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अलग देश और अलग मुद्रा चलाने की बात है फिजूल, मीडिया वाले इसको मसाला के रूप में छाप रहे हैं : यूसुफ पूर्ति

कड़िया मुंडा ने गांव को गोद ले लिया

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Sweta Kumari /Pravin Kumar

Ranchi : खूंटी जिला में जब पत्थलगड़ी की बात सामने आयी, तो इस पर काफी बवाल भी हुआ. मेन स्ट्रीम मीडिया में खबर तो यह भी चली कि पत्थलगड़ी करनेवाले अलग देश और उस इलाके में अलग मुद्रा चलाने की बात कर रहे हैं. खबर में यह भी बताया जा रहा था कि पत्थलगड़ी करनेवालों ने बच्चों के स्कूल जाने पर भी रोक लगा दी है. स्कूल जाने के लिए कई शर्तें भी लगा रखी थीं. कुछ दिन पहले दिये इंटरव्यू में यूसुफ पूर्ति ने मीडिया में आ रही कई खबरों को सिरे से खारिज कर दिया था. इंटरव्यू के अंत में यूसुफ पूर्ति ने मीडिया में आ रहीं खबरोंं पर भी सवाल उठाया है. पेश है इंटरव्यू की अंतिम किस्त.

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सवाल : अमित शाह ने किन योजनाओं को उलिहातू में शुरू करने की बात कही थी ?

जवाब :

जब अमित शाह उलिहातू आये थे, तो उस दौरान वहां के लोगों को डराया-धमकाया गया. ये लोग तानाशाही कर रहे हैं. हमलोग वहां कुछ नहीं कर रहे थे, उलिहातू के लोग खुद से वहां सबकुछ कर रहे थे. लोग पत्थलगड़ी की तैयारी कर रहे थे, लेकिन उन्हें धमकाकर वहां दबा दिया गया. अभी वहां माइन्स का प्रोसेस रुका हुआ है, लेकिन वहां यह आगे होगा. इसी तरह से पड़ासी को देख लीजिये. पड़ासी को पहले ये लोग आदर्श ग्राम बनाया, फिर उसके बाद विशेष ग्राम बनाया, इसके बाद कड़िया मुंडा ने गांव को गोद ले लिया और गोद लेने के बाद पता चला कि अरे वहां तो सोना है.

अरे बाबा पड़ासी गांव को आदर्श गांव, विशेष गांव बनाकर गोद लेकर के सोना निकालने का काम शुरू कर दिया, तो पड़ासी वाले अभी पत्थर ले गये. इसी तरह से उलिहातू को भी आदर्श-विशेष गांव बनाकर फिर उसको गोद लिया, तो यही तो धंधा चल रहा है. फिर इधर आपका परांदा से नीचे तीलमा तारूक जाइये, तो वहां भी आपको आदर्श गांव, विशेष गांव बनाया हुआ है, जहां तेल का कुआं है. मतलब वहां भी तेल पझर रहा है, तो उसको ये लोग देखा है और इसलिए ऐसा कर रहा है.

फिर आप चले जाइये गुदड़ी, वहां मनोहरपुर है, तो वहां भी वही स्थिति है. तो बहुत जगह हमारा इस खूंटी इलाके में सोना बिछा हुआ है. इसी को देखते हुए कंपनियों को यहां लाया गया, हमलोग को समूल विस्थापित करने के लिए ये रघुवर सरकार को लाया गया. इसलिए हमें अपने आपको बचाने के लिए यह कदम उठाना पड़ा, हमको अपनी जमीन को बचाना है, क्योंकि जिसकी जमीन है, उसी का खनिज है.

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सवाल :  क्या आपने सीएनटी का अध्ययन किया है ? किस आधार पर खनिजों पर ग्रामसभा का हक मानते हैं ?

जवाब :

इस धरती से 15 हजार किलोमीटर ऊपर और  धरती से 15 हजार किलोमीटर नीचे आदिवासियों का है. सीएनटी को दफा दो बोलता है, लेकिन इसको पहले ही विलोपित कर रखा है. तो अभी भी दफा दो विलोपित लिखा हुआ है. इस तरह से हमलोगों को बुड़बक समझकर और अंधेरे में रखकर सबकुछ हुआ. लेकिन जब सारे अधिकार को हमने जाना और समझा और सीखने के बाद जब हम बाहर निकल रहे हैं इस अधिकार का अनुपालन करने के लिए, तो तब जाकर सरकार होश में आयी और कहने लगी कि ये लोग संविधान का गलत व्याख्या किया है. जमीन अधिग्रहण करना गलत नहीं है उनके लिए, लेकिन जब हम हमारे लिए संविधान की बातों को बाहर निकाल रहे हैं, तो ये उनके लिए गलत है. तो ये उनका प्रॉब्लम है, मेरा नहीं.

सवाल : नॉन ज्यूडिशियल व्यवस्था की बात किस आधार पर कर रहे हैं ?

जवाब :

वैसे हमलोग यह जान गये हैं कि अखिल आदिवासी ओनर ऑफ इंडिया हैं. हम भारत सरकार हैं. हम गुजरात के दादा कुंवर केशरी के कुटुंब परिवार हैं. इसलिए जो भी है, हमलोग को वहां से सारा दस्तावेज दिया गया है. इसलिए आपलोग चलिये नॉन ज्यूडिशियल व्यवस्था पर आइये, तभी आपलोग इससे बच सकते हैं.

