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क्या भाजपा की आक्रामक राजनीति का मुकाबला करने को तैयार हैं झारखंड के विपक्षी दल

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Faisal Anurag

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झारखंड में विपक्ष की दिशा स्पष्ट नहीं है. लोकसभा की हार के सदमे से नेताओं में पैदा हुई निराशा का आलम यह है कि वे कुछ ही महीनों के बाद होनेवाले विधानसभा चुनाव को लेकर रणनीति नहीं बना रहे हैं. लोकसभा चुनाव में विपक्ष के गठबंधन में शामिल दलों का परस्पर विश्वास न केवल कमजोर हुआ है बल्कि कार्यकर्ता स्तर पर वे कोई उत्साह पैदा करने में कामयाब नहीं हुए हैं. विपक्ष के लगभग सभी दलों के भीतर गठबंधन को लेकर अविश्वास की गहराती खाई के बीच विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं.

लेकिन लगभग सभी दलों में अकेले दम पर लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद सरकार की नाकामियों को वोट में बदलने के लिए जिस तरह की कार्यनीति होनी चाहिए उसका अभाव साफ दिख रहा है. सभी बड़े दलों को न केवल भीतरघात के दौर से गुजरना पड़ रहा है बल्कि नेताओं के पालाबदल की आशंकाएं भी प्रबल हैं.

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2014 में लोकसभा चुनाव के बाद कुछ ही माह बाद हुए चुनाव में विपक्ष का कोई बड़ा गठबंधन नहीं था. बावजूद इसके भाजपा को अकेले दम पर बहुमत नहीं मिल पाया था. लेकिन 2014 से 2019 कई अर्थों में बहुत अलग है. राजनीतिक दलों में यह समझ नहीं दिख रही है. पिछले पांच सालों में राज्य सरकार के खिलाफ जनता के विभिन्न तबकों ने कई बड़े आंदोलन किये हैं. विपक्ष को जनता के इस रोष पर पूरा भरोसा था.

बावजूद लोकसभा चुनाव का वोट शेयर इन दलों में गहरी हताशा पैदा कर गया है. चुनाव के पहले जनता के आंदोलनों को लेकर जिस तरह की बेरूखी इन दलों ने दिखायी वह भी एक बड़ा कारक रहा है. राजनीतिक दल मान कर चल रहे थे कि जनता के विभिन्न तबकों का आक्रोश से पैदा हुए वोट के वे ही स्वाभाविक दावेदार हैं. लेकिन भाजपा ने न केवल झारखंड के लोगों के आक्रोश को कम किया बल्कि बल्कि अपने वोट शेयर को 2014 की तुलना में बढ़ा ही लिया. उसने विरोधी दलों के जनाधार में बड़े पैमाने पर सेंध लगा दिया है. सवाल है कि क्या विपक्ष भाजपा की इस रणनीति ओर चुनाव प्रबंधन का इस हताशा की हालत में मुकाबला कर सकता है.

विपक्षी दलों का चुनाव प्रबंधन कौशल का तरीका परांपगत हैं जब कि वोटर के मनोविज्ञान में पिछले कुछ समय से बदलाव को संबोधित करने का हुनर विकसित नहीं हुआ है. किसी भी विपक्षी दल ने झारखंड के लोगों के बीच वैकल्पिक अवधारणाओं को लेकर किसी तरह की उम्मीद बनाने की अभी तक कोशिश भी नहीं की है.

राजनीतिक रूख की अस्पष्टता भी इन दलों की परेशानी का सबब बनी हुई है. ऐसे संकेत हैं कि गठबंधन के दलों के बीच आपसी संवाद की प्रक्रिया बेहद कमजोर हुई है. इस प्रक्रिया को लेकर जिस तरह का अविश्वास दिख रहा है उससे जल्द उबरने के संकेत भी नहीं मिल रहे हैं.

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लोकसभा चुनाव के बाद अनेक राज्यों में साफ दिख रहा है कि विपक्ष बेहद कमजोर ओर निराश है. और नेतृत्व इस संकट से निपटता हुआ भी नहीं दिख रहा है. विपक्षी दलों ने जिस सामान्य तरीके से 2019 के जनादेश की समीक्षा और आत्म मूल्यांकन किया है उससे भी स्पष्ट है कि भारतीय लोकतंत्र के आंतरिक बदलावों की प्रक्रिया और रूझान को लेकर उसे कोई खास समझ नहीं है.

भारत की राजनीति के विभिन्न दौर में इस तरह के बदलावों ने राजनीतिक के ग्रामर को न केवल प्रभावित किया है बल्कि सामाजिक तानेबाने को उसने बदल-सा दिया है. बिहार में तो गठबंधन के दलों के बीच का आंतरिक विवाद सार्वजनिक हो गया है. इस हालात में नेतृत्व की खोमोशी ओर परिदृश्य से अनुपस्थिति के भी कई संदेश हैं.

उत्तरप्रदेश में तो बहुजन समाज पार्टी ने चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ देने का एकतरफा एलान कर दिया. बल्कि अब मायावती ने अखिलेश यादव के खिलाफ राजनीतिक प्रहार तेज कर दिया है.

मायावती ने एक ओर अपने भाई और भतीजे को पार्टी नेतृत्व में खड़ा कर बहुजन समाज पार्टी की अपनी  ही घोषणा,  पार्टी में परिवारवाद के लिए जगह नहीं है, को तारतार कर दिया है. अखिलेश यादव पर उनका यह आरोप राजनीतिक हलचल बना हुआ है कि उन्होंने अल्पसंख्यकों को टिकट देने का विरोध किया था.

अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया तो अभी तक उपलब्ध नहीं है लेकिन इससे साफ जाहिर हो रहा है कि सपा और बसपा के बीच गेस्ट हाउस घटना की छाया अब भी प्रभावी है. मायावती ने अखिलेश यादव पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने चुनाव में धोखेबाजी की है. यह एक गंभीर आरोप है.

मायावती का यह भी आरोप है कि अखिलेश यादव ने चुनाव परिणाम के बाद उन्हें फोन तक नहीं किया. यूपी में सपा बसपा गठबंधन को लोकसभा चुनाव में मिले वोट कम नहीं हैं. बावजूद मायावती का अकेले चलने का निर्णय विपक्ष की राजनीति और ताकत के लिए घातक है.

राहुल गांधी के इस्तीफा के बाद कांग्रेस एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जिसे अपनी दिशा का अहसास ही नहीं है. इसका असर उन राज्यों पर पड़ रहा है जहां उसकी सरकारें हैं ओर जहां नवंबर में विधानसभा के चुनाव होंगे. झारखंड कांग्रेस की आंतरिक लड़ाई को थामने और चुनाव को लेकर किसी ठोस रणनीति का संकेत अभी तक कांग्रेस तय नहीं कर पायी है.

झारखंड में भाजपा कांग्रेस और झामुमों को राजनीतिक तौर पर चोट देने के लिए उन पार्टियों से दलबदल के लिए सक्रिय दिखायी दे रही है. लोकसभा चुनाव के पहले भी राजद,  झामुमो, झाविमो और कांग्रेस को राजनीतिक तौर पर आघात देने की उसकी रणनीति कारगर रही है.

निकट इतिहास की घटनाओं से सबक नहीं लेने वाले विपक्षी दलों के लिए चुनावी जंग में खड़ा होना आसान नहीं दिख रहा है. आक्रामक राजनीति और रणनीति का लचर मुकाबला किसी के लिए भी आतमघाती ही साबित होता है.

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