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विपक्ष के लिए यह हार से सबक सीखने का वक्त है

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Faisal Anurag

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असामान्य हार के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया विभिन्न राजनीतिक दलों से आयी है उससे जान पड़ता है कि वे सबक सीखने  के लिए तैयार नहीं हैं. न तो 2019 की उनकी हार सामान्य थी और न ही 2019 के बीच अनेक आमचुनावों में भी जिस तरह के परिणाम आए थे वह इन दलों के लिए बहुत कुछ संदेश दे रहे थे. बावजूद इसके लगभग सभी विपक्षी दलों ने समीक्षा की खानापूरी की है और यह कह कर चुनाव में हारजीत लगी रहती है- की चालू प्रवृति ही दिखायी है. लोकतंत्र में न तो कोई राजनीतिक विचार और पार्टी अप्रासांगिक होती है और न ही एक या दो चुनावों की हार उनके अंत की घोषणा होती है. यह बाबर देखा गया है कि राजनीतिक हालात करवट लेते ही वे ही दल फिर से प्रमुखता हासिल कर लेते हैं जिनका शोकलेख लिखा जा चुका होता है. 2019 के बाद भी इन दलों के खत्म हो जाने की बात उतनी ही बेमानी है जितनी इस हार को सामान्य परिघटना मान लिया जाना.

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विभिन्न विपक्षी दलों के भीतर के आत्ममंथन बता रहे हैं कि कार्यकर्ता नेताओं की तुलना में ज्यादा परिपक्व है. कमजोर नेता तो पाला बदल के अवसर की तलाश में दिख रहे हैं. सत्तापक्ष ऐसे नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए तत्पर भी देखी जा सकती है. झारखंड विधानसभा के चुनाव की तैयारियों में भारतीय जनता पार्टी विपक्षी दलों से बहुत आगे हैं. 2019 के वोट शेयर में वह और भी सुधार करने की रणनीति बना रही है. वह विपक्ष के तीन दलों झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और झारखंड विकास मोर्चा के विधायकों ओर नेताओं के दलबदल के लिए तैयारी को अंजाम दे रही है. लोकसभा चुनाव के पहले उसने राजद के नेताओं का दलबदल कराया और अब उसके निशाने पर शेष दल भी हैं.

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भाजपा जानती है कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में वोटर का रुख एक जैसा नहीं रहता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को भारी जीत मिली थी और उस ने विधानसभा के जिन स्थानों पर बढत हासिल की थी, विधानसभा में बनाए नहीं रखा था.

2019 का चुनाव इससे कितना अलग होगा इसे ले कर पार्टी में आशांका है. वह एक अर्थ में जरूर विपक्ष पर भारी है कि उसका मनोबल जीत के कारण बेहद मजबूत है जबकि विपक्ष को हार के बाद की मानसिकता से निकल कर विधानसभा के चुनाव में उतरना है.

बावजूद इसके विपक्ष के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि वह उन हालातों का ठोस विवेचन कर नये सबक हासिल करे जो वोट प्रवृति से जाहिर होता है.

वोट शेयर का सही विवेचन करना भी जरूरी है, इससे विपक्ष को अपनी रणनीति कारगर बनाने में सुविधा हो सकती है. 2019 में भाजपा गठबंधन को 55.59 प्रतिशत वोट हासिल हुआ है. उसे 12 सीटें  मिली हैं. इतनी ही सीट उसे 2014 में भी मिली थी. लेकिन उसका वोट शेयर 44.48 था.

विपक्षी दलों के गठबंधन को इस बार 34.58 प्रतिशत वोट मिला है जो 2014 में मिले 36.81 प्रतिशत से कम है. भाजपा गठबंधन के वोट शेयर के उछाल की प्रवृति का विवेचन विपक्ष के लिए राह बना सकती है.

विपक्ष इस चुनाव में वोट शेयर में संघर्ष करता हुआ केवल सुरक्षित क्षेत्रों में ही दिखता है. आदिवासी इलाकों में पिछले पांच सालों के आंदोलनों और जनाक्रोश को यदि भाजपा पार पाने में कामयाब हुई है तो यह विपक्ष के लिए एक बड़ा चुनौती है. हालांकि इसे सुरक्षित क्षेत्रों से ही विपक्ष को जीत मिली है. इन क्षेत्रों में भाजपा को 46.76 प्रतिशत वोट मिले हैं जब कि उसे 2014 में 37.98 प्रतिशत वोट मिला था. अर्थात जनाक्रोश के बाद भी भाजपा ने न केवल अपने पुराने वाटरों को बांधे रखा बल्कि उसका विसतार भी किया है.

विपक्षी गठबंधन को 2019 में 43.45 प्रतिशत वोट मिला है. 2014 33. 89 प्रतिशत वोट मिला था. इन इलाकों में भाजपा गठबंधन की तुलना में विपक्षी गठबंधन का वाट उछाल कई राजनीतिक संदेशों का बयान करता है. इन इलाकों के संघर्षशील वोटरों की एकजुटता के साथ सत्ताविरोधी उनके तेवर को रेखांकित करता है. विधानसभा के चुनाव के समय यदि यह तेवर और भी ज्यादा सघन रूप ग्रहण कर ले तो अचरज नहीं होगा. विपक्षी दलों के सामने न केवल अपनी पार्टी को एकसूत्र में बांधे रहने की चुनौती है बलिक अपने कतारों के बीच टूट को भी रोकना होगा.

इसके साथ ही वामपंथी दलों को नजरअंदाज करना विधानसभा के चुनाव के लिए इन दलों के लिए घातक साबित होगा. हालांकि वामपंथी दलों ने जिन सीटों पर चुनाव लडा है वे उनकी कमजोरी को ही बयान कर रहे हैं. बावजदू इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि उनका साथ न केवल संघर्ष के मैदान के लिए जरूरी है बल्कि उनका साथ राजनीतिक जरूरत है.

विपक्षी दलों के भीतर विध्रानसभा चुनावों के पहले जिस तरह के स्वर उभरे हैं वह इन दलों के लिए घातक साबित होगा. भाजपा जीत के बाद भी एनडीए को कमजोर नहीं होने देती. इससे वोटरों की गांलबंदी आसान हो जाती है. विपक्ष इन तथ्यों से वाकिफ नहीं होना चाहता कि वोटरों की प्रवृति में भारी बदलाव है और प्रचलित राजनीतिक प्रकियाओं से उसमें कोई कारगर हिस्सेदारी नहीं बढ़ायी जा सकती है.

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