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रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?

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Mohammad Sartaj Alam

Jamshedpur: पूर्वी जमशेदपुर विधानसभा क्षेत्र में दर्जन भर बड़ी कंपनियां स्थित हैं. टाटा के प्रांगण में विश्वविख्यात केबल कंपनी उनमें से एक है. अब ये महज एक इत्तेफ़ाक़ है या कुछ और कि झारखण्ड के CM रघुवर दास पहली बार 1995 में पूर्वी जमशेदपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होते हैं और 177 एकड़ जमीन में फैली विशाल केबल कंपनी हज़ारों कर्मचारियों को बेरोज़गार कर और उनके घरों के चूल्हे बंदकर ठप हो जाती है.

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फिर एक ‘संयोग’  हुआ 2016 में, जब रघुवर दास के मुख्यमंत्री रहते हुए टाटा की एक विख्यात आनुसंगिक इकाई टायो रोल्स कंपनी अचानक बंद हो गयी. रघुवर दास के विधायक बनने के बाद कंपनी बंद होने के ये इत्तेफ़ाक़ यहीं नहीं रुकते, बल्कि कृषि उपकरणों की निर्माता Tata Agrico सबसे पुरानी एवं अग्रणी कंपनी 1925 से फावड़े, दरांती, क्राउबर, पिकैक्स, हथौड़े जैसे उपयोगी उपकरण बनाती रही है. ये कंपनी भी 15 वर्षों पूर्व बंद हो गई. खास बात ये है कि TATA की ये इकाई स्थानीय विधायक रघुवर दास के घर से लगभग 50 मीटर की दूरी पर आज भी वीरान है.

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रघुवर दास के विधानसभा क्षेत्र में टेल्कॉन कंपनी जो आज हिताची के नाम से मशहूर हैं, हाल ही में खड़गपुर शिफ्ट होने को मजबूर कर दी गई. इसी क्षेत्र में स्ट्रिप मिल नाम की एक और कंपनी फिलहाल ICU में अपने दिन गिन रही है. ब्लैक क्लोज़र का रिकॉर्ड बनाते हुए टाटा मोटर्स ने कितने प्लेटों के निवाले छीन लिए किसी से छिपा नहीं.

इसके एकदम विपरीत दुनियाभर में ब्रिज बनाने के लिए विख्यात वायर उत्पादक ऊषा मार्टिन अचानक टाटा की झोली में गिर जाती है. वह टाटा जिसने ऊषा मार्टिन से महज़ एक दीवार की दूरी पर टायो चलाने से हाथ खड़े कर लिए.

फिर  दिवालिया कानून, 2016 के तहत टाटा भूषण स्टील और भूषण एनर्जी का अधिग्रहण भी कर लेती है. ये सब कुछ जो भी हुआ मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल में ही घटित हुआ है, जिसे महज़ संयोग कैसे मना जाये ये एक यक्ष प्रश्न है.

यही नहीं एक के बाद एक लगातार पांचवी बार विधानसभा चुनाव जीतने से पहले रघुवर दास ने कई वायदे किये. वह चाहे 86 बस्तियों के नाम से राजनीतिक हल्के में लब्ध प्रतिष्ठित डेढ़ लाख मतदाताओं के आशियाने को मालिकाना हक़ दिलाने का हो या फिर केबल जैसी कंपनी चलवाने का.

हर बार वायदों के पुल बनाकर विधानसभा पहुंचने वाले रघुवर दास 2019 विधानसभा चुनाव में केबल और टायो के बेरोज़गार कर्मचारियों के बुलावे पर 30 नवम्बर को केबल कंपनी के प्रांगण में जाने से इंकार ही नहीं किया, बल्कि अपना प्रतिनिधि भेजने से भी मना कर दिया.

क्या वजह है कि केबल कंपनी आज भाजपा CM सह स्थानीय विधायक रघुवर दास की दुखती नब्ज़ बन गई है? पिछले 25 वर्षों में हर बार विधानसभा चुनाव के दौरान कंपनी खुलने की जिस उम्मीद पर केबल कंपनी के वेतनहीन कर्मचारी रघुवरदास को जिताते आ रहे थे, अब उनकी उम्मीदों का होगा क्या?

क्या उन कर्मचारियों के सब्र का घड़ा अब भर चुका है? चुनाव के मौसम में जमशेदपुर पूर्वी के इन ज़मीनी मुद्दों से रघुवर दास के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा? टाटा की ठकुराई के बीच केबल और टायो पीड़ितों को कौन दिलाएगा न्याय?

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रघुवर दास के विधानसभा क्षेत्र में वीरान पड़ी है केबल कंपनी

टाटा ने 1904 में कालीमाटी नामक गांव में कदम रखा. इसी गांव ने 1919 में जमशेदपुर के रूप में भारत के पहले औद्योगिक शहर होने की पहचान पाई. इसका नाम जमशेदपुर टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा के नाम पर लार्ड चेम्सफोर्ड ने दिया.

