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कहीं यह हमारे समाज को आक्रमक बनाने की साजिश तो नहीं !

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Dr Mahfooz Alam

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पिछले एक महीने से देश के विभिन्न भागों में हुई भीड़ की हिंसा ने जनमानस को विचलित कर दिया है. यदि ऐसी घटनाएं एक या दो स्थानों पर हो रही होतीं तो उसे “इत्तिफाक” कहा जा सकता है. लेकिन एक ही साथ कई शहरों में एक ही तरह की घटनाएं हों तो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि यह आग से खेलने का जो तमाशा हो रहा है, कहीं यह योजनाबद्ध एवं सुनियोजित तो नहीं है. कहीं समाज को आक्रमक बनाने की साजिश तो नहीं की जा रही है?

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ताजा घटना 7 जुलाई 2019 की है. जब मध्यप्रदेश के खंडवा जिला में 25 पशु व्यापारियों को रस्सी से बांधकर पशु की तरह लाठी-डंडे से खदेड़ते हुए और नारे लगाते हुए भीड़ दो किलोमीटर दूर थाना ले गयी. यह एक अमानवीय कृत्य है, जिसकी अनुमति भारत का कानून भी नहीं देता है. मात्र यह एक घटना नहीं है बल्कि पिछले कुछ दिनों से इस तरह की  कई घटनाएं लगातार घट रही हैं. जब किसी पर कोई आक्रमण किसी बहाने से किया जाता है तो उसके देखने का नजरिया बिल्कुल बदल जाता है. अभी नया ट्रेंड ये देखने को मिल रहा है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले रातों-रात हीरो बन जाते हैं.

ऐसे लोगों में न तो अपराध बोध होता है और न ही पछतावा. इस तरह के आक्रमण के बहानों का सहारा एक खास समूह ढूंढता है. जैसे अमेरिका ने इराक में जैविक हथियारों को बहाना बनाकर एक हंसते-खेलते देश को हमेशा के लिए बर्बाद कर दिया. इसी प्रकार अमेरिका  ने 11/ 9 की घटना के नाम पर अफगानिस्तान को तहस-नहस कर दिया. मगर दुनिया उसे आतंकवादी नहीं कहती है क्योंकि उसने इस तरह के आक्रमण के बहाने या साधन ढूंढ  लिये थे. यही स्थिति भीड़ की आक्रमकता में भी देखी जाती है.

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कल तक जो नारे दीवारों पर लिखे होते थे, नेताओं के भाषणों में सुने जाते थे या भड़काऊ गीत के रूप में  बजाए जाते थे. आज उन नारों को मूर्त रूप दिया जा रहा है. जबकि कोई धर्म इस प्रकार की अनुमति नहीं  देता  है. किसी महापुरुष के नाम पर हिंसा फैलाना किसी धर्म में मान्य नहीं है. कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि इस तरह की घटनाओं का एक प्रमुख कारण लोगों का ध्यान असल मुद्दे से भटका देना है या  मोड़ देना है.

आज देश में बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक मंदी एक प्रमुख समस्या है. एक रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2018 तक भारत में 31 मिलियन लोग बेरोजगार हैं. पिछली तिमाही में अर्थव्यवस्था में मात्र 5.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है. बिहार में चमकी बुखार ने सैकड़ों मासूमों की जान ले ली है. इस घटना से डाक्टरों, नर्स और दवाओं की कमी भी  उजागर हुई है.

एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है  कि भारत में लगभग बीस लाख नर्सों की कमी है. यहां तक कि  एंटीबायोटिक दवा देने वाले  प्रशिक्षित  नर्स  की संख्या भी बहुत कम  है. केंद्रीय  स्वास्थ्य मंत्रालय  के सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रति 12000 की आबादी पर एक डॉक्टर उपलब्ध है,जबकि WHO के मानक  के अनुसार यह अनुपात 1000  होना चाहिए. यह भी एक सच्चाई है कि हिंसा हिंसा को जन्म देती है. पिछले दिनों मेरठ, दिल्ली और रांची में हिंसा की जो छिटपुट घटनाएं हुई हैं, यह भी निंदनीय हैं. हिंसा का जवाब हिंसा नहीं  है, यदि ऐसा  किया  गया  तो  पूरा समाज  हिंसा की आग में झुलस जाएगा.

ऐसे में सरकार और प्रशासन का परम कर्तव्य है कि किसी को भी हिंसा करने की इजाजत नहीं दी जाये. मौजूदा परिदृश्य में यह और भी सावधानी भरा काम है. प्रधानमंत्री ने अल्पसंख्यक वर्ग का भरोसा जीतने की जो बात कही है, उसका अमल भी अभी दिखना बाकी है.

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