिंह के राजनीतिक चिंतन के केन्द्र में संसाधनों पर आदिवासियों का हक था. बाद में जब वे ठक्कर बप्पा कमेटी के सदस्य बने तो उन्होंने संसाधनों की राजनीति को आगे बढ़ाया.

वे अपवर्जित और आंशिक रूप से अपवर्जित क्षेत्रों (असम को छोड़कर) के लिए ए वी ठक्कर के नेतृत्व में बनी कमेटी के सदस्यों को समझा पाने में सफल रहे थे कि संसाधनों का आनुपातिक और न्यायपूर्ण वितरण जरूरी है.

जयपाल सिंह इसे आदिवासी कल्याण की बुनियादी शर्त मानते थे. उनकी यह मान्यता ठक्कर बप्पा कमेटी की अनुशंसा का हिस्सा बनी- ‘अनुसूचित क्षेत्रों से प्राप्त राजस्व और इन क्षेत्रों में होने वाले खर्च के ब्योरे को प्रांतीय सरकार के वार्षिक बजट में अलग से अंकित करना चाहिए.’

बहुत बाद में सातवें-आठवें दशक में जनजातीय उप-योजना के प्रावधान तो लागू हुए लेकिन यह जयपाल सिंह का चिंतन अपभ्रंशित अभिव्यक्ति है. जयपाल सिंह के चिंतन और जनजातीय उप-योजना में बुनियादी फ़र्क है.

जयपाल सिंह ने अनुसूचित क्षेत्र के संसाधनों में हिस्सेदारी को आधार बनाया था जबकि जनजातीय उप-योजना आबादी के अनुपात में खर्च की वकालत करता है. फर्ज कीजिये कि अनुसूचित क्षेत्रों के संसाधनों को आदिवासी विकास और कल्याण का आधार बनाया जाता तो देश का राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ढांचा क्या होता?

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(लेखक झारखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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