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
टायो कंपनी की कॉलोनी, जिसकी इमारतें मरम्मत के अभाव में टूटने लगी हैं

जमशेदपुर क्षेत्र में उद्योग की संभावनाएं इस कदर थी कि ब्रिटिश इंसुलेटेड केलिन्डर कंपनी (B.CC) ने इस क्षेत्र में इंडियन केबल कंपनी की शरुआत की. बात 1920 की है, जब इंडियन केबल कंपनी की नींव रखने के लिए तब के टाटा समूह ने गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट, 1895 के तहत मिली 15,725 एकड़ जमीन, जो आदिवासियों को विस्थापित कर अंग्रेजों द्वारा लैंड अक्विजिशन एक्ट, 1894 के तहत औने पौने भाव में अधिगृहित की गयी थी, में से 177 एकड़ ज़मीन गवर्नमेंट ग्रांट की शर्तों के तहत हस्तांतरित किया.

1985 तक BLCC के नियंत्रण में रही इंडियन केबल कंपनी के 52% शेयर भारत सरकार के वित्तीय संस्थान के नियंत्रण में चले गए. उन्होंने काशीनाथ तपुड़िया के हाथों में कंपनी की मैनेजमेंट दे दी. तपुड़िया ने 1987 में इंडियन केबल कंपनी का नाम बदल कर INCAB कर दिया.

मार्च 1991 में लाभ में चल रही INCAB ने हमेशा की तरह 20% डिविडेंट देकर कर्मचारियों का मनोबल ज़रूर बढ़ाया. लेकिन, 1992 में अचानक 6 करोड़ का भारी नुक्सान कंपनी की दीवारों को हिलाने के लिए काफी था.

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कारण पूछे जाने पर कर्मचारी यु के शर्मा ने बताया कि उस दौरान कंपनी का वर्किंग कैपिटल 40 करोड़ था, जिसे काशीनाथ तपुड़िया ने दूसरी कंपनियों को लोन ऑन इंटरेस्ट निवेश कर दिए. अब वर्किंग कैपिटल ना होने से नुकसान की भरपाई तो संभव थी नहीं.

सितम्बर 1993 को नम पलकों से याद करते हुए भगवती सिंह बताते हैं कि ये वह मनहूस महीना था, जब हमें वेतन मिलना बंद हुआ. कर्मचारी सह शेयर होल्डर यु के शर्मा ने बताया कि 31/03/94 तक कंपनी को तिरानवे करोड़ अढ़सठ लाख रूपये का कुल घाटा लग चुका था.

52% की हिस्सेदारी वाली भारत सरकार की वित्तीय संस्थान लगातार हो रहे नुकसान से उबारने के लिए .NCAB के लिए विदेशी प्रोमोटर तलाशने शरू किये. ये तलाश लीडर यूनिवर्सल मॉरीशस (LUM) पर जा कर ख़त्म हुई. 30 करोड़ के कुल शेयर में 17 करोड़ का मालिक LUM बना. LUM ने INCAB की बागडोर अपने पार्टनर सत्यम इंकैब को दे दी.

इस बीच कर्मचारियों को खुशियां तब मिलीं, जब अक्टूबर 1996 से उन्हें वेतन दोबारा मिलने लगा. लेकिन, ये खुशी अधिक दिनों तक नहीं टिकी और मार्च 2000 से आज तक स्थिति बिना वेतन जस की तस बनी है.

केबल कंपनी BLFR में क्यों पहुंची

कंपनी के मालिक के पास उसे पुनर्जीवित करने के लिए कोई क्षमता बची नहीं थीं. अतः उन्हें वित्त मंत्रालय के अंग ‘औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड’ यानी बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंसियल रिकंस्ट्रक्शन ( B.FR ) में जाना पड़ा.

24 सितम्बर 1999, इंकैब बोर्ड ने तय किया कि पी घोष BLFR में कंपनी का पक्ष रखेंगे. 22/12/99 को BLFR ने कंपनी को सूचित किया कि उनका आवेदन BLFR में स्वीकार हुआ है, जिसकी सुनवाई 4/4/2000 को केस नंबर 390/1999 के तहत होगी.

4/4/2000 को BLFR ने INCAB को दिवालिया घोषित कर दिया. इसके बाद 2006 में रियल स्टेट की बड़ी कारोबारी कंपनी आर आर केबल लगभग INCAB कंपनी को अधिग्रहण करने के कगार पर थी. तभी केबल यानी INCAB कंपनी के कुछ कर्मचारियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट पिटीशन दायर कर प्रार्थना की कि टाटा को केबल कंपनी को अधिगृहित करने का निर्देश दिया जाय.

यह रिट पिटीशन कैसे दिल्ली उच्च न्यायालय में स्वीकृत हुई, आज तक एक रहस्य है. इस पिटीशन को केबल के कुछ कर्मचारियों ने दायर किया, जिनका टाटा स्टील या टाटा की किसी अन्य कंपनी या टाटा समूह से कुछ लेना देना नहीं था. कमाल देखिये कि जब अधिग्रहण के प्रस्ताव B.FR द्वारा टाटा से मंगाए गये, तब टाटा समूह ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, न ही टाटा समूह ने सीधे दिल्ली उच्च न्यायालय में रिट दायर किया.

