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राज्य भर के दिव्यांगजनों को हर महीने राशन मिले, यह सुनिश्चित करना मेरी प्राथमिकता : मुकेश महतो

टाटीसिल्वे के दिव्यांग मुकेश ने बनाया दिव्यांग स्वाभिमान मंच, सिल्वे पंचायत में सरकार की ओर से मिली है जनवितरण प्रणाली की दुकान, पंचायत के अंबाडीपा गांव में बेसहारा और असाध्य रोगियों को खुद पहुंचाते हैं राशन

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Ranchi : राजधानी रांची में आयुष्मान भारत कार्यक्रम के उद्घाटन के मौके पर जिस मुकेश महतो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वास्थ्य बीमा कार्ड दिया था, वह अब दिव्यांगजनों का सहारा बन उनकी सहायता करना चाहते हैं. प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के बाद से वह नये सिरे से अपने अभियान को सफल करने में लग गये हैं. राजधानी की सिल्वे पंचायत के रहनेवाले मुकेश ने दिव्यांग स्वाभिमान मंच का गठन किया है. उनके अनुसार वह राज्य भर के सात से आठ लाख दिव्यांगजनों का राशन कार्ड बनवाकर उन्हें महीने का राशन उपलब्ध कराना चाहते हैं. यही उनकी प्राथमिकता भी है. मुकेश के पैर 90 प्रतिशत तक खराब हैं, वह चल नहीं पाते. वह खुद ट्राइसाइकिल स्कूटी पर चलते हैं. अपनी पंचायत के अंबाडीपा गांव में लाचार और असाध्य रोगों से ग्रसित 20 लाभुकों को 30 किलो चावल और दो लीटर केरोसीन वह खुद पहुंचाते हैं. इसके लिए सरकार की तरफ से उपलब्ध कराये गये बायोमीट्रिक मशीन का सहारा लेते हैं. उनका कहना है कि सरकार का नियम इतना कड़ा है कि यदि बायोमेट्रिक मशीन से लगातार चार महीने तक राशन का उठाव लाभुक नहीं करेंगे, तो उनका पीला कार्ड स्वत: निरस्त हो जायेगा. इसलिए वह हर महीने एक तय तारीख को लाभुकों तक स्वयं पहुंचकर उन्हें राशन उपलब्ध कराते हैं. वह इसके लिए 35 रुपये और 100 रुपये भी नहीं लेते हैं.

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कुछ संस्थान दिव्यांगता के नाम पर कर रहे हैं कमाई

मुकेश का कहना है कि उनका राज्य भर के दिव्यांगता से संबंधित स्वयंसेवी संस्थानों ने काफी उपयोग किया. उनका कहना है कि तथाकथित स्वयंसेवी संस्थान, जो दिव्यांगजनों की सहायता करने की बातें करते हैं, उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है. ऐसे संस्थान दिव्यांगता के नाम पर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं. पर, उन्होंने सभी जगहों से ठोकरें खाने के बाद समाज के कुछ बुद्धिजीवी लोगों की मदद से अपनी संस्था बनायी. संस्था के जरिये राजधानी में 2300 दिव्यांगजनों का राशन कार्ड बनवाया. उनकी जनवितरण प्रणाली की दुकान में 273 लाभुकों को सरकारी राशन मिलता है. नियमित रूप से अपनी ट्राइसाइकिल स्कूटी से वह जिला अनुभाजन कार्यालय जाकर वहां केरोसीन और चीनी का उठाव करने के लिए पैसे जमा करते हैं. उनके अनुसार उन्होंने दिव्यांगता को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया. उनके अनुसार दिव्यांग स्वाभिमान मंच की तरफ से दिव्यांगजनों को उनके अधिकार के रूप में जागरूक करना सबसे जरूरी काम है. दिव्यांगजनों को सरकारी नौकरियां दिलाने से लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा के प्रति उन्हें जागरूक करने की भी जरूरत है. मुकेश के अनुसार बचपन में उनके दोनों पैर खराब हो गये थे. विश्व हिंदू परिषद की सहायता के बाद उन्हें तीन वर्ष पहले कैलिपर्स लगवाया गया. दिव्यांगता से लड़ते हुए अब अपने परिवार को चलाने समेत सामाजिक उत्थान का काम भी कर रहे हैं.

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