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बचपन में लकड़ियों का गट्ठर उठानेवाली लड़की की बदौलत टोक्यो ओलंपिक में गूंजा भारत का नाम

Newswing Desk

टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए पहला मेडल हासिल करनेवाली साईखेम मीराबाई चानू की सफलता जितनी चमकदार है, उनका संघर्ष उतना ही कठोर है. बचपन में जलावन की लकड़ियों का गट्ठर उठानेवाली चानू ने ओलंपिक मेडल तक पहुंचने में वक्त के कई थपेड़े झेले हैं. आशाओं-निराशाओं, सफलताओं-असफलताओं के कई पड़ावों से गुजरते हुए वह आज यहां पहुंची हैं.

ऐसे हुआ अपनी क्षमता का अंदाजा

चानू मणिपुर की राजधानी इम्फाल के पास स्थित नोंगपोक काकचिंग गांव की रहनेवाली है. बेहद सामान्य परिवार में जन्मी छह भाई-बहनों में सबसे छोटी चानू ने बचपन से संघर्ष किया. उसे अपनी लिफ्टिंग की ताकत का पहली बार अंदाज़ा 12 साल की उम्र में हुआ. एक बार उनसे चार साल बड़ा भाई जलाने वाली लकड़ी का गट्ठर उठाने की कोशिश कर रहा था, जो कि भारी होने की वजह से उनसे नहीं उठा. तब उन्होंने कोशिश की और इसे आसानी से उठा लिया. इसी के बाद उन्हें अपनी शक्ति का अंदाज़ा हुआ.

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बनना चाहती थीं तीरंदाज, बनीं वेटलिफ्टर

हमेशा से खेलों में दिलचस्पी रखने वाली मीराबाई चानू वेटलिफ्टिंग को चुनने से पहले करियर की शुरुआत में इंफाल के एक स्थानीय स्पोर्ट्स हॉल में तीरंदाज़ी करना सीखना चाहती थीं. लेकिन जलावन की लकड़ियों का गट्ठर उठाने की क्षमता ने उनके करियर को एक नया मोड़ दे दिया. यह खेल मानो उनके खून में था. उन्होंने भारत की सबसे सफल महिला वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी की उपलब्धियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया. लगातार मेहनत और कठिन प्रैक्टिस से जल्द ही उन्होंने राष्ट्रीय फलक पर जगह बना ली.

2014 में पहली बार इंटरनेशनल पोडियम पर पहुंचीं

स्कॉटलैंड में हुए 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में 48 किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक जीतकर मीराबाई चानू ने 20 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी. फिर रियो 2016 ओलंपिक के लिए नेशनल ट्रायल में मीराबाई चानू ने सात बार की विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता कुंजारानी देवी के 12 साल पुराने नेशनल रिकॉर्ड को तोड़ दिया. इसी के साथ उन्होंने ओलंपिक खेलों के लिए भारतीय दल में अपनी जगह पक्की की. चयन ट्रायल में जब उन्होंने कुल 192 किलोग्राम भार उठाने का यह रिकॉर्ड बनाया तो रियो ओलंपिक में पदक की उम्मीद लगाए जाने लगी. लेकिन ब्राजील में मीराबाई चानू बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं, ‘क्लीन एंड जर्क’ में उनके तीनों प्रयास असफल रहे और ‘स्नैच’ में केवल उनका एक ही प्रयास सही रहा.

असफलताओं से घबरायी नहीं

अपने नाम के स्तर का प्रदर्शन न कर पाने के बाद वह घर लौटीं, मीराबाई चानू ने इस तरह की निराशा वाली वापसी के बारे में कभी नहीं सोचा था. लेकिन इस भारतीय वेटलिफ्टर ने हमेशा अपनी शारीरिक शक्ति के साथ-साथ अपनी मानसिक स्थिति पर भी काबू पाने में सफलता हासिल की है.

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यूएसए के अनाहेम में 2017 विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में मीराबाई चानू ने दो दशकों बाद गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा किया और वह ऐसा करने वाली पहली भारतीय वेटलिफ्टर बन गयीं. सिडनी 2000 की कांस्य पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी की खिताबी जीत के बाद 1994 और 1995 के बाद 48 किग्रा वर्ग में उनका यह पहला प्रयास था. इसके बाद उन्होंने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा किया. साथ ही इस इवेंट में उन्होंने ‘स्नैच’, क्लीन एंड जर्क’ के अलावा ‘टोटल’ में भी रिकॉर्ड दर्ज किया.

पीठ में लगी गंभीर चोट ने प्रतियोगिताओं से किया बाहर

कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान ही पीठ के निचले हिस्से में लगी चोट ने चानू के शानदार सीज़न पर विराम लगा दिया.
इसकी वजह से चानू 2018 के एशियाई खेलों और विश्व चैंपियनशिप में नहीं शामिल हो पाईं, और फिर चोट से उबरने में उन्हें करीब एक साल लग गया. इसके बाद 2019 में चानू थाईलैंड में हुई विश्व चैंपियनशिप में प्रतिस्पर्धा करने के लिए वापसी की, जहां वह चौथे स्थान पर रहीं, लेकिन पटाया के इस इवेंट में उनका प्रदर्शन फिर भी यादगार बन गया, क्योंकि वह अपने करियर में पहली बार 200 किग्रा भार उठाने में सफल रहीं. और इसके बाद आया आज का दिन, जब उन्होंने भारत के लिए टोक्यो ओलंपिक में पहला पदक जीतकर इतिहास रच डाला.

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