केबल यानी INCAB की वर्त्तमान स्थिति

2016 में भारत सरकार ने दिवालिया कानून,2016 लाकर BLFR एवं AALFR को बंद कर दिया और उनकी जगह NC.T नेशनल कंपनी ला ट्राइब्यूनल और NCLAT नेशनल कंपनी लॉ एपीलेट ट्राईब्यूनल ने ली. केबल कंपनी की सुनवाई फिलहाल NCIT की कोलकाता बेंच में चल रही है.

केबल कंपनी पर LUM की मालकियत है लेकिन, मैनजमेंट में नहीं है. कंपनी की और से पैरवीकार यु एन शर्मा ने बताया कि NCLT की कोशिश है कि जनवरी 2020 तक कोई प्रमोटर मिल जाये वर्ना कंपनी की नीलामी कर के सारा बकाया चुकता किया जायेगा.

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प्रमोटर न मिलने पर पेच क्या है ? 

टाटा ने लगभग 15,725 एकड़ ज़मीन अंग्रेज़ सरकार से 99 वर्षों के लिए गवर्नमेंट ग्रांटे एक्ट, 1895 के तहत ली. ये स्थान तब कालीमाटी नामक गांव था, जो अब जमशेदपुर है.

उस गवर्नमेंट ग्रांटे एक्ट के तहत टाटा ज़मीन का इस्तेमाल सिर्फ उद्योग के लिए ही कर सकती थी, और गैरजरूरी जमीन सरकार को वापस करना था या सरकार की सहमति से किसी और को उन्हीं शर्तों पर अपने समानुपातिक पैसे वापस लेकर सौंपना था, न कि किसी को सब लीज देना था.

गौरतलब है कि गवर्नमेंट ग्रांट का उल्लंघन करते ही विस्थापित हुए आदिवासियों का जमीन पर वापस दावा बन जाता था. बावजूद इसके लगभग 11,000 सब लीज़ टाटा ने किया और किराया वसूला जो वास्तव में सरकारी राजस्व है. इधर जब केबल की 177 एकड़ ज़मीन के 99 वर्ष जुलाई 2019 में पूरे हुए तो टाटा अब केबल कंपनी से 177 एकड़ ज़मीन वापस मांग रही है जो उसकी है.

यह जमीन विस्थापित आदिवासी परिवारों के उत्तराधिकारी मांग सकते हैं, या सरकार मांग सकती है अगर गवर्नमेंट ग्रांट की शर्तों का उल्लंघन हो. देश की आज़ादी के बाद 1950 में कानून बने, ज़मींदारी प्रथा का 1956 में अंत हो गया. तो फिर टाटा ग्रांटेड लैंड को सब लीज़ कैसे कर सकती थी?

स्थानीय विधायक रघुवर दास से क्यों है नाराज़गी

केबल कंपनी के कर्मचारियों द्वारा आयोजित केबल टायो बचाव संघर्ष समिति के कार्यक्रम में स्थानीय विधायक के न आने पर लोगों ने कहा कि ये पहला मौका है, जब विधायक जी नहीं आये वरना हर चुनाव से पहले वह हमें आश्वासन देकर जाते थे कि कंपनी चलवाएंगे.

यु एन शर्मा कहते हैं कि 19 साल के झारखण्ड में भाजपा ने लगभग 16 साल सरकार चलाई. इस दौरान रघुवर दास लेबर मिनिस्टर, नगर विकास मिनिस्टर, वित्त मंत्री रहे. इस पर भगवती सिंह कहते हैं कि और तो और आखिर के 5 वर्ष रघुवर दास मुख्यमंत्री रहे.

शर्मा ने कहा कि हमारे विधायक जो अब मुख्यमंत्री हैं, यदि चाहते तो लेबर मिनिस्टर रहते कंपनी के लेबरों की पीड़ा हर सकते थे. लेकिन, इच्छा शक्ति ही नहीं थी. यदि वह नगर विकास मंत्री थे, तो नगर को औद्योगिक नगर घोषित कर सकते थे. यही नहीं शहर के बीचो बीच स्थित 20 साल से वीरान पड़ा 177 एकड़ केबल कंपनी का क्षेत्र विकास कर देश नहीं तो राज्य के समक्ष नए मापदंड रख सकता था.

अमित कुमार चौधरी कहते हैं कि उनके पिता को केबल में 20% का बोनस मिलता था, जबकि टाटा 8.3% बोनस देती थी. खुद को मज़दूर नेता कहने वाले रघुवर दास ज़रा सा भी अपना फ़र्ज़ निभाते तो शायद हमारी शिक्षा भी पूरी होती और हम बेरोज़गार न होते.

सच तो ये है कि रघुवर दास यदि थोड़ी सी इच्छाशक्ति दिखाते तो बतौर लेबर मिनिस्टर लेबर की पीड़ा, नगर विकास मंत्री नगर का विकास एवं वित्त मंत्री रहते हुए लेबर ही नहीं राज्य के वित्त को भी संभाल सकते थे. यहां पर यदि कोई कसर रह भी जाती तो 5 साल मुख्यमंत्री रहते हुए वह जमशेदपुर पूर्वी को निस्कु इंडस्ट्रियल पार्क नहीं तो कम से कम झारखण्ड का सिलिकन वैली तो बना ही सकते थे.

