Opinion

पहले से परेशान मजदूरों के अधिकारों पर इन राज्यों ने किस कठोरता से हमला किया है, जानना जरूरी है  

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Faisal Anurag

कोविड 19 के बहाने छह राज्य सरकारों ने मजदूरों और गरीबों के हक पर हमला किया है. इनमें तीन भारतीय जनता पार्टी शासित राज्य हैं और दो कांग्रेस शासित. एक राज्य में गैर भाजपा गठबंधन की सरकार है. मजदूरों के अधिकारों पर जो हमला राज्यों ने किया है इसमें उत्तर प्रदेश ने सबसे तीखा हमला किया है. इसे इस तरह समझा जा सकता है.

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उत्तर प्रदेश

38 श्रम कानूनों में 32 को ससपेंड कर दिया है. अगले हजार दिनों तक यानी तीन साल तक कानून स्थगित रहेंगे.

जिन महत्वपूर्ण प्रावधानों को उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थगित किया है इन में प्रमुख हैं, न्यूनतम मजदूरी एक्ट, समान वेतन एक्ट, औद्योगिक विवाद एक्ट, फैंक्ट्री एक्ट, ट्रेड यूनियन एक्ट, औद्योगिक मजूदर एक्ट, अंतरराज्यीज माइग्रेट एक्ट, कर्मचारी प्रोविडेंट फंड एक्ट, कांट्रेक्ट एक्ट, इम्प्लाएज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट, असंगठित मजूदर सोशल सिक्युरिटी एक्ट और ट्रेड यूनियन एक्ट.

अगले तीन महीनों तक फैक्ट्री को किसी भी निरीक्षण से मुक्त कर दिया गया है.

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कार्य दिवस को 8 घंटे से बारह घंटे कर दिया गया है.

इन्हें छोड़ कर सारे कानूनों को यूपी सरकार ने स्थगित कर दिया है- 1 Building and Other Construction Workers’ Act, 1996.  2. Workmen Compensation Act, 1923.  3. Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976.  4. A section of Payment of Wages Act to apply.

गुजरात

उत्तप्रदेश के बदलावों की तरह ही गुजरात सरकार ने  अगले 1200 दिनों के लिए कंपनियों को तमाम तरह के लेबर एक्ट से मुक्त कर दिया है. साथ ही कार्य दिवस को 12 घंटे कर दिया है. यह न्यूनतम कार्य दिवस होगा जिसके लिए किसी तरह के बोनस की जरूरत को खत्म कर दिया गया है. गुजरात में अब कोई भी कंपनी मजदूरों की सुरक्षा या देखरेख के दायित्व से मुक्त होगी.

मध्यप्रदेश

1000 दिनों के लिए मध्यप्रदेश में भी कंपनियों को लेबर एक्ट में छूट प्रदान की गयी है. और 12 घंटे के अनिवार्य कार्य दिवस का प्रावधान किया है. इसके साथ मध्यप्रदेश ने वेज के सवाल पर भी कंपनियों के अधिकार को पुख्ता बनाया है. यहां तक कि मजूदरों के सुरक्षा मानदंडों के सवाल पर भी कंपनियों को छूट दी गयी है. कंपनियों में साफ सफाई के साथ ही वेंडिलेशन जैसे जरूरी मामलों में भी कंपनियों के हितों को मजबूत किया गया है. मध्यप्रदेश में अब कंपनियों के अंदर क्रेज और रेस्ट रूम की व्यवस्था अनिवार्य नहीं होगी.

राजस्थान

नियोजक और नियोक्ता के संबंधों में बदलाव किया गया है. नियोजकों को तमाम अधिकार दे दिए गए हैं. जिसमें मजूदरों के हितों को नजरअंदाज करने के अधिकार भी शामिल हैं. तीन साल के लिए लेबर कोर्ट या ट्रिब्यूनल को राजस्थान ने स्थगित कर दिया है. यह संशोधन राज्य के कानून के सेक्सन 2 ए में किया है. 9डी, 25के और 25 एन सेक्सनों में भी बदलाव कर दिए गए हैं. इनके तहत मजूदूरों की छंटनी, मजूदरी के संगठित होने के अधिकार शामिल हैं.

