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Booker Prize: सुबह नींद खुली तो हिन्दी साहित्य जगत का यह नाम सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, हर कोई दे रहा है बधाई

Sanjay Prasad

Jamshedpur: शुक्रवार सुबह जब नींद खुली तो लंदन से आई एक खबर ने हिन्दी साहित्य जगत को गौरव से भर दिया. देखते-देखते आम पाठकों के लिए अनाम नाम गीतांजलि श्री सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी. सोशल मीडिया के सारे प्लेटफॉर्म पर गीतांजलि श्री को बधाई देने वालों का तांता लग गया. गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है. पहली बार हिन्दी की किसी रचना को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है.
इस पुरस्कार की घोषणा भारतीय समय के अनुसार देर रात तीन बाद के बाद हुई. 26 मई को ब्रिटन के समय के अनुसार रात साढ़े नौ बजे से इस समारोह का आयोजन किया गया. भारत और ख़ासतौर पर हिंदी साहित्य जगत के लिए इस साल का बुकर पुरस्कार इसलिए विशेष रुचि का विषय था क्योंकि पहली बार हिंदी का एक उपन्यास International Booker Prize की शॉर्टलिस्ट में शामिल हुआ था. कथाकार गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ का अंग्रेज़ी अनुवाद Tomb of sand शीर्षक से Daisy Rockwell ने किया है. गीतांजलि श्री का यह उपन्यास 2018 में राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ था. Daisy Rockwell द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद 2021 में Tilted Axis Press UK से प्रकाशित हुआ है.

बधाई देने वालों का तांता
शहर के कथाकार जयनंदन ने गीतांजलि श्री को बधाई देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा है-पूरी दुनिया में गीतांजलि श्री ने हिन्दी की जय जयकार करवा दी. बुकर पुरस्कार की ढ़ेर सारी बधाईयां. मशहूर पत्रकार और संपादक ओम थानवी ने लिखा है-गीतांजलि श्री को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं. आप भी दीजिए. नलिन रंजन सिंह ने लिखा है-गीतांजलि श्री को बुकर पुरस्कार मिलने की बधाई. वैसे इससे ‘रेत समाधि’ की गुणवत्ता में कोई परिवर्तन नहीं होना है. यह एक बेहद साधारण उपन्यास है.दिनेश अग्रवाल ने लिखा है-हिन्दी और हिन्दुस्तान दोनों के लिए गौरव की बात है.
क्यों इतना प्रतिष्ठित है बुकर पुरस्कार
मैन बुकर पुरस्कार फ़ॉर फ़िक्शन, जिसे शॉर्ट फॉर्म में मैन बुकर पुरस्कार या बुकर पुरस्कार भी कहा जाता है. यह पुरस्कार राष्ट्रकुल (कॉमनवैल्थ) या आयरलैंड के नागरिक द्वारा लिखे गए उपन्यास के लिए हर वर्ष दिया जाता है. 2008 वर्ष का पुरस्कार भारतीय लेखक अरविंद अडिग को दिया गया था. अडिग को मिलाकर कुल 5 बार यह पुरस्कार भारतीय मूल के लेखकों को मिला है, जिसमें वीएस नायपाल, अरूंधति राय, सलमान रश्दी और किरण देसाई शामिल है. बुकर पुरस्कार की स्थापना सन् 1969 में इंग्लैंड की बुकर मैकोनल कंपनी द्वारा की गई थी. इसमें 60 हज़ार पाउण्ड की राशि विजेता लेखक को दी जाती है. इस पुरस्कार के लिए पहले उपन्यासों की एक लंबी सूची तैयार की जाती है और फिर पुरस्कार वाले दिन की शाम के भोज पर पुरस्कार विजेता की घोषणा की जाती है. पहला बुकर पुरस्कार अलबानिया के उपन्यासकार इस्माइल कादरे को दिया गया था.

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