Opinion

प्रवासी मजदूरों व छात्रों को वापस लाने का मुद्दा : केंद्र ने साधनहीन राज्यों को जूझने के लिए अकेला छोड़ दिया है

Faisal Anurag

लॉकडाउन में फंसे मजदूर और छात्रों की घर वापसी तो संभव है लेकिन केंद्र सरकार ने इसका दायित्व राज्यों को दे कर अपना पल्ला झाड़ लिया है. कई ऐसे राज्य हैं, जिनके लिए इस घर वापसी के कार्य को अंजाम देना एक बडी चुनौती है. मजदूारे के विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार दबाव में तो आयी है लेकिन वह विदेशों से भारतीयों को लाने जैसे प्रबंध के संदर्भ में कुछ नहीं बोल रही है. केंद्र की गाइडलाइन इसके लिए एक तरह से राज्यों को ही जिम्मेदारी दे रही है.

कोरोना संकट के बीच जिस तरह केंद्र राज्य संबंधों का सवाल गहराया है, उसी नजरिए से इस पूरे घटनाक्रम को भी देखा जा सकता है. उत्तरप्रदेश सरकार ने अपने प्रदेश के छ़ात्रों को कोटा से बुला कर देश भर में खलबली पैदा कर दी थी. देश के अनेक शहर ऐसे हैं जहां बिहार, झारखंड ओडिशा, छत्तीसगढ के छात्र बड़ी संख्या में फंसे हुए हैं. उनकी समस्या गहरा गयी है. झरखंड सरकार ने इसके लिए अपने वरीय अफसरों को वर्क प्लान बनाने का ओदश दिया है.

साथ ही रेल मंत्री से विशेष रेलगाड़ी चलाने की मांग भी की है. केंद्र सरकार ने जब कि स्पष्ट कर दिया है कि  इन मजदूरों, छात्रों व सैलानियों को केवल सड़क मार्ग से यात्रा की इजाजत दी जाएगी. केंद्र की  गाइडलाइन में कुछ शर्तें भी हैं. जो बेहद कठोर हैं.

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इस गाइडलाइन के बाद राजद के नेता शिवानंद तिवारी ने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं. शिवानंद जी ने अपने फेसबुक बॉल पर लिखा है: भारत सरकार ने अपने नए आदेश द्वारा राज्यों को कहा है कि वह अपने यहां के उन बच्चों को जो बाहर पढ़ रहे हैं, केंद्र द्वारा जारी निदेशों का अनुपालन करते हुए वापस ला सकते हैं. छात्रों के अलावा इसी आधार पर प्रवासी श्रमिकों को भी वापस बुलाने की अनुमति मिल गई है.

नीतीश जी के सामने अब कोई रास्ता नहीं बचा है. बार-बार वे लॉकडाउन का  हवाला देकर भारत सरकार से इस मामले में निदेश मांग रहे थे. वह निदेश अब मिल गया है. बच्चों के साथ-साथ प्रवासी श्रमिकों को भी वापस लाने का रास्ता भी भारत सरकार ने खोल दिया है. जहां तक बच्चों का और विशेष रूप से कोटा में पढ़ने वाले बच्चों को बिहार ले आने की बात है,  उनकी संख्या तो सीमित है. सरकार अपने साधनों से उनको वहां से यहां ले आ सकती है. लेकिन बाहर फंसे प्रवासी श्रमिकों को जिनकी संख्या एक अनुमान के अनुसार  लगभग 30 लाख है, अपने साधन से वापस ले आना क्या राज्य सरकार के लिए संभव है!

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जहां तक कोरोना की महामारी से संघर्ष का सवाल है, तमाम राज्य सरकारें अबतक लगभग अपने अपने साधनों से ही इसका मुकाबला कर रही हैं. केंद्र सरकार निदेश जारी करने के अलावा किसी प्रकार की मदद राज सरकारों को नहीं कर रहा है. राज्य सरकारों के साधन अत्यंत सीमित हैं. विशेष रूप से जीएसटी लागू होने के बाद राज्य सरकारों के पास आय का बहुत ही सीमित स्रोत बचा है. राज्यों के आर्थिक पैकेज की मांग को केंद्र सरकार अबतक नजरअंदाज करता रहा है.

यहां तक कि झारखंड जैसे सबसे पिछड़े और सबसे ज्यादा गरीब आबादी वाले राज्य के द्वारा बार-बार मांग करने के बावजूद जीएसटी का उसका हिस्सा अभी तक नहीं मिल पाया है. झारखंड के भी लगभग सात लाख श्रमिक राज्य के बाहर काम कर रहे हैं. प्रायः सभी घर वापस आना चाहते हैं. झारखंड सरकार कैसे उनको वापस लाएगी? उसके पास क्या साधन है! इसलिए ऐसा निर्देश जारी कर, यह जानते हुए भी कि राज्य सरकारों के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वे इतनी संख्या में लोगो के आने का प्रबंध कर सके – आखिर क्या साबित करना चाहता है.

इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्र पर सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने आरोप लगया है कि वह ज्यादा अधिकार हासिल कर राज्यों के साथ बिगब्रदर जैसा व्यवहार कर रहा है और राज्यों के संकट को साझा नहीं कर रहा है.

इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि राज्य सरकारों को आर्थिक राहत पैकैज की जरूरत है. इस दिशा में केंद्र सरकार ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. जबकि पीएम केयर फंड में लोगों ने खुल कर दान किया है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण तो इन सवालों पर पूरी तरह खामोश हैं. हां, उनकी खमोशी राहुल गांधी के ट्वीट के बाद बाद जरूर टूटी. लेकिन वह भी यूपीए सरकार पर दोषारोपण के लिए. भगौड़ों के कर्ज जिस तरह से राइट ऑफ किये गये हैं, उसके बाद विवाद गहरा गया है. क्योंकि इस सूची में बदनाम मेहुल चौकसी और नीरव मोदी भी हैं.

इसकी संभावना कम है कि 66 हजार करोड़ से ज्यादा की राशि को केवल रिजर्व बैंक ही अपनी पहल से राइट ऑफ कर दे. इस सवाल के उठते ही वित्तमंत्री सक्रिय हुईं. देश के आर्थिक हालत को ले कर वित्तमंत्री की खामोशी तो पहले से ही चर्चा में है. यह एक अजीब राजनीतिक दौर हैं. जहां विपक्ष के एक नेता के बयान पर पूरी सरकार हमलावर हो जाती है. उसे ही कठघरे में करने के लिए. और जिस सवाल को उठाया जाता है उस पर कोई बहस ही नहीं की जाती है. मजूदरों और छात्रों की वापसी का विवाद भी इसी का हिस्सा है.

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