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क्या कहते हैं केबल कर्मचारियों का केस लड़ रहे अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव उर्फ निशांत अखिलेश

केबल कंपनी के मसले पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने जून, 2016 के अपने अंतिम और निर्णायक फैसले में कहा कि टाटा स्टील का take over का प्रस्ताव सबसे अच्छा है. अतः टाटा स्टील केबल कंपनी का take over कर. लेकिन टाटा स्टील को केबल कंपनी का take over नहीं करना था, उसकी नजर तो केबल की जमीन पर थी. टाटा स्टील ने बायफर में यह बहाना किया कि केबल कंपनी के पास Aud.ted Ba.ance Sheet नहीं है, ऐसे में उसका take over मुश्किल है.

दिसम्बर, 2016 में बायफर को समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह NCLT आ गयी. टाटा स्टील NCLT नहीं गयी. 2018 में कुछ कर्मचारी NCLT चले गये और कहा कि केबल कंपनी दिवालिया हो गयी है इसे बचाया जाय. टाटा स्टील के मंसूबे पर पानी फिर गया. टाटा स्टील ने केबल को एक चिठ्ठी भेजकर दावा किया कि केबल को 177 एकड़ जमीन टाटा स्टील ने 1920 में सब-लीज पर 99 साल के लिए दी थी, जो 2019 में समाप्त हो गयी, अतः केबल अपनी जमीन टाटा स्टील को वापस कर दे.

निशांत अखिलेश ने बताया कि मैंने अदालत को बताया है कि Government Grants Act, 1895 के तहत दी गयी 15,725 एकड़ जमीन के किसी भी हिस्से पर टाटा स्टील real estate का धंधा नहीं कर सकती है.

इसलिए उसका दावा फर्जी है. मैंने NClT में एक आवेदन लगाया कि इस मामले में झारखंड सरकार को पार्टी बनाकर पूछा जाय कि उक्त जमीन की कानूनी स्थिति क्या है? NClT ने टाटा स्टील से उनकी आपत्ति मंगा ली. टाटा स्टील ने अपनी आपत्ति में कहा कि बिहार सरकार ने Bihar.and Reforms Act, 1950 को 1972 और 1983 में संशोधित कर 7D और 7E नयी धारायें सन्निविष्ट की और उसके तहत उसे मानद (deemed) लीज दिया गया. यह बेहद हास्यास्पद दावा है.

पहली बात ये मानद लीज क्या होता है, यह किसी कानून में परिभाषित नहीं है. अगर मान भी लें कि ऐसा कुछ है तो मानद लीज टाटा स्टील को 1983 में मिली फिर इसने 1920 में ही केबल को सब-लीज किस कानून के तहत कर दिया?

टायो का बंद होना एक पहेली से कम नहीं

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
बंद हो चुकी टायो कंपनी

टाटा की अनुसांगिक इकाई TAYO कंपनी रघुवर दास के घर से लगभग 18 किलोमीटर की दूरी पर गम्हरिया में स्थित है. टायो कर्मचारी अजय शर्मा रुहासी आवाज़ से बताते हैं कि 12 फरवरी 2016 को अचानक मज़दूर यूनियन को खबर मिली कि टायो अब आगे काम करने की स्थिति में नहीं है. देखते ही देखते 29 फरवरी 2016 का वह मनहूस दिन आया, जब कंपनी को SICA यानी सिक इंडस्ट्री एक्ट के तहत बीमार घोषित कर दिया गया, या यूं कहें कि बीमार करवा दिया गया.

इधर BIFR में बीमार घोषित टायो कंपनी का केस रजिस्टर हुआ, जिसका केस नंबर 48/2018 है. उधर कंपनी ने फेज़ दर फेज़ एक के बाद एक डिपार्टमेंट के प्रोडक्शन बंद करने आरम्भ किये.

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VSS स्कीम का लोभ, फिर भी नहीं हुए कर्मचारी आकर्षित 

इसी बीच 1 मई 2016 को टायो कंपनी ने अपने 700 कर्मचारियों को वॉलंटरी सेपरेशन स्कीम यानी VSS स्कीम लेने का ऑफर दिया. जिसके तहत कंपनी की तरफ से नए कर्मचारियों को 18 महीने एवं पुराने कर्मचारियों को 20 महीने का वेतन क्षतिपूर्ति हेतु मिलना था.

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
अजय शर्मा

अजय शर्मा बताते हैं कि कंपनी ने अधिकारियों को जहां जबरन VSS दिलवाकर बाहर कर दिया, वहीं वर्करों ने पूरी तरह से इसे अपनाने से इंकार कर दिया.

