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पड़तालः झारखंड के मनरेगा रोजगार में आदिवासी-दलित मजदूरों का हिस्सा 51 से गिरकर 30 फीसदी पर क्यों पहुंचा?

मज़दूरों और रोज़गार के बीच खड़ा ठेकेदार और प्रशासनिक तंत्र का भ्रष्ट गठजोड़

सिराज दत्ता

झारखंड में मनरेगा का एक आंकड़ा चौकाने वाला है. सरकारी मनरेगा वेबसाइट के अनुसार, पिछले छः सालों में कुल सृजित रोज़गार में आदिवासी-दलित मज़दूरों को मिला काम का हिस्सा 2015-16 में 51.02% से हर साल गिरते-गिरते इस वर्ष 30.44% हो गया है. कई आदिवासी-बहुल प्रखंडों में व्यापक गिरावट दिखी है. जैसे, लिट्टीपाड़ा में तो यह आंकड़ा 92% से लगातार कम होते-होते अब 32% हो गया है. क्या छः सालों में मनरेगा रोज़गार की आवश्यकता आदिवासी-दलित परिवारों में, दूसरे समुदायों की तुलना में, कम हो गयी है?

ज़मीनी विश्लेषण से इसके लिए कई कारण सामने आते हैं. मुख्यतः यह इंगित होता है कि एक ओर मज़दूरों को पर्याप्त रोज़गार नहीं मिल रहा और दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकार के दावों के विपरीत मनरेगा में व्यापक भ्रष्टाचार हो रहा है. यह गिरावट एक नए प्रकार के भ्रष्टाचार की आशंका को दर्शा रही है.

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बैंक खाते में भुगतान शुरू हुआ तो भ्रष्टाचारियों ने ढूंढ़ा नया तरीका

2014-15 तक झारखंड के अधिकांश मनरेगा मज़दूरों का खाता डाकघर में था. अगर ठेकेदार, मनरेगा कर्मी और डाकघर कर्मी में सांठ-गांठ हो, तो किसी मज़दूर को बिना बताए उसके खाते से पैसे निकाल लेना बहुत कठिन नहीं था और ऐसा राज्य में बड़े पैमाने पर होता था.

इस चोरी को रोकने और मज़दूरी भुगतान में विलम्ब कम करने के लिए बैंक खाते में भुगतान शुरू हुआ. बैंक खाते से बिना खाताधारक को बताए पैसे की निकासी आसान नहीं है. लेकिन, भ्रष्टाचारियों ने नया तरीका खोज लिया.

हालांकि मनरेगा कानून में ठेकेदारी सख्त मना है, लेकिन अधिकांश योजनाओं में लाभुक और प्रशासन के बीच ठेकेदार ही पुल का काम करते हैं.

ठेकेदार (बिचौलिया) अपनी पहचान के लोगों के नाम से मस्टर रोल निकलवाता है, पर अधिकांश काम गांव के आदिवासी-दलित मज़दूर करते हैं. मस्टर रोल पर जिनका नाम रहता है वे अपने बैंक खाते से पैसे निकाल कर ठेकेदार को दे देते हैं. उन्हें इसके लिए पूरी राशि के एवज में 50-100 रु मिल जाते हैं.

काम कर रहे मज़दूरों को ठेकेदार नगद में कुछ भुगतान कर देता है. बाकी पैसा ठेकेदार, मनरेगा कर्मी व प्रशासनिक पदाधिकारियों के भ्रष्ट गठजोड़ की जेब में जाता है.

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दलितों-आदिवासियों के प्रतिशत में गिरावट की एक बड़ी वजह ये है

चूंकि अनेक ठेकेदार गैर-आदिवासी-दलित होते हैं, तो मस्टर रोल में अधिकांश उनके समुदाय के ग्रामीणों के ही नाम रहते हैं जिसके कारण आंकड़ों में आदिवासी-दलित मज़दूरों के हिस्से में लगातार गिरावट दिख रही है. बिना कुछ काम हुए पूरे पैसे का निकल जाना भी अक्सर होता है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में 32 लाख मज़दूरों को काम मिला, औसतन 46 दिनों के लिए . पर ज़मीन पर ये आंकड़े नहीं झलकते और मज़दूर काम के इंतज़ार में बैठे रहते हैं.

झारखंड में मनरेगा के शुरुआती दिनों से ही इसमें भ्रष्टाचार और ठेकेदारी रही है. यह तंत्र सालों से मनरेगा से पैसे निकाल रहा है क्योंकि सरकार किसी की भी हो, इस तंत्र को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है.

इस तंत्र से जुड़े कई लोग राजनैतिक दल के सदस्य भी होते हैं. आज तक झारखंड में किसी भी सरकार ने इस भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की प्रतिबद्धता नहीं दर्शायी है.

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सामाजिक अंकेक्षण का बंद होना गलत

पिछले पांच सालों में राज्य में जन संगठनों की पहल से सरकार ने मनरेगा कानून अनुसार सामाजिक अंकेक्षण की एक स्वतंत्र व्यवस्था लागू की. इससे मनरेगा में हो रही चोरी के मामले लगातार उजागर होते थे, हालांकि अधिकांश मामलों में दोषियों पर सरकार द्वारा पर्याप्त कार्रवाई नहीं की जाती थी.

भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में सरकार की राजनैतिक प्रतिबद्धता की कमी इससे समझा जा सकता है कि जिन पर चोरी का आरोप रहता है, उनको ही अक्सर जांच की जिम्मेवारी दी जाती है. वर्तमान सरकार ने तो ठेकेदारों और मनरेगा कर्मियों के दबाव में अंकेक्षण की प्रक्रिया ही बंद कर दी है, जो कि मनरेगा कानून का घोर उल्लंघन है.

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ऐसा नहीं कि मनरेगा में सिर्फ चोरी हुई है

ऐसा नहीं है कि राज्य में मनरेगा में सिर्फ चोरी हुई है. हर वर्ष लाखों मज़दूरों को काम मिलता है, लेकिन साथ ही, वास्तव से अधिक काम या मज़दूरों की संख्या दिखा कर चोरी भी होती है. पिछले 15 सालों में राज्य में अनेक उपयोगी परिसंपत्तियों का निर्माण भी हुआ है, जैसे कच्ची सड़कें, तालाब, कुएं, आम बगान आदि.

लेकिन यह आम बात है कि निजी योजनाओं को पूर्ण करने में योजना मालिकों को अक्सर कर्ज लेकर पैसा लगाना पड़ता है क्योंकि स्वीकृत राशि का एक हिस्सा भ्रष्टाचार के भेट चढ़ जाता है.

मनरेगा योजनाओं में सामग्री क्रय को भी भ्रष्ट तंत्र ने पूरी तरह से जकड़ रखा है. आदिवासी-दलित मज़दूरों को मिले रोज़गार के हिस्से में गिरावट के कारणों व भ्रष्टाचार की व्यापकता के आकलन के लिए स्वतंत्र शोध की आवश्यकता है.

ग्रामीण रोज़गार के लिए मनरेगा का महत्त्व फिर से कोविड महामारी व लॉकडाउन के दौरान स्पष्ट हो गया. लेकिन अगर मज़दूरों के काम के अधिकार को सुनिश्चित करना है, तो सबसे पहले झारखंड सरकार को भ्रष्ट गठजोड़ को जड़ से उखाड़ना होगा.

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