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क्या सचमुच संकट में है हेमंत सरकार, जानें किस-किस करवट बैठ सकता है राजनीति का ऊंट

Anand Kumar

क्या सचमुच हेमंत सोरेन सरकार संकट में है? खदान आवंटन मामले में यदि चुनाव आयोग उन्हें सदस्यता से अयोग्य घोषित कर देता है, तो भी वह छह माह तक बिना किसी सदन के सदस्य बने मुख्यमंत्री के पद पर रह सकते हैं. उनकी खाली सीट पर चुनाव आयोग को छह माह के भीतर चुनाव कराना होगा. हेमंत सोरेन की सिर्फ सदस्यता जा सकती है. चुनाव लड़ने की पात्रता पर कोई संकट नहीं है. लिहाजा हेमंत सोरेन के पास दोबारा चुनाव जीत कर आने का विकल्प रहेगा. सरकार के पास बहुमत का आंकड़ा है. इसलिए पहली नजर में यह कहा जा सकता है कि सरकार संकट में नहीं है. लेकिन अगर झारखंड हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई, मनरेगा घोटाले में निलंबित उद्योग और खान सचिव पूजा सिंघल के खिलाफ इडी की कार्यवाही और शेल कंपनियों की जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो उनके सीएम पद पर खतरा हो सकता है. कानूनी शिकंजे में आने की स्थिति में मुख्यमंत्री को पद से इस्तीफा देना पड़ेगा और ऐसी सूरत में मौजूदा यूपीए सरकार संकट में पड़ सकती है.

अगर ऐसा कुछ होता है, तो क्या-क्या विकल्प हो सकते हैं –

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विकल्प – 1

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चुनाव आयोग ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ उनके भाई बसंत सोरेन और मंत्री मिथिलेश ठाकुर को भी नोटिस किया है. अगर आयोग मुख्यमंत्री अथवा सबकी सदस्यता को अयोग्य करार देता है, तो भाजपा राज्यपाल से मांग कर सकती है कि वे मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने को कहें. ऐसी स्थिति में राज्यपाल चाहें, तो संतुष्ट होने के लिए विधायकों की परेड करा सकते हैं.

विकल्प – 2

अगर राज्यपाल को लगता है कि मौजूदा सरकार के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं है, तो वे स्थायी सरकार गठन के लिए अन्य विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं.

विकल्प – 3

सरकार जाने की सूरत में संवैधानिक व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी के फेल होने के हालात पैदा हो सकते हैं. इसके मद्देनजर राजभवन के पास केंद्र राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करने का विकल्प रहेगा.

विकल्प – 4

राज्यपाल शासन लगने की सूरत में इसे छह माह के भीतर संसद से अनुमोदित कराना होगा या इसके पहले नयी सरकार के गठन की संभावनाएं तलाशनी होंगी. अगर राज्यपाल को लगता है कि विधायकों की खरीद-फरोख्त हो सकती है अथवा किसी दल अथवा गठबंधन के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं होने से स्थायी सरकार गठन की संभावना नहीं बन रही, तो वे विधानसभा भंग कर समय पूर्व चुनाव कराने की सिफारिश कर सकते हैं.

भाजपा के पास क्या विकल्प है

  1. मुख्यमंत्री की सदस्यता जाने की स्थिति में भाजपा राज्यपाल से मांग कर सकती है कि राज्य में संवैधानिक संकट की स्थिति है और कानून-व्यवस्था की हालत नियंत्रण से बाहर है. इसलिए राज्य में राज्यपाल शासन लगाया जाये और नये सिरे से चुनाव कराये जायें. भाजपा के मुखर सांसद डॉ निशिकांत दुबे भी अपने एक ट्वीट में मध्यावधि चुनाव की बात कह चुके हैं.

2. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पद छोड़ने की स्थिति में झामुमो और कांग्रेस के असंतुष्ट विधायक पाला बदल सकते हैं और उनकी मदद से भाजपा सरकार बनाने का दावा कर सकती है.

सत्ता पक्ष क्या कर सकता है

  1. बाबूलाल मरांडी के खिलाफ दसवीं अनुसूची के उल्लंघन के मामले में स्पीकर के न्यायाधिकरण में सुनवाई पूरी हो चुकी है. अगर हेमंत सोरेन की सदस्यता जाती है, तो इसका असर बाबूलाल मरांडी के मामले पर पड़ सकता है.

2. मैनहर्ट घोटाले में एसीबी की जांच पूरी हो चुकी है. इसके मुख्य आरोपियों में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास भी हैं. एफआइआर की अनुमति के लिए फाइल मुख्यमंत्री के पास है. यह अनुमति मिल सकती है.

3. रघुवर राज में झारखंड स्थापना दिवस पर स्कूली बच्चों के बीच टॉफी-टीशर्ट वितरण और गायिका सुनिधि चौहान के कार्यक्रम में अनियमितता की जांच करनेवाली विधानसभा की कमेटी ने गड़बड़ी पायी है. मामले की जांच एसीबी कर रही है. इसमें रघुवर दास के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.

बहरहाल, ये सारी संभावनाएं हैं और भविष्य में झारखंड की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह बहुत हद तक चुनाव आयोग के फैसले, केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई में मिले सबूतों और अदालती आदेशों पर निर्भर करेगा.

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