38 साल के आसित ठाकुर बताते हैं कि दो जून रोटी की खातिर हमें आंदोलन शरू करने पर बाध्य होना पड़ा. हमने इस दौरान यूनियन पदाधिकारियों से लेकर जनरल ऑफिस तक का घेराव करते हुए कंपनी में काम फिर आरम्भ करने की बात रखी. इसपर कंपनी प्रबंधन ने 20 माह की जगह 32 माह का वेतन क्षतिपूर्ति के रूप में देने की बात कही. जिसे कुछ यूनियन समर्थित कर्मचारियों ने मान लिया.

टायो कर्मचारी सुनील कुमार बताते हैं कि 175 कर्मचारियों के VSS लेने के बाद कंपनी के MD के शंकर की तरफ से एक और सूचना आयी कि भविष्य में यदि VSS की राशि बढ़ाई जाती है, तो बढ़ी हुई  राशि का लाभ पूर्व में VSS ले चुके कर्मचारियों को भी मिलेगा.

इस बात पर अजय शर्मा बड़ी ही नाराज़गी से कहते हैं कि MD ने खुद क्यों नहीं लिया VSS! वह क्यों आज तक कोलकाता स्थित टाटा सेंटर में अहम पद पर मौजूद हैं? और इधर हम सारे बेरोज़गार होकर कर्मचारी भूखों मर रहे हैं.

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आसित ठाकुर पत्नी व दो बच्चों के साथ

आसित ठाकुर बताते हैं कि मेरी उम्र कम थी, इसलिए मुझे ठेकेदारी में काम मिल गया. लेकिन, जिनकी उम्र 45 से 50 के आस पास है वह तो कहीं के नहीं रहे. आसित से हमने पूछा कि टायो में जब तक वेतन के रूप में कितना मिलता था.

उसने चहकते हुए बताया कि 24 हज़ार रूपये हर महीने मिलते थे. लेकिन, अब तो 8 हज़ार रूपये में घर चलना पड़ता है. पहले कंपनी कर्मचारी होने के वजह से सिर्फ 5 रूपये महीना बच्चों की स्कूल फीस लगती थी, लेकिन  अब 600 रूपये महीना फीस लगती है.

1 सितम्बर 2016 के दिन को याद करते हुए विनायक सिंह बताते हैं कि ये वह दिन है, जब हम सभी कर्मचारियों पर तब दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, जब हमें सूचित किया गया कि आज से कंपनी के सभी विभाग निलंबित किये जाते हैं.

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प्रबंधन डाल-डाल तो कर्मचारी पात-पात

5 सितम्बर 2019, प्रबंधन ने झारखण्ड सरकार के श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग में कंपनी को पूर्णतः बंद करने हेतु आवेदन दिया. इसकी सूचना तुरंत अजय शर्मा को लगी. टायो कर्मचारी अजय शर्मा भारतीय मज़दूर संघ के राष्ट्रिय कार्यकारणी सदस्य भी हैं. उन्होंने आनन फानन उसी श्रम एवं प्रशिक्षण विभाग से जवाब मांगा कि टायो कंपनी को बंद करने का कारण क्या है? झारखण्ड सरकार के श्रम विभाग में प्रधान सचिव एस के जी रहाटे ने तो कर्मचारियों की संघर्ष समिति को भी टायो प्रबंधन के साथ पार्टी बनाया.

27 अक्टूबर को 2016 को प्रबंधन के आवेदन को निरस्त करते हुए रहाटे ने कहा कि 25 सबसेक्शन (0) के तहत किसी ब्व्ही उद्यम के बंद होने से वहां के कर्मचारियों से लेकर सामाजिक वातावरण प्रभावित होता है.

अजय शर्मा बताते हैं कि श्रम विभाग ने टायो प्रबंधन से उल्टा जवाब मांगा कि आपकी एक वर्ष में हानि 5 गुना कैसे बढ़ गई. जिसका तय समय पर संतोषजनक जवाब टायो प्रबंधक नहीं दे पाया. श्रम विभाग ने अपने आदेश में लिखा कि गलत नीतियों के कारण कंपनी हुई है. अतः कंपनी के बंद करने के आदेश को निरस्त किया जाता है.

12 Decembar 2016 प्रबंधन ने श्रम विभाग के आदेश को उच्च न्यालय रांची में चुनौती देते हुए याचिका दायर की. टायो संघर्ष समिति ने इस याचिका के विरोध में इंटरलॉकेटरी आवेदन किया.

12 दिसंबर 2016, प्रबंधन ने श्रम विभाग के आदेश को उच्च न्यायालय रांची में चुनौती देते हुए याचिका दायर की. टायो संघर्ष समिति ने इस याचिका के विरोध में इंटरलॉकेटरी आवेदन किया.

17 दिसंबर 2016, इसी बीच भारत सरकार ने B.FR कानून को निरस्त करते हुए IBC यानी इन्सॉल्वेंसी & वचनस्य कोर्ट नाम से नया कानून लागू किया. इस कानून के तहत मामले का निष्पादन हर हालत में 180 दिनों के अंदर किया जाना था.

13 जुलाई 2017, जांच पश्चात नेशनल कंपनी लॉ बोर्ड अधिनियम के तहत टायो कंपनी को दिवालिया घोषित करने की याचिका दायर हुई.

