Opinion

अस्पतालों के मनमाने रवैये पर अंकुश जरूरी

Amardeep Yaadav

13 अप्रैल 2021 को रामगढ़ के थाना चौक स्थित एक हॉस्पिटल में जहिया खातून नामक महिला के इलाज के लिए मात्र 16 घंटे का 78 हज़ार का बिल उसके बेटे को दिया गया. महिला की मौत के बाद बिल भुगतान पर काफी विवाद हुआ.

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16 अप्रैल को अरविंद कुमार सिंह नामक व्यक्ति को उसके परिजन रांची के नामकुम स्थित एक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया. जहां मात्र 19 घंटे में ही 1 लाख 60 हज़ार रुपये का बिल दिया गया. सरकार ने जांच का आदेश दिया लेकिन कुछ नहीं हुआ.

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27 अप्रैल को रांची के रातू क्षेत्र स्थित एक हॉस्पिटल में नरेश प्रसाद नामक मरीज के परिजन को मात्र 18 घंटे का 1 लाख 28 हज़ार बिल दिया गया. सोशल मीडिया पर बवाल होने पर जिला प्रशासन ने जांच टीम गठित कर दी. लेकिन हॉस्पिटल पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. जबकि राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने 27 अगस्त 2020 को कोविड-19 संक्रमित के इलाज के लिए रेट तय दिया है. जिसके अनुसार, राज्य के सभी जिलों को तीन श्रेणियों ए, बी और सी में विभाजित किया गया है.

जिलों के अस्पतालों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है. नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स और नॉन-एनएबीएच. इन श्रेणियों के अनुसार सेवाओं और सुविधाओं की अलग-अलग शुल्क तय की गई है.

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ग्रुप ए जिले (एनएबीएच) में मूल्य निर्धारण बिना लक्षणों वाले रोगी के लिए 6000 रुपये, आइसोलेशन बेड (ऑक्सीजन के साथ) के लिए 10,000 रुपये, गहन देखभाल इकाई (आईसीयू) और वेंटीलेटर के लिए 18,000 रुपये तक है. गैर-एनएबीएच समूह के लिए, मूल्य निर्धारण लक्षणों के बिना रोगियों के लिए 5,500 से लेकर आइसोलेटर के साथ आईसीयू के लिए अलगाव बिस्तर के लिए 8,000 रुपये (ऑक्सीजन के साथ) 15,000 रुपये तक है.

ग्रुप बी (एनएबीएच) के लिए कीमतें 5,500 रुपये से लेकर बिना लक्षणों वाले मरीज के लिए, आइसोलेशन बेड के लिए 8,000 रुपये (ऑक्सीजन के साथ), आईसीयू वेंटिलेटर के लिए 14,400 रुपये तक है. गैर-एनएबीएच समूह के लिए, मूल्य स्पर्शोन्मुख रोगियों के लिए 5,000 रुपये से, आईसीयू वेंटिलेटर के लिए अलगाव बेड के लिए 6,400 रुपये से 10,800 रुपये तक है.

ग्रुप सी (एनएबीएच) के लिए, कीमतें बिना लक्षणों वाले रोगी के लिए 5000 रुपये, आइसोलेशन बेड के लिए 6,000 रुपये और आईसीयू वेंटिलेटर के साथ 10,800 रुपये तक होती हैं. गैर-एनएबीएच समूह के लिए, मूल्य बिना लक्षणों वाले रोगियों के लिए 4000 रुपये, आइसोलेशन बेड के लिए 4800 और वेंटीलेटर के साथ आईसीयू के लिए 9000 रुपये है.

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मेडिकल जांच के रेट भी तय है, जिसमें एबीजी के 400 रुपये, ब्लड सुगर लेबल के 100 रुपये, डी-डीमर्स लेबल के 800 रुपये, ह्यूमोग्लोबिन के 150 रुपये, सीटी चेस्ट के 3500 रुपये, एक्स रे चेस्ट के 500 रुपये और इसीजी के 300 रुपये लेना है.

उपरोक्त तय रेट से ज्यादा शुल्क लेने पर शिकायत के लिए टोलफ्री नंबर 104 जारी किया गया. लेकिन इस माध्यम से पीड़ितों को न्याय मिल रहा है, ये जंगल में मोर नाचा किसने देखा!. जबकि सरकार के निर्देश नहीं मानने पर अस्पतालों पर कानूनी कार्यवाही का प्रावधान है.

भारत सरकार द्वारा क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010 लागू किया गया है. जिससे स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं और सेवाओं के न्यूनतम मानकों को निर्धारित किया गया है. झारखंड सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के तहत अधिनियम को अपनाया तथा 19 मार्च, 2012 और 23 मई, 2012 के गजट नोटिफिकेशन के तहत अधिसूचित किया. राज्य में 30 मई 2013 से यह एक्ट लागू है.

जिसके नियम 10.3 एवं कंडिका के 12 के उपकंडिका 1(3) का अनुपालन कराना है. यह एक्ट सभी सरकारी, गैर सरकारी अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डायग्नोस्टिक सेंटर, लैब आदि नैदानिक प्रतिष्ठानों पर लागू है, जो एकल चिकित्सक क्लीनिक सहित चिकित्सा के सभी मान्यता प्राप्त प्रणालियों से संबंधित हैं.

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जिसके अंतर्गत सभी अस्पतालों को इन्क्वायरी काउंटर पर डॉक्टर के नाम, योग्यता, मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन नंबर के बोर्ड लगाने के अलावा 24 घंटे तीन शिफ्ट में डॉक्टर, एनेस्थेटिक, नर्स और पारा मेडिकल कर्मचारी की मौजूदगी, शुल्क संरचना विवरण हिंदी अथवा अंग्रेजी में प्रदर्शित करना अनिवार्य है.

एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते पाए जाने पर प्राथमिकी, जुर्माना, लाइसेंस निरस्तीकरण, लाइसेंस के नवनीकरण पर रोक, अस्पताल सील करने का प्रावधान है. फिर भी कई संस्थान उपरोक्त तय मानकों को भी पूरा नहीं करते हैं. उसमे आधुनिक संयंत्र और उपकरणों की कमी, आधारभूत संरचना के अलावा बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है. सिर्फ आईसीयू और वेंटीलेटर को ये दुधारू गाय बनाए हुए है.

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हर जिले से ऐसे कई परिवार मिल जाएंगे है जो अस्पतालों के दोहन के कारण कर्ज लेने या जेवर जमीन बेचने की स्थिति में आ गए हैं. सरकार की निगरानी और कार्यवाही नहीं होने पर ऐसे अस्पताल राजनीतिक, व्यापारिक और ˈब्युअरक्रैट्स के संरक्षण में बेलगाम हो गए हैं. लेकिन अब इनके मनमानेपन पर अंकुश लगाना जरूरी हो गया है तभी मरीजों पर आर्थिक भार कम होगा.

(लेखक भाजपा ओबीसी मोर्चा झारखंड प्रदेश अध्यक्ष हैं)

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