Opinion

क्या कांग्रेस आज दोराहे पर खड़ी है ? संदर्भ- पार्टी में नेतृत्व का संकट

Faisal Anurag

क्या कांग्रेस दिशाहीनता की शिकार है? विरोधियों और आलोचकों के आरोप के बीच इस तरह की धारणा आम हो रही है. कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद से ही पशोपेश की स्थिति में दिख रही है. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से अब तक अध्यक्ष का चयन नहीं हुआ है. कांग्रेस के अनेक नेताओं ने पूर्णकालिक अध्यक्ष की जरूरत पर जोर दिया है. केरल से सांसद शशि थरूर ने बयान दे कर कांग्रेस की दिशाहीनता को खत्म करने के लिए अध्यक्ष के चुनाव की मांग की है.

इसके पहले कपिल सिब्ब्ल और कई युवा नेताओं ने भी इस की जरूरत पर जोर दिया है. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष चुनते हुए कहा गया था कि यह व्यवस्था नए अध्यक्ष के चुनाव तक की है. लेकिन कांग्रेस ने इस दिशा में कदम नहीं उठाया है.

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एक तरफ जहां कांग्रेस के कुछ प्रभावी माने जाने वाले नेताओं का एक समूह इस अस्थायी व्यवस्था को लंबा खींचना चाहता है, वहीं चुनाव के बाद की घटनाओं और मध्यप्रदेश में सरकार खोने और राजस्थान में विवाद को देखते हुए नेता और कार्यकर्ता इस दिशाहीन स्थिति से उबरना चाहते हैं. और फ्रंट लाइन से नेतृत्व करने वाले को कांग्रेस की जिम्मेवारी सौंपना चाहते हैं.

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थरूर पार्टी में नयी उर्जा के लिए सभी पदों पर चुनाव की वकालत कर रहे हैं. कांग्रेस में आतंरिक लोकतंत्र की मांग का इतिहास कोई नया नहीं है. कांग्रेस तब ही ज्यादा कारगर साबित हुई है जब नेतृत्व नयी ऊर्जा के साथ आगे आयी है. राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में बिखराव शुरू हुआ था. नरसिंह राव ने उसकी गति जरूर कम की लेकिन अनेक नेताओं ने उसी दौर में पार्टी को अलविदा भी कहा था. इसमें तमिलनाडु के जीके मूपनार जो एक बड़ा दलित चेहरा थे, अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी भी शामिल थे. इस प्रवृति का असर हुआ कि ममता बनर्जी ने बंगाल में अपनी पार्टी बना ली. और कांग्रेस के बड़े जनाधार को अपने पक्ष में कर लिया.

आगे चल कर शरद पवार ने भी विद्रोह किया और महाराष्ट्र में एक बड़ी राजनीतिक ताकत वाली पार्टी का वे नेतृत्व कर रहे हैं. सीताराम केसरी के समय तो कांग्रेस की हालत कमोबेश वैसी ही थी जो आज की कांग्रेस की हो गयी थी. सोनिया गांधी के नेतृत्व संभालने के बाद दो बड़ी बाते हुईं.

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पार्टी से अलग हुए अनेक नेताओं को वे फिर से वापस लाने में कामयाब रहीं तो दूसरी ओर और किसी बड़ी टूट की संभावना को खत्म किया. आगे चल कर उन्होंने गैर भाजपा दलों का एक बड़ा मोर्चा भी तैयार किया. जिसने 2004 के आमचुनावों में शाइनिंग इंडिया की धूम के बीच वाजपेयी की भाजपा सरकार को सत्ता से बाहर किया. 2009 के चुनावों में भी सोनिया गांधी के नेतृत्व ने करिश्मा दिखाया. और कांग्रेस के प्रति कमजोर तबकों और श्रमिकों का समर्थन मजबूत किया.

