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प्रेमचंद पर बात करना जरूरी, हामिद का चिमटा कैसे भूलें, होरी की मृत्यु कैसे संभालें?

बूंदें बरस रहीं हैं मिट्टी जाग रही है. उसकी कुक्षि में हलचल हो रही है, अभिलाषा सोंधी हो रही है, श्रम का अनुष्ठान स्वेद में घुलकर जीवन की जिन्दा महक बन गया है,

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प्रेमचंद जयंती पर विशेष

Dr Ratnesh Vishwaksen  

बूंदें बरस रहीं हैं मिट्टी जाग रही है. उसकी कुक्षि में हलचल हो रही है, अभिलाषा सोंधी हो रही है, श्रम का अनुष्ठान स्वेद में घुलकर जीवन की जिन्दा महक बन गया है, बीज में गीत ढल रहे हैं, अन्न में ब्रह्म मुस्कुरा रहा है. वीर भोग्या वसुंधरा की महागाथा खेतों में धंसे पैरों से लिपट रही है. रोपा कर रहे किसानों को देखकर संसार में होने का, इस दृश्य के साक्षी बनने का अवसर पुलकित करता है, पर यह क्या कुछ ही दूर चलने पर कंधे पर बैताल की तरह बैठ जाता है.  होरी और प्रश्न करता है. हामिद चिमटा लिये है कि इसका क्या करें?

प्रेमचंद पर बात करना भारतीय समाज और विशेषकर उत्तर भारत के समाज के उस हिस्से पर बात करनी है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने प्रेमचंद की अंतिम रचना के लगभग तीस साल बाद लिखे उपन्यास रागदरबारी में देहात का महासागर कहा है. क्यों जरूरी है आज भी प्रेमचंद पर बात करना? क्या इसलिए कि यह एक रस्म है और इसे निभाना है, फूल चढ़ा कर प्रणाम में हाथ जोड़ देना है? तब तो बहुत आसान है, आसान दिखने वाले प्रेमचंद और उनके किरदार आपको तब नील कुसुम से अलभ्य लगेंगे, पर यह इतना आसान नहीं है.

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भारतीय समाज को ठीक-ठीक पहचानने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी

हम उस दौर में है जहां हमारे आसपास जिस आभासी समाज का दैत्याकार प्रतिसंसार रचा, पसारा और परोसा जा रहा है,  उसके ठीक विपरीत वास्तविक भारतीय समाज को ठीक-ठीक पहचानने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है. तकनीक के नव्यतम समय में संवेदना के निम्नतम पायदान पर खड़े मनुष्य, मनुष्य जाति को मलबे में बदलने से रोकने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है. लाभ और लोभ की बेईमान चमक जो अवसर के अंधेरे में मुनाफे की मांद में गुर्रा रही है, उसकी जबड़े में फंसी ईमानदारी को खींचकर बचा लेने की तड़प के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है. प्रेमचंद के शब्दों में ही कहें तो बिगाड़ के डर से ईमान की बात कहने से न चूकने के लिए उनपर बात करना जरूरी है.

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हामिद, हल्कू, वंशीधर भारतीय समाज के वास्तविक प्रतिनिधि हैं

हामिद, हल्कू, वंशीधर, आनंदी, सूरदास, धनिया, होरी जैसे किरदार जो भारतीय समाज के वास्तविक प्रतिनिधि हैं और जो कभी बचपन के मेले से चिमटा खरीदकर, पूस की ठंढी रात में कुत्ते झबरू से गले लगकर, धन और धर्म में से धर्म का चयन कर, टूटते संयुक्त परिवार को अपनी इयत्ता की घुलनशीलता से बचाकर, सौ बार हारकर भी सौ बार लड़ने के लिए तैयार होकर, अपने ही खेत में मजदूरी करते हुए मरकर भी हर बार बचा ले जाते हैं, मानवता के उम्मीद की आखिरी किस्त जिससे भारतीय समाज का ऋण चुकाया जा सके, हक अदायगी कर सके. इस हक अदायगी की तकलीफदेह स्थिति को आत्मसात करने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है. राजनीति के आगे चलने वाली साहित्य की मशाल की सच्चाई कितनी बेधक है, इतिहास द्वारा हत्या कर दी गई संभावनाओं को साहित्य द्वारा बचा लेने की जिम्मेदारी यातनादायी होकर भी कितनी ग्राह्य है इन्हें जानने पहचानने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है.

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कृषि प्रधान देश के भारतीय समाज की समूची तस्वीर को उसकी पूरी थरथराहट में पाने के लिए ही नहीं बल्कि उनकी रचनाएं प्रहरी बनकर जिस तरह हमारी पाठकीयता और संवेदना को निष्ठुर होने से तब भी और अब भी बचाती रही हैं इस दायित्व को समझने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है.

उनके यहां जो आदर्श है वह उपदेश नहीं है 

दुनिया जितनी रंगीन होती जायेगी, सादगी उतनी जरूरी होती जायेगी. तब प्रेमचंद से बेहतर शायद कोई और न मिले उस सादगी और शाइस्तगी को बचाने के लिए. उनके यहां जो आदर्श है वह उपदेश नहीं है.  वह तो उपदेशगंधी आदर्श में विश्वास भी नहीं रखते थे. आदर्श इसलिए था कि विपरीत, प्रतिकूल एवं थकान से भर देने वाले जीवन को बर्दाश्त किया जा सके. उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदला और सरलता में कमाल किया. उनके ही शब्दों में अब और सोने का वक्त नहीं है, ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है. नींद में चलने की आदत के अभ्यस्त भारतीय समाज को जगाने के लिए प्रेमचंद पर बात करना जरूरी है.

जहां एक ओर कविता है, कल्पना है

एक ही कालखंड के दो अलग संदर्भ कई बार चकित करते हैं जहां एक ओर कविता है, कल्पना है, हताशा से भरे मनु को श्रद्धा कर्म का संदेश देकर, हार बैठे जीवन का दांव’, जीतते मरकर जिसको वीर का उपालंभ देकर अवसाद से निकाल रही है तो दूसरी ओर उपन्यास है, वास्तविकता है, जहां अपने ही खेत पर मजदूरी करता हुआ होरी किसान से मजदूर होकर खेत हो जाता है. उधर नायक अवसाद से निकल रहा है.  इधर पाठक अवसाद में धंसता चला जा रहा है.

उधर कल्पना वाष्प बनकर उड़ रही है, इधर वास्तविकता ठोस बनकर चुभ रही है. आप यह माने या न माने, स्वीकारें या अस्वीकारें, सामना करें या मुंह मोड़ें, पर सच तो यह है कि जो ठोस है वह तो चुभेगा ही. ठीक यहीं पर पाठक का प्राण पपीहा होकर रट लगाये पूछता है कि हामिद का चिमटा कैसे भूलें, होरी की मृत्यु कैसे संभालें, कैसे संभालें?

                                                       लेखक झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय, रांची, हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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