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Interview :  लॉकडाउन में नकारात्मकता से बचें, रचनात्मकता को अपनाएं : मनोवैज्ञानिक डॉ. समीर पारिख

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कोरोना वायरस महामारी के कारण लोगों को संक्रमण, बेरोजगारी और आर्थिक तंगी जैसी आशंकाएं तो सता ही रहीं हैं, साथ ही उन्हें कई तरह के मानसिक दबावों का भी सामना करना पड़ रहा है. इस माहौल में घबराहट, बेचैनी, अकेलापन और अवसाद बड़ी समस्याएं खड़ी कर सकता है. इस विषय पर फोर्टिस नेशनल मेंटल हेल्थ प्रोग्राम के ‘मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान’ विभाग निदेशक डॉ. समीर पारिख से ‘भाषा के पांच सवाल’ और उनके जवाब :

सवाल : लॉकडाउन के दौरान लम्बे समय तक घरों में बंद रहने का लोगों की दिमागी सेहत पर क्या असर हो सकता है ? क्या यह असर बंदी खुलने के बाद भी बना रहेगा और इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

जवाब : अगर लोगों की औसत आयु करीब 75 वर्ष है तो उसमें 21 दिन कुछ भी नहीं है. हम यह सोचें की यह (बंदी) काफी छोटी अवधि है.

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यह एक अभूतपूर्व स्थिति है, जिससे पूरी दुनिया गुजर रही है. इसमें हल्का तनाव और अपने परिजनों की सुरक्षा की चिंता बिल्कुल सामान्य बात है. ऐसी परिस्थिति में चिंता करना वास्तव में कोई समस्या नहीं है. हमें इसे सकारात्मकता और रचनात्मकता से जोड़ने के तरीके खोजने होंगे.

सवाल : वरिष्ठ नागरिक और कामकाजी पेशेवर भी सामान्य जीवन न जी पाने की वजह से मनोवैज्ञानिक तौर पर खालीपन महसूस करते है. ऐसे में वे मनोवैज्ञानिक विकारों से कैसे खुद को दूर रख सकते हैं.

उत्तर : ऐसी महामारी की स्थिति में लोगों को अनिश्चितता महसूस होती रहती है. इस दौरान दु:ख, तनाव, भ्रम, डर का भाव अकेलेपन को बढ़ा देता है. ऐसे में जिन पर विश्वास करते हैं, उनसे बात करने से मदद मिल सकती है. दोस्तों और परिवार के संपर्क में रहें. स्वस्थ जीवन शैली को अपनाएं. अपनी दिनचर्या का पालन करेंगे तो आपका मन शांत रहेगा और मन में बेकार की बातें नहीं आएंगी.

सवाल : आने वाले समय में लोगों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों से निपटने के लिये आप लोगों और सरकार को क्या सुझाव देंगे ?

उत्तर : सबसे पहले हमें कोरोना वायरस से बचने के लिये सामाजिक दूरी का सख्ती से पालन करना चाहिए, लॉकडाउन के दिशा निर्देशों का पालन करना चाहिए. क्योंकि यह छोटी परेशानी हमें लम्बे समय की परेशानी से बचायेगी.

इसके साथ ही खानपान पर ध्यान दें, पर्याप्त नींद और रोजाना कसरत बहुत जरूरी है. अगर भावनात्मक उथल-पुथल से जूझ रहे हैं तो किसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता या काउंसलर से संपर्क करें. आप अपने उस कौशल और क्षमताओं का इस्तमाल करें जिन्होंने आपको जीवन में पहले भी बुरी स्थिति का सामना करने में मदद की है.

सवाल : लॉकडाउन के कारण स्कूल कॉलेज बंद हैं. छात्र-छात्राएं अपनी पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित हैं. ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए ?

उत्तर : छात्रों को स्वयं को समझाना होगा कि यह लॉकडाउन सभी छात्रों के लिये एक समान ही है. यह देशव्यापी बंदी उन्हें स्वयं को तलाशने का एक अवसर भी दे रही है.

ऐसे समय में बच्चों को मस्तिष्क को ताजा रखने के लिए पुस्तकें पढ़नी चाहिएं, रचनात्मक लेखन करना चाहिए, पेंटिंग करनी चाहिए. अपने शौक पर अमल करें, मनोरंजन और मानसिक विकास पर ध्यान देकर अपनी रचनात्मकता बढ़ाएं. बच्चों के लिए जरूरी है कि उन्हें घर के अंदर खेले जा सकने वाले खेल में व्यस्त रखा जाए. इसके अलावा पढ़ाई और हॉबी से जुड़े विषयों के बीच सकारात्मक सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए.

सवाल : बंदी के कारण लोगों पर वित्तीय स्वतंत्रता खोने, नौकरी जाने का डर हावी हो जाता है. खास तौर पर असंगठित क्षेत्र में दिहाड़ी मजदूरों पर यह गंभीर प्रभाव डालता है. ऐसे लोगों को क्या करना चाहिए ?

उत्तर : कोरोना वायरस के कारण लोगों को सामाजिक दूरी बनाये रखनी है लेकिन भावनात्मक दूरी नहीं बनानी है. अलग अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के समक्ष समस्याएं आयेंगी लेकिन इसका हल भी समाज से ही निकलेगा. हम सभी को यह समझना होगा कि इस संक्रमण से बचने का और कोई रास्ता नहीं है. लॉकडाउन के चलते बिजनेस, नौकरी, कमाई, बचत और यहां तक कि मूलभूत संसाधन खोने के डर के कारण समस्याएं आती है. ऐसे में जो लोग सक्षम हैं, उन्हें ऐसे कमजोर लोगों का ध्यान रखना चाहिए और एक दूसरे की मदद करनी चाहिए.

हम सभी को एकजुट होकर इस विपदा से निपटना है और भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़कर रहना है. समस्या भी यहीं है और इसका समाधान भी यहीं पर है.

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