17 नवम्बर 2017, धारा 10 के तहत कंपनी को दिवालिया घोषित करने की दर्ज याचिका को नेशनल कंपनी लॉ बोर्ड ने ये हवाला देते हुए निरस्त किया कि आप 180 दिनों बाद आये हैं. इधर टायो संघर्ष समिति की याचिका को सेक्शन 9 के तहत दर्ज किया. इसे अदालत ने सुनने योग्य माना.

लेकिन, NCIT ने टायो संघर्ष समिति की याचिका को ये कहते हुए ख़ारिज किया कि आप इंडिविजुअल कैपेसिटी पर आइए. टायो संघर्ष समिति ने NCIT में NCIT द्वारा निरस्त याचिका को चुनौती दी. इधर NCLAT  यानी नेशनल कंपनी लॉ ऐपलीयेट ट्रिब्यूनल ने भी टायो संघर्ष समिति की याचिका को ख़ारिज कर दिया.

जिसके खिलाफ टायो संघर्ष समिति सुप्रीम कोर्ट पहुंची. सुप्रीम कोर्ट ने टायो संघर्ष समिति याचिका पर सुनवाई करते हुए NCLAT से कहा कि आपको वर्करों की याचिका को सुनना पड़ेगा. NCLAT ने सुनवाई कर NCLAT कोलकाता को आदेश दिया कि तायो कंपनी की सुनवाई मोरोटोरियन लगा कर सुनें. ये सुनवाई फिलहाल कोलकाता में जारी है.

सांसद एवं नगर विकास मंत्री मिलने आये, उसी दिन चलीं लाठियां

सुनील कुमार बताते हैं कि रोज़ की तरह हम 14 सितम्बर 2016 की सुबह कंपनी की बस पकड़ कर कुछ ही दूर पहुंचे थे. अचानक ड्राइवर ने बिष्टुपुर में बस रोकी और कहा कि प्रबंधन की तरफ से हमें आदेश हुआ है कि अब बस आगे नहीं जाएगी, आप सभी उतर जायें. हमें लगा कि पैर के नीचे ज़मीन ही नहीं है, और हम ज़मीन में धंसे जा रहे हैं.

किसी तरह सभी ने एक दूसरे को हिम्मत दी और बिष्टुपुर के बागमती रोड स्थित प्रबंधन के कार्यालय का घेराव किया. जमशेदपुर के SDO से मदद भी मांगी. तब जमशेदपुर प्रशासन की तरफ से आश्वासन मिला कि 19 सितम्बर को 2017 को कंपनी प्रबंधन के साथ मीटिंग होगी. लेकिन मीटिंग असफल रही. तब हम सभी टायोकर्मी ने स्थानीय SDO को सूचित कर 21 सितम्बर से टायो गेट पर धरने पर बैठे गए.

22/09/2017,अवसर था, झारखण्ड में रघुवर सरकार के 1000वें दिन का, जिसे सेलिब्रेट करने सरायकेला पहुंचे नगर विकास मंत्री सी पी सिंह एवं भाजपा सांसद रामटहल चौधरी पहुंचे. वहीं उन्हें खबर मिली टायोकर्मियों द्वारा जारी धरने की. मंत्री और सांसद जी 2 बजे दिन में टायो गेट स्थित धरना स्थल पर पहुंचे.

मंत्री से पी सिंह हमारे साथ आधे घंटे बैठे रहे फिर अपनी तरफ से पूर्ण समर्थन का आश्वासन देते हुए चले गए. रात 11 बजे हम सभी को पुलिस प्रशासन ने घेर लिया और अचानक हमपर लाठियां बरस पड़ीं.

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
लाठीचार्ज में घायल विनायक सिंह की फाइल फोटो

पूजा ठाकुर बताती हैं कि प्रशासन को कोई लाज शर्म नहीं थी. क्या बड़े क्या बुज़ुर्ग, क्या महिलाएं, क्या बच्चे सभी पीटे जा रहे थे. मेरे 1 साल के बेटे पर भी लाठी भांजी गईं, और वह घायल हो गया. देखते ही देखते हम सभी लहू लुहान थे. न कोई मदद न कोई इलाज.

अजय शर्मा कहते हैं कि सैकड़ों लोगों पर टाटा ने प्रशासन से मिलकर उसी दिन लाठियां चलवायीं, जिस दिन मंत्री महोदय कुछ घंटे पहले हमसे मिल कर जाते हैं. अब आप ही बताइये कि हम सरकार से उम्मीद करें भी तो क्या उम्मीद करें?

हमने 15 बार CM रघुवर दास से मुलाकात की. यहां तक रांची स्थित उनके मुख्यमंत्री आवास पर भी मिले. लेकिन, उस दिन बड़ी निराशा हुई. हाईकोर्ट में उनकी ओर से बयान आया कि कंपनी चलाना सरकार का काम नहीं है.

