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सरकार के दावे की पड़तालः किडनी के विशेषज्ञ हैं ही नहीं, पांच जिलों में मरीजों की डायलिसिस करा रही है सरकार

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Kumar Gaurav

Ranchi: रघुवर सरकार ने चार साल पूरे कर लिये हैं और अपने कामों का ब्यौरा जनता को दे रही है. इसके लिए विज्ञापन, होर्डिंग्स के माध्यम से खूब प्रचार-प्रसार भी हो रहा है. समाचार पत्र में 29 दिसंबर को एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ है, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम का, जिसके तहत राज्य के पांच जिलों में डायलिसिस की सुविधा एपीएल परिवारों को 1047 रुपये में दी जा रही है. न्यूज विंग ने इस दावे की पड़ताल की. सभी पांच जिलों में डायलिसिस हो भी रहा है, पर सरकार रोगियों के साथ मजाक कर रही है. जी हां मजाक. मजाक इसलिए क्योंकि डायलिसिस की जरूरत उन मरीजों को पड़ती है जिनकी किडनी खराब हो चुकी है. किडनी की समस्या गंभीर बीमारी की श्रेणी में आती है. और गंभीर बीमारी का ईलाज स्पेशलिस्ट डॉक्टर की गैरमौजूदगी में करा कर सरकार इसे उपलब्धि बता रही है. उन जिलों के सिविल सर्जन ने बताया कि मरीजों का ईलाज मेडिसिन के डॉक्टर की उपस्थिति में ही हो रहा है.

पांच से छह मरीज प्रतिदिन पहुंचते हैं डायलिसिस कराने

सिविल सर्जन बोकारो और सिविल सर्जन पलामू ने बताया कि उनके यहां भी नेफ्रोलॉजिस्ट नहीं हैं. मेडिसीन विभाग के एमडी ही उनका ईलाज करते हैं. उन्होंने बताया कि प्रतिदिन करीब पांच से छह मरीज अपना डायलिसिस कराने आते हैं. वहीं हजारीबाग सदर के डायलिसिस सेंटर का भी करीब-करीब यही हाल है और दुमका के डायलिसिस सेंटर में महीने में लगभग 300 मरीज अपनी डायलिसिस कराते हैं.

सिर्फ बोकारो जिला में 270 मरीजों को गंभीर बीमारी योजना के तहत लाभ मिल रहा था. उन्हें सरकारी पैसे से राज्य के बेतहर प्राइवेट अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा मिल रही थी. पर 29 सितंबर के बाद से इस योजना के तहत पैसे नहीं दिये जा रहे हैं. सिविल सर्जन ने बताया कि किडनी के मरीजों को अब आयुष्मान भारत के तहत ही ईलाज की सुविधा मिलेगी. मरीजों को इसका नुकसान इसलिए हो रहा है कि मरीज जिन अस्पतालों में अपना डायलिसिस गंभीर बीमारी के तहत ले पा रहे थे, उनमें से कई अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत इनरोल्ड ही नहीं हैं. अब मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य के लिए खुद के पैसे से ईलाज कराना पड़ रहा है. प्राइवेट अस्पतालों में डायलिसिस के लिए करीब 2 हजार रुपये तक भुगतान करना होता है. सरकार ने विधायक निर्भय कुमार शाहाबादी को दिये जवाब में माना है कि अब भी गंभीर बीमारी उपचार योजना के तहत 117 बीमारियों के लिए 2.5 लाख तक की राशि दी जा रही है, वहीं किडनी प्रत्यारोपन के लिए 5 लाख दे रही है.

अप्रैल 2016 में ही आठ जिलों में शुरू होना था

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रघुवर दास ने 6 अप्रैल 2016 को राज्य के 18 जिलों के सदर अस्पतालों में पीपीपी मोड पर डायलिसिस सेंटर  खोलने की बात कही थी. जिसे एक महीने के अंदर ही चालू करा लेने की बात कही गयी थी. उसी दौरान स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी ने पत्रकारों को कहा था कि पहले से ही आठ जिलों में ये कार्यरत है. पर अब सरकार ही 29 दिसंबर 2018 को विज्ञापन के माध्यम से बता रही है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत झारखंड के पांच जिलों में डायलिसिस की सुविधा दी जा रही है और इसके लिए एपीएल परिवारों से 1047.50 रुपये लिये जा रहे हैं. और जल्द ही अन्य जिलों में सुविधा चालू करा लेने की बात कही गयी है.

क्रिटिकल केयर टीम जरूरी, टेक्नीशियन के पास सिर्फ मशीन ऑपरेट करने का होता है ज्ञान

किडनी रोग विशेषज्ञों के अनुसार जितने भी मरीज आते हैं सभी का डायलिसिस डिस्क्रीप्शन अलग-अलग होता है. यानी उकी जरूरतें अलग-अलग होती हैं. डायलिसिस टेक्नीशियन के पास जो सर्टिफिकेशन होता है वो डायलिसिस मशीन ऑपरेट करने का होता है. वहीं डायलिसिस के दौरान भी कई मरीज अचानक गंभीर हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में उन्हें अपात चिकित्सा की जरूरत होती है. इस स्थिति को संभालने के लिए डॉक्टरों की क्रिटिकल केयर टीम का मौजूद होना नितांत जरूरी होता है. विशेषज्ञ के अनुसार अगर कोई मरीज अचानक क्रिटिकल हो जाए तो डायलिसिस टेक्नीशियन को उसे संभालने में दिक्कत आ जाएगी. जिसने सिर्फ मशीन ऑपरेट करने की पढ़ाई की हो वो कैसे किडनी जैसी गंभीर बीमारी का हल निकाल सकेगा.

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