Opinion

उद्योगपतियों-व्यापारियों को खलनायक करार देना गलत है

Shashank Bhardwaj

इन दिनों हमारे देश में उद्योगपतियों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रचलन सा हो चला है. देश के राजनीतिज्ञों का एक वर्ग उन्हें खलनायक तथा जनविरोधी सिद्ध करने में लगा है. उनके विरुद्ध आधारहीन, तथ्यविहीन आरोप लगाए जाते हैं. जनसाधारण के मध्य उनकी गलत छवि निर्मित की जाती है. यद्यपि ऐसा नहीं है कि देश की जनता का बड़ा वर्ग इन बातों को मान लेता है, लोकसभा के

पिछले चुनावों में कुछ पार्टियों ने अम्बानी-अडानी को मुद्दा बनाने का प्रयास किया था. मोदी व भाजपा को इनका पक्षधर बताया गया था, फिर भी मोदी को पूर्ण बहुमत मिला. पर जनसाधारण का एक हिस्सा भी देश की आर्थिक प्रगति में गुरुतर तथा महती योगदान देनेवाले उद्योगपतियों के विरुद्ध गलत भाव रखे, दुर्भावना रखे, ये उचित नहीं. व्यापार-उद्योग किसी भी अच्छे राष्ट्र की नींव होते है.जिन राष्ट्रों में ये प्रगति करते हैं, उन राष्ट्रों के निवासियों का जीवन अपेक्षाकृत सुखमय होता है.

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सरकार सभी को सरकारी नौकरी नहीं उपलब्ध करा सकती, ये एक सार्वभौमिक सत्य है. एवं जितना शीघ्र जनसाधारण को ये बताया जाए, उतना देश के लिए भी अच्छा है. भारत में सरकारी नौकरियां मात्र 6 प्रतिशत हैं. रोजगार व जीविका के अन्य साधन उद्योगपति तथा व्यापारी उपलब्ध करवाते हैं. यह एक बड़ा कार्य है पर इन्हें इसका श्रेय, धन्यवाद नहीं मिलता. न इसकी जानकारी लोगों को उपलब्ध कराई जाती है. कृषि कार्य में भी उद्योग-व्यापार बहुत सहायक सिद्ध होते हैं. कृषि उपकरण, खाद, सिंचाई उपकरण आदि तो उपलब्ध करवाते ही हैं, फसलों के क्रय-विक्रय का चेन बनाने में भी इनकी अहम भूमिका होती है. वक्त पड़ने पर ये किसानों को वित्तीय संसाधन भी उपलब्ध करवाते हैं.

किसी भी राष्ट्र के संचालन में करों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. आर्थिक संसाधनों का बड़ा भाग वहीं से मिलता है. कर संग्रह का बड़ा हिस्सा उद्योगपतियों तथा व्यापारियों के माध्यम से आता है. लगभग 90 प्रतिशत कर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उद्योगपतियों तथा व्यापारियों द्वारा प्राप्त होता है. यह राशि कई लाख करोड़ रुपये होती है. तथा इसी से राष्ट्र की अर्थव्यस्था चलती है. देश में तरह-तरह के संसाधन उपलब्ध करवाने में भी उद्योगपतियों की बहुत बड़ी भूमिका है.

मुख्यतः उन्हीं के बने उपक्रमों में इनका निर्माण होता है. व्यापारी देश के विभिन्न भागों में इन्हें उपलब्ध करवाते हैं. किसी क्षेत्र का विकास भी मुख्यतः उस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर करता है. उद्योगपति उद्योग लगाकर किसी क्षेत्र विशेष के विकास की संभावनाएं जागृत करते हैं, विकसित बनाते हैं. आज गुजरात-महाराष्ट्र की पहचान विकसित उद्योगों के कारण है. जो राज्य क्षेत्र पिछड़े रह गए हैं वो इसलिए कि वहां उद्योग नहीं लगे, उनके पक्ष में उचित वातावरण नहीं बना.

इस देश में मुकेश अम्बानी अन्य उद्योगपतियों की संपत्ति की आलोचना करते कई मिल जाएंगे. परंतु उन्हें पता नहीं या जानना नहीं चाहते कि ये उद्योगपति लाखों-करोड़ों रुपये का वेतन बांटते हैं, बांट चुके है, जो इनकी सम्पति से भी कई गुना ज्यादा होता है. जिससे राष्ट्र के लाखों परिवार समृद्ध हुए हैं. और तो और, हमें यह नहीं बताया जाता कि मुकेश अम्बानी व अन्य उद्योगपतियों की जो सम्पति होती हैं, उसका बड़ा भाग उनके शेयरों का मूल्य होता है.

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और उनकी कंपनी के शेयर का अधिकांश भाग जनता के पास होता है. अर्थात उन्होंने जितनी सम्पति का निर्माण स्वयं के लिए किया होता, उससे कहीं अधिक जान साधारण के लिए किया होता है.

शेयर के माध्यम से वो धन का वितरण करते हैं. विप्रो ने अपनी फैक्ट्री के गांव के निवासियों को अपनी कंपनी के शेयर दिए थे. जिनको शेयर मिले, आज वो करोड़ोपति हैं. देश के उद्योगपति व व्यापारी अनेक चैरिटी प्रकल्प चलाते हैं. जिन्हें आवश्यकता होती है, उनकी सहायता करते. अभी कोरोना संकट काल रहा है. सीएसआर के अंतर्गत भी कॉरपोरेट करोडों रुपये सामाजिक विकास पर खर्च करते हैं. ये उद्योगपति ही हैं, जिनके उपक्रमों से भारत के निजी क्षेत्र में भी उच्च वेतन का सिलसिला प्रारम्भ हुआ है.

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विदेशी मुद्रा की बचत तथा सृजन, आयात पर निर्भरता में कमी, आत्मनिर्भरता, वित्तीय सशक्तिकरण,प्राकृतिक संसाधनों का संवर्धन आदि में उद्योगपतियों के अतुलनीय योगदान है. समय आ गया है जब राष्ट्र व समाज के प्रति इनके अत्यंत बहुमूल्य योगदान को सही प्रकार से समझा जाये. देश की जनता को सही तथ्य बताए जाए, इनके प्रति द्वेष तथा घृणा के वातावरण का प्रतिरोध हो. आवश्यकता उद्योगपतियों व्यापारियों के सम्मान,प्रोत्साहन की है ताकि राष्ट्र समृद्धि की ओर तीव्र गति से अग्रसर हो.
व्यापारी उद्योगपति खलनायक नहीं है, खलनायक इनके विरुद्ध दुष्प्रचार करने वाले हैं.
(लेखक के अपने विचार हैं. इनसे न्यूजविंग का सहमत होना जरूरी नहीं)

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