टायोकर्मी के दर्द पर भी नहीं पिघले रतन टाटा भी 

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
कैंसर की बीमारी से जूझ रहे संतोष सिंह

कैंसर पीड़ित संतोष सिंह की पत्नी अनुराधा सिंह बताती हैं कि सभी टायोकर्मी ने तय किया कि 3rd मार्च 2107 को हम लोग बिष्टुपुर में रतन टाटा से मिलेंगे. लेकिन  कंपनी ने हमें मिलने से रोक दिया. किसी तरह अजय शर्मा जी और संतोष ने रतन टाटा से मिले और सारी बात बतायी. ज्ञापन दिया कि कंपनी मत बंद कीजिए, लेकिन, हमदर्दी का स्वांग रचाने वाले रतन टाटा आज तक नहीं पसीजे.

 

टायो केस अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव की नज़र से

टाटा स्टील उच्च न्यायालय में हार गयी. आयडा ने 150 एकड़ जमीन का allotment cancel करने के लिए BIhar Industrial Area Development Authority Act, 1974 की कुछ धारायें और Government Grants Act, 1895 की कुछ शर्तों का हवाला दिया था. उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि Government  Grant Act के तहत जो जमीन grant दी गयी है, उसे केवल Government Grant Act के तहत ही cancel किया जा सकता है.

Government Grant Act  कानून के तहत जिन शर्तों का हवाला show cause में दिया गया था उन शर्तों के बारे में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि जमीन का part allotment नहीं किया जा सकता है. उच्चतम न्यायालय का आदेश हैरान करने वाला है, पर मैं यहां उसकी समालोचना नहीं कर रहा हूं. टाटा स्टील ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि वह 350 एकड़ में से 200 एकड़ पर व्यवसाय कर रही थी.

 

रघुवर दास के बढ़ते कद के बीच कंपनियों का बंद होना क्या इत्तेफाक है?
बंद हो गयी टायो रोल्स कंपनी

उसने ये नहीं कहा कि टायो रोल्स एक legal entlty है और अनुषंगी ईकाई होने के वावजूद टायो रोल्स का व्यवसाय टाटा स्टील का व्यवसाय नहीं हो सकता. समय परिवर्तित हुआ. टायो रोल्स ने फरवरी, 2016 में अपनी फैक्ट्री बंद कर दी, खुद को दिवालिया घोषित कर दिया. Appropriate Authority, Govt. of Jharkhand ने 27.10.2016 के अपने आदेश में industrial Disputes Act, 1947 की धारा 25 (O) के तहत टायो रोल्स के आवेदन को निरस्त कर दिया और कहा कि टायो रोल्स बंद नहीं की जा सकती है.

टायो रोल्स NCIT चली गयी और insolvency & Bankruptcy Code, 2016 की धारा 10 के तहत आवेदन देकर कहा कि वह दिवालिया हो गयी है उसे उबारा जाय. यहां जाकर टाटा स्टील का फ्रॉड पूरी तरह से खुलकर सामने आ गया. Appropriate Authority, Govt. of Jharkhand ने अपने आदेश में कहा था कि टायो रोल्स ने अपने Audited Balance Sheet में हेराफेरी की है.

टाटा स्टील ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि टायो रोल्स का व्यवसाय उसका व्यवसाय है और वह 350 एकड़ में से 200 एकड़ जमीन का इस्तेमाल कर रही थी. अगर टायो रोल्स का व्यवसाय टाटा स्टील का व्यवसाय था, तो टायो रोल्स दिवालिया कैसे हो सकती थी. टाटा स्टील तो दिवालिया नहीं हुई है.

इस प्रकार टायो रोल्स कुछ संशोधनों के साथ, केबल कंपनी, टाटा मोटर्स हिताची प्रॉजेक्ट, एग्रीको और मालिकाना हक के मामले एक ही मुद्दे हैं और सबका एक ही जवाब है कि टाटा स्टील का 15725 एकड़ जमीन जिस पर जमशेदपुर बसा हुआ है वह विवादास्पद है.

यह जमीन लीज की जमीन नहीं है. यह assignment है Government Grants Act, 1895 के तहत अतः इसका मालिकाना इस बात से तय होगा कि कौन किस जमीन के नियंत्रण में कितने साल से है और वह उसका क्या इस्तेमाल कर रहा है. पर इतना स्पष्ट है टाटा स्टील को किसी को भी जमीन से बेदखल करने का कोई भी अधिकार नहीं है.

इस दृष्टिकोण से टाटा स्टील ने आज तक जितने भी evctlon suit अदालतों में दायर किये हैं, सब गैरकानूनी हैं और उन evictlon suits पर अदालतों के टाटा स्टील के हक में दिये गये फैसलों का कोई कानूनी वजूद नहीं है और वे सारे आदेश निरस्त करने लायक हैं.

टायो की जमीन हालांकि 1969 में लीज बोलकर दी गयी है, पर वह भी Government Grants Act, 1895 के तहत ही दी गयी है अतः कानूनी दृष्टिकोण से दोनों में कोई खास फर्क नहीं है. टायो की 350 एकड़ जमीन टाटा स्टील को व्यवसाय करने के लिए दी गयी. लेकिन टाटा स्टील ने उसपर अपनी अनुषंगी इकाई टायो रोल्स के नाम पर व्यवसाय शुरू किया तो शुरू में ही उक्त जमीन को सरकार को वापस कर उसे टायो रोल्स के नाम पर स्थानांतरित कराना था.