लेकिन इसके बाद से ही कांग्रेस के पतन की शुरुआत होनी शुरू हुई. राहूल गांधी के करीबी राजीव सचान ने तो हाल ही में यह कह कर कांग्रेस में तहलका मचा दिया कि यूपीए शासन के समय के कुछ नेताओं के कारण कांग्रेस का ये हाल हुआ है. उनका इशारा यूपीए के समय मंत्री ओर पार्टी पर प्रभावी रहे समूह की ओर है. राहुल गांधी ने भी पिछले साल जुलाई में कांग्रेस को सुझाव दिया था कि 2019 के चुनावों की हार के कारणों की तलाश गंभीरता से की जाये. और इसके लिए जिम्मेवारी तय की जाए.

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सोनिया गांधी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद न तो राहुल गांधी के इस सुझाव पर अमल किया गया और न ही पार्टी में ऊर्जा का संचार किया गया. अध्यक्ष के बतौर 2000 से 2010 तक सोनिया गांधी ने जिस क्षमता का प्रदर्शन किया था और पार्टी को एक गति दी थी, वह 2019 में नहीं दिखी. इस बीच न केवल कांग्रेस की राज्य सरकारों के सामने संकट पैदा हुए बल्कि उस दौरान उभरे असंतोष का निपटारा करने में भी अपेक्षित कुशलता नहीं दिखी.

इसकी कीमत पहले तो कनार्टक में और फिर मध्यप्रदेश में चुकानी पडी. राजस्थान की सरकार का संकट भी यही बताता है कि केंद्रीय नेतृत्व न तो असंतोष झेल पाता है और न ही उसका स्थायी समाधान निकालने का हुनर दिखाता है. इस समय भाजपा के नेतृत्व पर जिस तरह की गति दिखती है, उसका मुकाबला इस तरह तो हरगिज नहीं किया जा सकता. भाजपा से मुकाबले के लिए उससे आगे की रणनीति और नीति की जरूरत है. न कि भाजपा की नकल की. कांग्रेस इस समय यही नहीं सोच पा रही है कि आखिर वह इस हालात में किन नीतियों की बात करे.

लंबे समय तक कांग्रेस का रुझान सेंटर टू लेफ्ट रहा है. और कांग्रेस के सत्ता स्वर्णकाल का यही दौर रहा है. भाजपा के दबाव में कांग्रेस का दक्षिणपंथी झुकाव उसे वह कांग्रेस नहीं रहने दे रहा है. कांग्रेस न तो आर्थिक फ्रंट पर किसी नये विचार का जन्म हो रहा है और न ही सामाजिक संदर्भो में. यहां तक कि अनेक मामलों में उसके नेताओं की धर्मनिरपेक्ष छवि कमजोर हुई है. यदि पिछले तीन सालों में देखा जाए तो कांग्रेस के रणनीतिकारों की ही चूक है कि वे कांग्रेस को भाजपा से विशिष्ट दिखाने में विफल रहे हैं.

कांग्रेस के इस वैचारिक द्वंद्व ने जनता को भ्रमित किया है. बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी ऐसे हालात नहीं बना सके जिससे कांग्रेस की नीतियों में विकल्प दिखे. राहुल गांधी ने जरूर एक कमजोर तबके के प्रति समर्पित पार्टी की छवि बनाने की कोशिश की. लेकिन इससे नए आर्थिक या सामजिक विचार पैदा नहीं हुए. कांग्रेस की सबसे बड़ी जरूरत वैचारिक दिशा की स्पष्टता है. लेकिन इस पर चर्चा होती ही नहीं है. केवल चुनाव से इस कमी को कितना पूरा किया जा सकेगा, इसका आकलन तो वक्त ही करेगा.

थरूर ने राहुल गांधी की तरीफ भी की है. और कहा है कि उनमें साहस, क्षमता और योग्यता है. लेकिन वे अध्यक्ष पद लेने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं. ऐसे हालात में जरूरी है कि किसी नए व्यक्ति को अध्यक्ष पद के लिए चुना जाये.  कपिल सिब्ब्ल भी राजस्थान विवाद के संदर्भ में कुछ ऐसा ही बयान दे चुके हैं. जयराम रमेश की भी निराशा समय-समय पर व्यक्त हुई है. युवा नेता इस समय पार्टी के भीतर चलने वाली प्रवृतियों से बेहद असंतुष्ट हैं. जो किसी भी प्रयोग का विरोधी है.

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