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‘इन्फॉरमेशन डार्कनेस’ के दौर में मीडिया की स्वतंत्रता के सवाल

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Faisal Anurag

“In a media environment threatened by an interventionist state, toxic with jingoist partisans, trolls and purveyors of fake news, and where the competition for market ratings has put the premium on ‘media personalities’, ‘tabloidization’ and audience-pandering sensationalism, Ravish has been most vocal on insisting that the professional values of sober, balanced, fact-based reporting be upheld in practice.”

(रेमन मैगसेसे आवार्ड समिति की यह भारत विषयक एक समझ का हिस्सा है)

भारतीय मीडिया को लेकर जिस तरह की टिप्पणी रेमन मैगसेसे अवार्ड की कमिटी ने की है वह बेहद गंभीर है. इस पर भारत के मीडिया संस्थानों की खमोशी के भी अपने निहितार्थ हैं. रवीश कुमार को दिये गये आवार्ड के संदर्भ में चयन के आधार की बाबत कहा गया है कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता सत्ता की दखलअंदाजी से प्रभावित हो गयी है.

अर्थात यह एक ऐसा दौर है जब तथ्यों के साथ खड़े पत्रकारों को परेशान और ट्रोल ट्रोल  किया जा रहा है. और इस पर जिस तरह मीडिया संस्थान और मीडिया संरक्षण के लिए बने अन्य संस्थान खामोश हैं, वह बेहद चिंतातनक है. कहा जा सकता है कि मीडिया जितना सत्ता के दखल के असर में है वहीं मीडियाकर्मियों का बड़ा हिस्सा वैचारिक रूप से इसके लिए सहमत है. यह एक अभूतपूर्व स्थिति है, जिसमें सूचना और संवेदना के लिए सीन नहीं है.

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संविधान लागू होने के कुछ महीने पहले मौलाना अबुल कलाम आजाद ने कहा था कि मजबूत लोकतंत्र बगैर इंनफार्म सिटीजनरी के संभव नहीं है. यह सूचना संपन्नता तथ्यों के आधार पर ही अपने नागरिकों के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया को मजबूती देती है. लोकतंत्र का मतलब केवल मतदान करना नहीं है. लंबे समय से जिस सिटीजनरी के लिए प्रयास होता रहा है आखिर उसकी दीवार मजबूत क्यों नहीं हो पा रही है. राजनीतिक प्रक्रिया में में जो कमियां हैं उससे कहीं ज्यादा मीडिया के जनतांत्रिकीकरण की है.

मीडिया पूंजी प्रभाव से चलते हुए भी तथ्यों के लिए टकराती रही है. तथ्यों का अन्वेषण मीडिया की सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन उसका प्रेपेगेंडा मशीनरी में तेजी से बढ़ते जाना लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया के लिए बेहद खतरनाक है. मीडिया अगर सवाल पूछना ही बंद कर देगा तो लोकतंत्र का तानाशाही में बदल जाना लाजिमी हो जायेगा.  भारत की अधिकांश मीडिया के लिए सारे सवाल मृत नेताओं और विपक्ष से हैं. सत्ता के प्रति उनका व्यामोह बताता है कि वे अपने वास्तविक कर्तव्य का पालन नहीं कर रहे हैं.

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मीडिया प्रिंट हो या विजुअल, दोनों की गहराती समस्याओं को उन समयों में देखा जा सकता है जब वे किसी असहमत विचार को जगह देने के बजाय उनकी आलोचना को ही मुख्य बना लेते हैं. सरकारें अपने जनादेश के अनुकूल कार्य करती हैं. बावजूद इसके मीडिया फैसलों को राजनीतिक, संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में खंगालता आया है. यदि पिछले कुछ समय से इस प्रवृति में बदलाव दिख रहा है, तो कहा जा सकता है कि  कि बीमारी कहीं ज्यादा गहरी होती जा रही है.

ऐसे हालात में नागरिकों का एकतरफा नजरिया बनता है, जो उन तमाम समयों में दिखा है जब लोकतंत्र तानाशाहियों में बदल गये हैं. जर्मनी का उदाहरण आज भी प्रासंगिक है. जब हिटलर को शुरू में उसके फैसलों के शुरूआती जनप्रतिरोध को देखते हुए गोयबेल्य ने इस हालत को बदलने का फैसला किया और उसने तमाम सूचना संसधानों पर पहले कब्जा किया ओर फिर मनोनुकूल नागरिकता के निर्माण का कार्य पूरा किया. यहूदियों और कम्युनिस्टों को दुश्मन साबित करने के लिए तब की मीडिया के तमाम माध्यमों को अपने अनुकूल बना लिया. बाद का इतिहास जर्मनी का वह काला इतिहास है जिसे आज का जर्मन बेहद शर्मनाक और घृणास्पद मानता है.

अमरीका में भी सिनेटर मैकार्थी ने अपने विरोधियों के लिए इसी तरह का प्रयोग किया और कुछ विरोध के बीच उसने भय का माहौल पैदा कर दिया. इतिहास के दोनों सबक बताते हैं कि मीडिया की अहमियत कितनी है. और उसकी स्वतंत्रता के बगैर लोकतंत्र लचर है. मीडिया ने भारत में भी ऐसे समूहों का निर्माण करने में बड़ी  भूमिका निभायी है जो उन्मादियों का हुजुम बन तर्कहीनता के दौर को आश्रय दिया.

और जिसमें तथ्यों को  बेमतलब साबित कर दिया जाये. यही कारण है कि ब्यूरोक्रेसी भी जिस तरह बदली है वह कम खतरनाक है. उत्तर प्रदेश का एक आइएएस समुदाय विशेष के खिलाफ ट्विट करता है, तो झारखंड की आइएएस राजेश्वरी बी का ताजा ट्विट बताता है किस तरह ब्यूरेक्रेसी ने अपनी निष्पक्षता को दरकिनार कर दिया है. तमाम धार्मिक प्रतीकों का इतना नंगा समर्थन एक प्रशासनिक अधिकारी का ही मामला है. वह एक बड़ी प्रवृति बनती जा रही है.

सूचना और तथ्य डार्कनेस का यह दौर बेहद जटिल हालातों को पैदा कर रहा है. और इस के प्रति कोई भी असावधानी लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं ही है. मीडिया स्वतंत्रता की रेटिंग में भारत का लगातार पिछड़ना चिंता का विषय होना चाहिए. और मीडियाकर्मियों को गहरे आत्मपरक्षण से गुजरना चाहिये.

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