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सवाल : क्या ग्रामसभा पर देश का कानून लागू नहीं होता, क्यों अलग देश की बात मीडिया रिपोर्ट्स में आ रही हैं ?

जवाब :

यह एक अलग देश है और ग्रामसभा नोट छापेगी, ये गलत बात है. सिर्फ एक अफवाह है. ये सबकुछ दलाल लोग कर रहे हैं. ये लोग अपने को चर्चा में बनाये रखने के लिए कर रहे हैं और मीडिया वाले इसको मसाला के रूप में छाप रहे हैं और अपनी  प्रतियोगिता की दौड़ में लिख रहे हैं. लेकिन ये सबकुछ गलत है. न तो ग्रामसभा अलग देश की मांग कर रही है और न ही अलग नोट छापेगी. ग्रामसभा बोल रही है कि यह भारत देश पूरे गांव का देश है और आदिवासियों का है. यह बात चूंकि लैंड रेवेन्यू रूल बोल रहा है, यह हम अपने से नहीं बोल रहे हैं.

लैंड रेवेन्यू रूल 1921, 1972 साफ बोलता है कि पूरे भारत देश में सिर्फ और सिर्फ आदिवासियों का जमीन है. लैंड रेवेन्यू रूल से यह प्रमाण मिल रहा है कि गैर लोग लूटा है. यह हम नहीं बोल रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट बोल रहा है. इसमें केंद्र और राज्य का एक इंच भी जमीन नहीं है. ये सारा जमीन आदिवासी का है, तो सरकार भी आदिवासी लोग ही हैं. भारत सरकार भी आदिवासी लोग ही हैं, तो ऐसे में अलग देश और मुद्रा का बात फिजूल है.

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सवाल : ग्रामसभा के जरिये अलग से बच्चों को शिक्षा देने की बात आखिर क्यों सामने आ रही है?

जवाब :

वर्तमान में आदिवासियों पर केंद्र और राज्य जो इतना तीखा हमला कर रहा है, इतना अत्याचार कर रहा है कि हम आदिवासियों को जो एससी-एसटी का जो आरक्षण दिया गया, तो उसे भी खत्म कर दिया गया. जब हम अपने बच्चों को ज्यूडिशियल स्कूल में पढ़ा रहे हैं और ज्यूडिशियल व्यवस्था में हमारा आरक्षण नहीं है और आरक्षण को इस रघुवर दास ने खत्म कर दिया है. तो ऐसे में हमारे पास भी एक ऑप्शन है.

हम भी कानून बनाकर लागू कर सकते हैं अपने भू-भाग पर. और दूसरी बात है कि ज्यूडिशियल व्यवस्था में हमारा नॉन ज्यूडिशियल पढ़ाई नहीं होती है, सिर्फ ज्यूडिशियल की पढ़ाई होती है. कॉलेजों में भी इसकी पढ़ाई नहीं है, वहीं नागरिक शास्त्र, पॉलिटिकल साइंस और लोकतंत्र की पढ़ाई है, तो हमारा व्यवस्था का पढ़ाई तो कहीं नहीं है. इसलिए हम छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक ज्यूडिशियल व्यवस्था के मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक गुलाम हैं. अब इस गुलामी के जंजीर से हमको अभी बाहर निकलना है. इसलिए क्यों न हम अपने बच्चों को अपने पारंपरिक व्यवस्था का शिक्षा दें.

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सवाल :  वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का आपलोग क्यों विरोध कर रहे हैं ?

जवाब :

शत-प्रतिशत आरक्षण का लोक अधिसूचना जब तक राज्यपाल लागू नहीं करेंगे, तब तक हम अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे. और स्कूल में तब जायेंगे, इसमें शर्त यह है कि जब ट्राइबल सबप्लान का पैसा अनुच्छेद 275 के तहत मिलना है, ग्रामसभा के लिए और वह मिले. यही हमारा शर्त है और इसके बाद जो सिलेबस की बात है, तो हमारा व्यवस्था का जो शिक्षा है, ये तो रहेगा ही.

इसके अलावा गणित, फिजिक्स, केमिस्ट्री  और बाकी जो अच्छी चीजें और अच्छी बातें हैं ज्ञान से संबंधित हैं, वह सब रहेगा हमारा सिलेबस में. लेकिन हमारे व्यवस्था से संबंधित जो शिक्षा है, उसे हम इसमें डालेंगे. तो इन्हीं शर्तों के साथ हम स्कूल में वापस लौटेंगे. हमारा मांग है कि शत-प्रतिशत आरक्षण का मांग हमारा नॉन ज्यूडिशियल का लोक अधिसूचना राज्यपाल और झारखंड सरकार जारी नहीं करता है, तब तक हम बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे, यह ग्रामसभा का फैसला है और यह कोई वैयक्तिक नहीं, बल्कि ग्रामसभा के रेगुलेशन में लिया गया फैसला है. हम सारी चीजें तो अपने ग्रामसभा में कर रहे हैं और कभी उनके क्षेत्र में धरना करने नहीं गये हैं. गांव में करने के बावजूद भी वे आक्षेप कर रहे हैं. वैसे अभी विकास के लिए भी कई बातें हमारे व्यवधान में हैं.

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