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IPRD : प्रेस बयान बनाने के लिए पत्रकारों को नियुक्त कर लिये, अब चार माह से नहीं दे रहे वेतन, कई ने काम छोड़ा

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Pankaj Kumar Saw

Ranchi : राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (IPRD) द्वारा आउटसोर्सिंग के जरिये बहाल किये गये अधिकारियों व कर्मचारियों को साढ़े तीन माह से वेतन नहीं दिया गया है. टालमटोल से तंग आकर अधिकतर ने काम बंद कर दिया है और कई इसकी तैयारी में हैं.

बता दें कि सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी DREAMLINE TECHNOLOGIES PVT LTD के माध्यम से असिस्टेंट पब्लिक रिलेशन ऑफिसर्स (APRO), सोशल मीडिया एंड पब्लिसिटी ऑफिसर्स (SMPO), कंप्यूटर ऑपरेटर, रिसेप्शनिस्ट व साउंड ऑपरेटर की बहाली की गयी थी. राज्य के प्रमंडल व जिला मुख्यालयों में 15 फरवरी से मार्च के पहले सप्ताह तक अधिकतर की ज्वाइनिंग हो गयी थी. कुछ पद खाली रह गये थे जिन्हें बाद में धीरे-धीरे कर भरा गया.

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देवघर व दुमका छोड़ सभी एपीआरओ हड़ताल पर

उक्त सभी कर्मियों को 15 अप्रैल तक का ही वेतन मिला है. उसके बाद अप्रैल के बचे हुए हिस्से को मिलाकर साढ़े तीन महीने पूरे हो चुके हैं और भुगतान नहीं हुआ है. सात-आठ दिनों में अगस्त भी बीत जायेगा और अगर इस दौरान भुगतान नहीं हुआ तो साढ़े चार महीने का बकाया हो जायेगा.

उच्चाधिकारियों के थोथे आश्वासनों से तंग आकर कई अधिकारी-कर्मचारी 15 अगस्त के बाद दफ्तर जाना बंद कर चुके हैं. देवघर व दुमका जिलों को छोड़ अन्य सभी जगह पदस्थ एपीआरओ हड़ताल पर चले गये हैं.

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आवंटन के बाद भी भुगतान में टालमटोल से बढ़ी नाराजगी

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 6 जुलाई को रांची में हुई मीटिंग में आइपीआरडी के डायरेक्टर रामलखन प्रसाद गुप्ता ने आउटसोर्सिंग स्टाफ से कहा कि राशि आवंटित नहीं होने के कारण वेतन भुगतान नहीं किया जा रहा है.

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उन्होंने आश्वासन दिया था कि अनुपूरक बजट में राशि आवंटित होने के बाद वेतन भुगतान कर दिया जायेगा. उसके बाद 22 जुलाई को अनुपूरक बजट में साढ़े तीन करोड़ रुपये आइपीआरडी को मिले. तब सभी स्टाफ को लगा कि 2-3 अगस्त तक वेतन मिल जायेगा. लेकिन भुगतान नहीं किया गया.

एक तरफ पैसे का रोना, दूसरी तरफ बजट खर्च नहीं कर पा रहे  

विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारी एक तरफ इन स्टाफ को भुगतान करने में पैसे का रोना रो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिलों में विज्ञापन के लिए आवंटित राशि खर्च नहीं हो पा रही है. जून से सितंबर तक के लिए ही प्रत्येक जिले को डेढ़ करोड़ रुपये इसी काम के लिए दिये गये हैं.

लगातार डीपीआरओ (डिस्ट्रिक्ट पब्लिक रिलेशन ऑफिसर) पर इस राशि को खर्च करने का दबाव बनाया जा रहा है. पंचायत स्तर तक होर्डिंग, बैनर, पोस्टर लगाने को कहा गया है. सरकार के इस आक्रामक प्रचार-प्रसार की नीति के बीच विभाग के आउटसोर्सिंग कर्मियों की आवाज दब सी गयी है.

अच्छी-भली नौकरी छोड़ आये लोग पछता रहे

ड्रीमलाइन टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से एपीआरओ व एसएमपीओ बने अधिकतर युवा किसी ने किसी मीडिया हाउस या अन्य संस्थानों में अच्छी-भली नौकरी छोड़कर आये हैं. सरकारी पद पर काम करने के लालच में उन्होंने जमी-जमायी नौकरी छोड़ी और अब अपनी भूल पर पछता रहे हैं.

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कुछ ने बताया कि अनधिकृत तौर पर उन्हें कई बार पदों को स्थायी करने का लालच भी दिया गया जिसके कारण वे इस जाल में फंस गये.

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तीन जिलों में ‘जुगाड़’ से शुरू हुआ काम

उक्त सभी पदों में सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाला पद एपीआरओ का है. उसे समाचारों का कवरेज कर उसकी प्रेस रिलीज तैयार कर पत्रकारों को देनी होती है. हड़ताल के कारण इसी काम का नुकसान सबसे ज्यादा हुआ है.

सूत्रों से खबर मिली है कि पश्चिमी सिंहभूम, हजारीबाग और सरायकेला-खरसावां जिलों में डीपीआरओ ने इसके लिए स्थानीय पत्रकारों को दैनिक वेतन पर रख लिया है और काम करवा रहे हैं.

इस पूरे मामले पर विभाग के सेक्रेटरी डॉ सुनील कुमार बर्नवाल और डायरेक्टर रामलखन प्रसाद गुप्ता से विभाग का पक्ष लेने के लिए बात करने की कोशिश की गयी पर उनका फोन नहीं लगा.

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