टाटा ने नहीं किया तो सरकार को वापस लेकर टायो रोल्स के नाम पर नया लीज करना चाहिए था. पर ऐसा नहीं हुआ. इस बीच एक नये घटनाक्रम में आयडा ने 1.9.2000 को टाटा स्टील को show cause भेजा कि क्यों नहीं 350 में से 150 एकड़ जमीन का allotment cancel कर दिया जाय जिसका इस्तेमाल पिछले 30 सालों में नहीं हुआ था.

टाटा स्टील उच्च न्यायालय में हार गयी. आयडा ने 150 एकड़ जमीन का allotment रद्द करने के लिए Bihar industrial Area Development Authority Act, 1974 की कुछ धारायें और Government Grants Act, 1895 की कुछ शर्तों का हवाला दिया था. उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि Government  Grants Act के तहत जो जमीन grant में दी गयी है, उसे केवल Government Grant Act के तहत ही रद्द किया जा सकता है.

Government Grant Act कानून के तहत जिन शर्तों का हवाला show cause में दिया गया था, उन शर्तों के बारे में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया कि जमीन का part allotment रद्द नहीं किया जा सकता है. उच्चतम न्यायालय का आदेश हैरान करने वाला है पर मैं यहां उसकी समालोचना नहीं कर रहा हूं. टाटा स्टील ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि वह 350 एकड़ में से 200 एकड़ पर व्यवसाय कर रही थी.

उसने ये नहीं कहा कि टायो रोल्स एक legal entlty है और अनुषंगी ईकाई होने के बावजूद टायो रोल्स का व्यवसाय टाटा स्टील का व्यवसाय नहीं हो सकता. समय परिवर्तित हुआ.

टायो रोल्स ने फरवरी, 2016 में अपनी फैक्ट्री बंद कर दी, खुद को दिवालिया घोषित कर दिया. Appropriate Authority, Govt. of Jharkhand ने 27.10.2016 के अपने आदेश में industrial Disputes Act, 1947 की धारा 25 (O) के तहत टायो रोल्स के आवेदन को निरस्त कर दिया और कहा कि टायो रोल्स बंद नहीं की जा सकती है.

टायो रोल्स NClT चली गयी और insolvency & Bankruptcy Code, 2016 की धारा 10 के तहत आवेदन देकर कहा कि वह दिवालिया हो गयी है, उसे उबारा जाय. यहां जाकर टाटा स्टील का फ्रॉड पूरी तरह से खुलकर सामने आ गया. Appropriate Authority, Govt. of Jharkhand ने अपने आदेश में कहा था कि टायो रोल्स ने अपने Audlted Balance Sheet (वित्तीय स्थिति विवरण) में हेराफेरी की है.

टाटा स्टील ने उच्चतम न्यायालय में कहा कि टायो रोल्स का व्यवसाय उसका व्यवसाय है और वह 350 एकड़ में से 200 एकड़ जमीन का इस्तेमाल कर रही थी. अगर टायो रोल्स का व्यवसाय टाटा स्टील का व्यवसाय था, तो टायो रोल्स दिवालिया कैसे हो सकती थी? टाटा स्टील तो दिवालिया नहीं हुई है.

दरअसल टाटा स्टील टायो रोल्स की उत्पाद चीन से कम मूल्य में आयात करने लगी. इस बीच टाटा घराने ने उषा मार्टिन के स्टील व्यवसाय का अधिग्रहण तय कर लिया. टाटा को लगा स्टील का व्यवसाय ज्यादा मुनाफे का है, अतः उसने टायो रोल्स के वित्तीय विवरण में हेराफेरी की और उसे दिवालिया घोषित कर दिया.

अगर यह कंपनी दिवालिया हो जाती है, तो टाटा को लगभग 1,000 करोड़ रूपये मूल्य की 350 एकड़ जमीन मुफ्त में हासिल हो जायेगी और लगभग इतने ही की देनदारी जो मुख्यतः झारखंड बिजली बोर्ड और कर्मचारियों को देय है, नहीं देनी पड़ेगी.

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अंत में

बड़ा सवाल ये है कि केबल और टायो कंपनियों के बेरोज़गार वेतनहीन कर्मियों के लिए रतन टाटा का दिल क्यों नहीं पसीजा? क्यों पसीजेगा? केबल और टायो वर्कर्स मजदूर हैं, कोई भाजपा या पोलिटिकल पार्टी थोड़ी है कि चंदा देकर टाटा अपना काम निकाल लेंगे.

बात इन पांच वर्षों में रघुवर सरकार के रवैये की तो वह इन मामलों में बड़ी बेशर्मी से जब कह उठी कि सरकार का काम कंपनी चलाना नहीं है, तो फिर लेबर मिनिस्टर, नगर विकास मंत्री, वित्त मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री बने रहने तक जब वह इनका कोई उद्धार नहीं कर पाए, तो फिर क्या अब प्रधान मंत्री बनने का इंतज़ार है उन्हें?

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