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टीबी मरीजों को काम से हटाना अब मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन, इलाज भी कराना होगा, जानिये क्यों

Kumar Gaurav

Ranchi : सरकारी दफ्तर हों या फिर निजी कंपनियां, अगर उनके किसी कर्मी को टीबी हो गया तो उनके लिये उस बीमार कर्मी को हटाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी होगा. क्योंकि, झारखंड सरकार ने राज्य में टीबी वर्कप्लेस पॉलिसी को लागू कर दिया है. इस पॉलिसी को लागू करने वाला झारखंड देश का पहला राज्य बन गया है. इस नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी भी मिल चुकी है.

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क्या है पॉलिसी में:

-कोई भी नियोक्ता कंपनी टीबी होने पर मरीज को काम से नहीं हटा सकेगी. बल्कि, नियोक्ता की ही जिम्मेवारी होगी कि उनका इलाज सही से हो और उनको दवाइयां मुफ्त में उपलब्ध हो.

-इस पॉलिसी में कर्मचारियों की नियमित जांच भी अनिवार्य की गयी है. टीबी को लेकर जागरूकता, स्क्रीनिंग, डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट कराना नियोक्ताओं के लिये अनिवार्य है.

-किसी मरीज के टीबी संक्रमित पाये जाने पर उनके परिवार और साथी कर्मियों की जांच कर संबंधित नियोक्ता को करानी होगी.

-नियोक्ताओं को टीबी संक्रमित मरीजों को मानसिक तौर पर सहयोग भी करना होगा,  साथ ही इलाज के दौरान हुए नुकसान की भरपायी की जिम्मेवारी नियोक्ताओं की ही होगी.

-इस पॉलिसी के तहत नियोक्ताओं को अपने कर्मियों के हेल्थ कार्ड को मेंटेन करना होगा. साथ ही नियमित जांच का रिकॉर्ड भी रखना होगा.

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टीबी उन्मूलन को ध्यान में रखकर बनायी गयी है पॉलिसी:

पॉलिसी के मुताबिक नियोक्ताओं को यह ख्याल रखना होगा कि उपचार सही से हो और दवाइयां सही समय पर फ्री में उपलब्ध हो. टीबी को मात देकर वापस काम पर लौटने और टीबी के दौरान अगर काम कर रहे हों तो मरीज के मानसिक रूप से कोई परेशानी न हो ऐसा वातावरण कार्यस्थल पर बनाकर रखना होगा.

माइंस और इंडस्ट्री के आसपास रहने वाले लोगों भी मिलेगा पॉलिसी का लाभ:

वैसे लोग जो कर्मी नहीं भी हैं और माइंस और इंडस्ट्री के आसपास रहते हैं उनको भी इस पॉलिसी का लाभ मिलेगा. इसकी जिम्मेदारी भी कंपनी की ही होगी. कर्मचारियों को इस पॉलिसी का लाभ मिल सके इसके लिए वर्कर्स एसोसिएशन को भी ध्यान रखना होगा. टीवी मरीजों के लिए छुट्टी के प्रावधानों में जरूरत पड़ने पर बदलाव करने की भी जिम्मेवारी होगी. ताकि उनके इलाज में किसी तरह का कोई प्रभाव ना पड़े.

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क्यों जरूरी है यह पॉलिसी:

झारखंड के मिनरल, माइंस और इंडस्ट्री के मामले में धनी होना राज्य के लिए वरदान है, वहीं दूसरी तरफ इनका होना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो जाता है, अधिकतर खतरा लंग्स से जुड़ी बीमारियों का होता है. नुमोकोनोसिस और सिलिका डस्ट के कारण सिलिकोसिस होने का खतरा होता है. इनके हो जाने से भी  कर्मियों और खदानों और इंडस्ट्री के आसपास रहने वाले लोगों को टीबी होने का खतरा अधिक हो जाता है, क्योंकि लंग्स पहले कमजोर हो चुका होता है. इसलिए लगातार जांच और उपचार की व्यवस्था जरूरी है. ऐसे में ये वर्क पालिसी बहुत कारगर होगी.

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कौन होंगे जिम्मेवार:

इसके अनुपालन की जिम्मेवारी सरकार के स्वास्थ्य विभाग और श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की है. श्रम विभाग की जिम्मेवारी है कि नियोक्ता और वर्कर्स एसोसिएशन इस पॉलिसी को एडेप्ट करें और टीबी प्रीवेंशन प्रोग्राम  का पालन करायें. स्टेट में इस पॉलिसी के मॉनिटरिंग की जिम्मेवारी स्टेट टीबी कॉर्डिनेशन कमेटी की होगी. वहीं जिला में इसकी गतिविधियों के देखरेख की जिम्मेवारी डिस्ट्रिक्ट टीबी कॉमोरबीडिटीज कॉर्डिनेशन कमेटी की है. इनको पूरे गतिविधियों के फीडबैक को संबंधित स्वास्थ्य पदाधिकारी और श्रम नियोजन और प्रशिक्षण विभाग को देना होगा.

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नियोक्ताओं को क्या करना होगा:

किसी कर्मी में टीबी के शुरुआती लक्षण पाये जाने पर नियोक्ताओं को उनके परिवार और प्रतिनिधियों को जरूरी गाइडलाइंस उपलब्ध कराना होगा जिसका वे पालन कर सकें. कर्मियों के कार्यस्थल पर सपोर्ट प्रोग्राम चलाना होगा, जिससे वहां टीबी के ट्रेंड रिसोर्स पर्सन का एक पूल तैयार हो सके. टीबी के रिस्क को कम करने के लिए प्रबंधन को प्री-इंप्लॉयमेंट चेकअप और नियमित जांच की व्यवस्था करानी होगी. खासकर वैसे कार्यस्थल में जहां टीबी होने का खतरा अधिक होता है.

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प्रबंधन को मरीजों के हिसाब से काम के समय में बदलाव, बीच-बीच में रेस्ट के लिए ब्रेक, फ्लेक्सिबल सिक लीव की भी व्यवस्था करनी होगी. साथ ही ट्रेड यूनियन और वर्कर्स एसोसिएशन का भी ये दायित्व होगा कि अपने साथी कर्मियों को इस जागरूक करें और उनको हक नहीं मिलने पर नियमों का हवाला देकर उनके और उनके परिवार वालों को सुरक्षित करें. नौकरी बचाये रखने के लिए जरूरी जानकारी साझा करें.

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