Opinion

गूंगी गुड़िया से आयरन लेडी तक इंदिरा गांधी

जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Jharkhand Rai

इंदिरा गांधी बहुआयामी व्यक्तित्व की मालिक थीं. उनके बारे में कोई एक राय बनाना काफी मुश्किल है. उनका जीवन और कृत्य काफी रोचक विरोधाभासों से भरा रहा है.

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इकलौती लाडली बेटी थी इंदू. पढ़ाई में शायद खास रूचि नहीं थी. उन्हें तो आगे चलकर भारत की सबसे शक्तिशाली और सबसे विवादास्पद प्रधानमंत्री जो बनना था. नेहरूजी ने अपने शासनकाल में ही बेटी को राजनीति में लाने की कवायद शुरू कर दी थी.  सन 1964 में नेहरू की मौत के समय इंदिरा अनुभवहीन थीं. इसलिए उस समय कांग्रेसियों ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री चुना था.शास्त्री जी के मंत्रीमंडल में इंदिरा सूचना एवं प्रसारण मंत्री रही थीं.

शास्त्री जी के निधन से इंदिरा को मिला मौका

लाल बहादुर शास्त्री जी की असामयिक और संदेहास्पद स्थिति में ताशकंद में हुई मौत के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज ने इंदिरा गांधी को पीएम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. इस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस में सबसे कद्दावर नेता नहीं थीं उनसे कई वरिष्ठ, जानकार जनाधार वाले नेता थे लेकिन केवल नेहरू की बेटी होने की वजह से उनको 1966 में पीएम पद पर बैठाया गया. इंदिरा का व्यक्तित्व भी उस समय कोई खास नहीं था. यहां तक कि वे संसद में भी चुप ही रहती थीं जिसके कारण राममनोहर लोहिया ने उन्हें गूंगी गुड़िया तक कह डाला .

Samford

1967 में हुए चुनाव में काफी सीटें गंवाने के बाद भी इंदिरा के नेतृत्ववाली कांग्रेस को बहुत मिला. इंदिरा गांधी ने धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व का विकास भी किया और कांग्रेस से अपने विरोधियों के अलग हो जाने पर पार्टी पर पूरी तरह अपना सिक्का स्थापित कर लिया. इंदिरा ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ाने की सफलता से लोकप्रियता हासिल की. 1971 में बांग्लादेश को स्वतंत्रत कराने को लेकर पाकिस्तान से हुए युद्ध ने इंदिरा गांधी को भारत की सबसे लोकप्रिय नेता बना दिया था. लेकिन इंदिरा का स्वभाव निरंकुश शासनवाला रहा है. इसलिए उन्होंने विपक्षी दलों द्वारा शासित कई राज्यों में बेवजह राष्ट्रपति शासन लागू करने की गलत परंपरा शुरू करने की गुस्ताखी की थी.

लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष के. कामराज इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में निर्णायक रहे. पीएम बनने के बाद उनके कुछ काम काफी पसंद किए गए. बैंकोंं के राष्ट्रीयकरण तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की. भारत का परमाणु कार्यक्रम भी इनके ही काल में परवान चढ़ा.

महज नारा ही रह गया गरीबी हटाओ

गरीबी हटाओ जैसा लोकप्रिय कार्यक्रम महज नारा बनकर ही रह गया. वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार 3 पारी के लिए इंदिरा गांधी भारत गणराज्य की प्रधानमन्त्री रहीं. पर गरीबों की संख्या में उल्लेखनीय कमी नहीं ला सकीं.

बंग्लादेश युद्ध से इंदिरा बनी मजबूत

पाकिस्तान जैसे दो भागों में बिखरे देश का विभाजन तो होना तय ही था. पश्चिमी पाकिस्तान के तानाशाह शासकों के अत्याचारी और अपमानजनक रवैये ने बंग्लादेश का निर्माण तय कर दिया था. शेख मुज्जीबुररहमान के आंदोलन को दबाने में अयूब खां ने निर्ममता की हदे पार कर दी थीं. इसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान से काफी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे. ऐसे में इंदिरा गांधी को कड़े कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा. भारत ने बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों का समर्थन किया. भारतीय सेना ने मोर्चा संभाला. 1971 के भारत-पाक युद्ध में आखिरकार पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी. इस युद्ध में भारत ने ऐतिहासिक जीत हासिल की और पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर होना पड़ा. बांग्लादेश युद्ध ने इंदिरा गांधी की छवि बदल दी अब वे ब्रिटेन की प्रधानमंत्री माग्रेट थैचर की तरह आयरन लेडी बन चुकी थीं.