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र सरकार ने वर्किंग आवर को 12 घंटे किया है. इसके साथ राज्य कानून सेक्सन  51,52,54 और 56 में बदलाव कर मजूदरों के अधिकारों पर कुठाराघात किया है. महाराष्ट्र ने किसी भी तरह के ओवरटाइम के प्रावधान को स्थगित कर दिया है. इस संशोधन के अनुसार लगातार 115 घंटे काम करने के बाद भी मजूदरों को बोनस नहीं दिया जाएगा और वे कोई दावा भी नहीं कर सकेंगे.

पंजाब

निर्माण एक्ट, वर्कमेन कंपंनसेशन एक्ट, वेजेज एक्ट में बदलाव किया गया है. इन बदलावों का सीधा असर मजूदरी, छंटनी के बाद मिलने वाली राहत और कार्य दिवस पर पड़ेगा. पंजाब ने हाल में न्यूनमत मजूदरी की बढ़ोत्तरी को भी पहले की तरह ही कर दिया है.

नरेंद्र मोदी के सरकार में आने के बाद से श्रम कानूनों में बुनियादी बदलाव की बात होती रही है. केंद्र सरकार मजूदूरों के हितों के बजाय मालिकों के हितों और सुविधाओं को कानूनी मान्यता देने के लिए तत्पर रही है. राज्य सरकारों के बदलावों को केंद्र ने हरी झंडी दे दी है. इसका असर देश के अन्य राज्य सरकारों पर भी पड़ना तय है. कोविड 19 का बुरा प्रभाव पहले से ही मजूदरों पर पड़ा है. मजूदर जब हजारों किलोमीटर की दूरी सड़कों से पैदल तय कर रहे हैं, उसी दौर में राज्य सरकारों ने यह कठोर कदम उठाया है.

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर इन बदलावों का विरोध किया है. उन्होंने कहा है कि कोविड की त्रासदी के दौर में इस तरह के बदलाव को सहा नहीं जा सकता है. जो बुनियादी सिद्धांतो के खिलाफ है. सीपीआईएम के महासचिव तपन सेन ने कहा है कि मजदूरों को गुलाम बनाने के इन बदलावों का विरोध होगा. सीटू के प्रतिनिधि ने भी श्रममंत्री से बात भी की है. आरएसएस के ही संगठन भारतीय मजूदर संघ के नेताओं ने भी केंद्रीय गृह औऱ श्रम मंत्री से मिलकर विरोध जताया है. इस संगठन के नेताओं ने कहा है कि यह सहा नहीं जा सकता है.

ऐसे दौर में श्रम कानूनों को बदल कर राज्य आर्थिक गतिविधयों को तेज करने की बात कर रहे हैं. उनका मकसद राज्यों में ज्यादा से ज्यादा कंपनियों को लुभाना है. लेकिन इस क्रम में मजूदर मुद्दों के जानकारों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका तर्क है इससे न केवल मजूदरों की उत्पादकता कम होगी बल्कि कमजूदरों ने 100 सालों के संघर्ष और कुर्बानी के बाद जो राहत और सुविधा हासिल की है, उससे वे वंचित हो जाएंगे. यह दौर मजूदरों को नए तरह का गिरमिटिया बनाने की पहल जैसा दिखता है.

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जो बदलाव किए गए हैं वे भारत के संविधान के प्रावधानों का भी उल्लंघन हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट के कई मजदूर हित के फैसलों की भी अवज्ञा की गयी है. इसमें मजूदरों की छंटनी को ले कर 1988  का वह फैसला भी है जो मजूदरों के हितों की गारंटी तय करता आया है. संविधान के मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों की भी इसमें अवज्ञा की गयी है. संविधान के अर्टिकल 21 और 15 का भी यह उल्लंघन है. जो गरिमा के साथ जीने ओर समानता के अधिकार की गारंटी प्रदान करता है.

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