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कलाप्रेमी पाटकरों की चित्रकारी तोड़ रही दम, कला से दूर हो रहे लोग

पत्थरों से रंग बनाने और जीवंत चित्रकारी में महारत हासिल है समुदाय के लोगों को

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  • झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल में पाये जाते है ये समुदाय
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Ranchi: अलग-अलग पत्थरों से रंग बनाना और उन रंगों से चित्रों को रंगना, यही खासियत है पाटकर समुदाय की. जो जंगलों में रहते हैं और वनोत्पदों से कलाकारी करते हैं. पत्थर पीसकर रंग बनाना और उससे पेंटिग करना, इस पेंटिंग को पाटकर समुदाय बनाते हैं. इसलिए इसे पाटा चित्रा के नाम से जाना जाता है. जमशेदपुर  से 60 किलोमीटर की दूरी पर आमाडुबी गांव है, जहां पाटकर समुदाय के कुल 35 घर में लगभग सौ लोग होंगे, जो वर्षों से पाटकर पेंटिंग से ही अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं. इसी गांव के विजय चित्रकार ने जानकारी दी कि पाटकर लोग जंगलों के आस पास रहते हैं. जो नदियों और जंगलों से अलग अलग पत्थर, पत्ता और फूल आदि से रंग बनाते हैं. कला प्रेमी ये समुदाय पारंपरिक चित्रकारी करते है, जो पौराणिक कथाओं, कृष्ण लीला, वन्य जीव, आदिम जन जीवन, जंगल, प्राकृतिक सौंदर्य आदि से प्रेरित होते हैं. इनके पेंटिंग से प्रकृति प्रेम देखने को मिलता है.

लुप्त हो रही पाटकरों की विरासत

विजय ने जानकारी दी कि पाटकर समुदाय अपनी चित्रकारी के कारण ही जानी जाती थी, लेकिन ग्रामीण सभ्यता से ये कभी बाहर नहीं निकल पाये. जिसके कारण अब यह समुदाय और पाटा चित्र दोनों धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. उन्होंने बताया कि कुछ लोग हैं, जो पेंटिंग के महत्व को जानते हैं. वे ऑर्डर पर या गांव आकर पेंटिंग ले जाते हैं. कई मेलों में भी स्टॉल लगाने पर पेंटिंग को लोग जान रहे हैं, जो फोन करके ऑर्डर देते हैं.

तीन राज्यों में पाये जाते हैं पाटकर

कला प्रेमी पाटकर लोग मुख्यत: तीन राज्यों में पाये जाते है. झारखंड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के कुछ गांवों में ये समुदाय है, जो अब भी किसी न किसी तरह पाटकर पेंटिंग करते हैं. विजय ने बताया कि पेंटिंग को बाजार न मिलने के कारण अब लोग इस कला से दूर हो रहे हैं. अब ये लोग मनिहारी, मजदूरी समेत अन्य काम करने लगे हैं.

विभिन्न पत्थरों का करते हैं इस्तेमाल

पाटकर पेंटिंग की खुबसूरती देखते ही बनतीं है. प्राकृतिक रंग बनाने के लिए अलग-अलग पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है. जिसमें लाल रंग के लिए रौरी पत्थर, भूरा रंग के लिए भूरा पत्थर, पीला रंग के लिए हल्दी, नदी किनारे पाये जाने वाले सफेद पत्थर से सफेद रंग समेत बबूल गोंद, पलाश के फूल, नीम के रस, नील आदि का इस्तेमाल ये अपने पेंटिंग को रंगने में करते हैं.

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