लोकतांत्रिक इतिहास का काला पन्ना आपातकाल

निरंकुश राजतंत्र की तुलना में लोकतंत्र काफी अच्छी व्यवस्था है. यह शासन व्यवस्था को निरंकुश होने से रोकने तथा उसे ढंग से काम करने को प्रेरित करने की प्रणाली है. इस व्यवस्था में कोई सरकार अगर ढंग से काम नहीं कर रही है या कोई ऐसा निर्णय ले लिया है जो आम लोगों को एकदम पसंद नहीं हो तो ऐसे में सरकार को बदलने का हक लोगों को रहता है.  इंदिरा गांधी ने भी सत्ता नहीं छोड़ने की जिद्द में आपातकाल की घोषणा की थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला

राज नारायण (जो बार बार रायबरेली संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लड़ते और हारते रहे थे) द्वारा दायर एक चुनाव याचिका में कथित तौर पर भ्रष्टाचार आरोपों के आधार पर 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इन्दिरा गांधी के लोक सभा चुनाव को रद घोषित कर दिया. उनको लोस सीट छोड़ने तथा छह वर्षों के लिए चुनाव में भाग लेने पर प्रतिबन्ध का आदेश दिया. प्रधानमन्त्रीत्व के लिए संसद का सदस्य होना अनिवार्य है. इस प्रकार, इस निर्णय ने उन्हें प्रभावी रूप से पीएम के पद से भी मुक्त कर दिया.

आपातकाल की घोषणा

इस निर्णय से इंदिरा गांधी बौखला गईं. वे किसी भी कीमत पर पीएम पद छोड़ना नहीं चाहती थीं. इसी दौरान उनकी सलाहकार मंडली ने उन्हें आपातकाल लागू करने की खतरनाक सलाह दी. जिसे मानकर उन्होंने आनन-फानन में  26 जून 1975 को संविधान की धारा- 352 के प्रावधानानुसार आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी. इस आत्मघाती कदम ने देश को एक अप्रत्याशित स्थिति में ला दिया. नागरिकों के मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए. प्रेस की स्वतंत्रतता पर भी सेंसरशिप थोपी गई. इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी का शासन में हस्तक्षेप इतना बढ़ गया कि वो शैडो पीएम की तरह व्यवहार करने लगे. उनके अनावश्यक हस्तक्षेप से तंग आकर तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री आइके गुजराल ने इस्तीफा तक दे दिया था.

1977 की चुनाव में जनता ने दिया करारा जवाब

आपातकाल के दौरान की जाने वाली ज्यादातियों ने विपक्षी दलों को सुनहरा मौका दिया. इंदिरा गांधी की इस निरंकुशता के खिलाफ लगभग पूरा विपक्ष एकजुट हो गया. जयप्रकाश नारायण यानि जेपी के नेतृत्व में जोरदार आंदोलन चला. जनता के दबाव में करीब डेढ़ साल बाद इंदिरा को चुनाव कराने के लिए बाध्य होना पड़ा. एकजुट विपक्ष ने जनता दल बनाकर लोगों से “लोकतंत्र और तानाशाही” के बीच चुनाव करने को कहा. भारत की जनता ने भारी मत से लोकतंत्र के पक्ष में अपना जनादेश दिया. इंदिरा और संजय गांधी दोनों ने अपनी सीट खो दीं और कांग्रेस घटकर 153 सीटों में सिमट गई (पिछली लोकसभा में 350 की तुलना में) जिसमे 92 दक्षिण से थीं. यह भारत की जनता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विश्वास की ऐतिहासिक विजय थी.  इस चुनाव ने निरंकुश शासन की इच्छा करनेवालों को कड़ी चेतावनी देते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था का झंडा बुलंद किया.

एक बार फिर मिला मौका

जनता पार्टी के आंतरिक कलह  ने इंदिरा को एक और मौका दिया. इंदिरा ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी चौथी और आखिरी पारी शुरू की. 1980 से लेकर 1984 में उनकी राजनीतिक हत्या तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं. इंदिरा योग शिक्षक धीरेंद्र ब्रमचारी के साथ संबधों को लेकर भी विवादित रही.

भिंडरवाला बना भस्मासुर

इंदिरा की हत्या का कारण भी उनकी एक गहरी भूल बना था. जिस भिंडरवाला को पहले आकालियों का मुकाबला करने के  लिए उन्होंने आगे बढ़ाया था उस भस्मासुर ने ही इंदिरा को ऑपरेशन ब्लूस्टार के लिए मजबूर किया. उसके बाद उनकी हत्या की गई.

इंदिरा इज इंडिया का अहंकार

इंदिरा ने एक और नुकसान हमारे देश को पहुंचाया उन्होंने कांग्रेस में व्यक्तिपूजा को चरम पर पहुंचा दिया था. इनके एक बड़े चमचे ने तो यहां तक कह दिया इंदिरा इज इंडिया. इंदिरा ने कांग्रेस पार्टी से आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर डाला. सारे नेताओं के पर ऐसे कतरे की सभी दंडवत हो गए. इस स्थिति से कांग्रेस आज भी नहीं उबर पाई है. इसी कारण सोनिया गांधी और राहुल गांधी जैसे नाकारा और अयोग्य लोग आज भी देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में लज्जाजनक हार के बावजूद कांग्रेसियों की नींद नहीं खुली है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)

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