NEWSOpinion

पैरालंपिक में भारत के कोहिनूर ! शारीरिक अक्षमता को दरकिनार कर नायाब प्रदर्शन

इमाम हाशमी

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में, वो तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले… सफलता ‘‘सर्वांग शरीर‘‘ की भी मोहताज नहीं… दिव्यांगों ने पहले भी यह साबित किया है और एक बार फिर टोक्यो पैरालंपिक में इसे स्थापित कर दिखाया है. ऐसे ही उदाहरण के रूप में हम अपने पैरालंपिक खिलाड़ियों को गिन सकते हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और निष्ठा से देश का नाम विश्व पटल पर जगमग कर दिया है. पैरालंपिक में असली जिन्दगी के महानायक खेल के मैदान पर हुनर दिखाते हैं. एथलेटिक्स में बाधा दौड़ की तरह इन महानायकों के जिन्दगी में अनेक बाधाएं आती है, जिन्हें एक-एक कर पार कर वे फिनिशिंग लाइन तक पहुंचते हैं और फिर पैरालंपिक खेलों का हिस्सा बनते हैं. हम सभी इस समय नयी उम्मीदों के सातवें आसमान पर हैं. यह पैरालंपिक भारत के लिए कई मायनों में अभी तक का सर्वश्रेष्ठ है. भारत की झोली में इस बार 5 गोल्ड सहित 19 पदक आए हैं.

इसे भी पढ़ेंःहटाये गये रूपा तिर्की व सांसद दीपक प्रकाश के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने वाले एसडीपीओ

advt

पैरालंपिक खेल दरअसल दिव्यांगों के लिए आयोजित किए जाते है. पैरालंपिक खेलों की शुरूआत द्वितीय विश्व युद्ध के घायल सैनिकों को फिर से मुख्यधारा में लाने के मकसद से हुई थी. स्पाइनल इंज्यूरी के शिकार सैनिकों को ठीक करने के लिए खास तौर इसे शुरू किया गया था. साल 1948 में द्धितीय विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल इंज्यूरी को ठीक करने के लिए स्टोक मानडेविल अस्पताल में काम कर रहे न्यूरोलोजिस्ट सर गुडविंग गुट्टमान ने इस रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए स्पोर्ट्स को चुना था. इन खेलों को तब अन्तराष्ट्रीय व्हील चेयर गेम्स का नाम दिया गया था. 1960 में रोम में अन्तराष्ट्रीय ओलंपिक संघ के अनुमति से पैरालंपिक खेलों की शुरूआत हुई. भारत प्रारम्भ से ही इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेता आ रहा है.

इसे भी पढ़ेंःनशे में धुत जवान ने फिरायालाल चौक पर किया हंगामा, वीडियो वायरल, सस्पेंड

पैरालंपिक खेल सामान्य ओलंपिक से इस मायने में विशेष माने जाते हैं कि इनमें उन्हीं खिलाड़ियों का चयन किया जाता है, जो किसी वजह से अपना अंग गवां चुके होते हैं, चाहे वह दुर्घटनावश हो या जन्मजात इन प्रतियोगिताओं में उनकी जीत को उनके मनोबल और हुनर की दृष्टी से आंकने की जरूरत होती है. ये खिलाड़ी सबसे पहले खुद से संघर्ष करके इस मनस्थिति में पहुंचते हैं कि उन्हें खेलना है. फिर वे समाज की जड़ मानसिकता से लड़ते हैं तब कहीं उन्हें अपनी प्रतिभा को निखारने और दुनिया के खिलाड़ियों के साथ स्पर्धा में खड़ा होने का अवसर मिल पाता है. पैरालंपिक में पहुंचने से पहले उन्हें खुद को तैयार करने के लिए पग-पग पर संघर्ष करना पड़ता है. यह लड़ाई एक सामान्य ओलंपिक एथलीट के मुकाबले ज्यादा कठिन और चुनौती भरी होती है. अमूमन दिव्यांगों अथवा विकलांगों को लेकर सामाज का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं होता है. उन्हें या तो सहानुभूति का पात्र समझा जाता है या फिर उपेक्षा का. जबकि कई सामान्य लोग दुघर्टनावश दिव्यांग हो जाते है तो कुछ लोग जन्मजात किसी शारीरिक या मानसिक दोष से ग्रस्त होते हैं. वास्तव में यह प्रकृति द्वारा उनके साथ किया गया मजाक ही होता है, जिसकी कीमत उन्हें आजीवन चुकानी पड़ती है. ऐसे में उन्हें निरंतर समाज के प्रोत्साहन और सहज स्वीकार की आवश्यकता होती है. मौका मिलते ही वे दिखा देते हैं कि ‘‘ हम किसी से कम नहीं.‘‘ इन खेलों की तैयारी के लिए जिस तरह के महंगे अत्याधुनिक संसाधनों की जरूरत पड़ती है, उन्हें जुटा पाना भी सबके बस की बात नहीं होती. फिर इन खेलों के लिए  खिलाड़ियों की चयन की प्रक्रिया भी कम कठिन  नहीं होती है. इसके लिए अलग-अलग बिंदु तय हैं.

 

अपने शारीरिक कमजोरियों को दृढ़ इच्छा शक्ति से पराजित कर विश्व की इतनी बड़ी स्पर्धा में भाग लेना और पदक प्राप्त करना अत्यंत उपलब्धि भरा कारनामा है. इसके लिए इन खिलाड़ियों की जितनी भी प्रशंसा की जाए उतनी कम है. जैसा की बार-बार कहा गया है, भारत में खेलों का न तो वातावरण है और न ही आधारभूत ढांचा. ऐसे में खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत पराक्रम कर यह कारनामा कर दिखाया है. निश्चित ही यह सभी खिलाड़ी बधाई और सम्मान के पात्र हैं. पैरा खिलाड़ियों ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें किसी की सहानुभूति की जरूरत नहीं है. वे अपने हौसले के बुते बुलंदी पर जा सकते हैं. उन्होंने यह भी साबित किया है, अमूमन हाशिए पर रहने वाले इन पैरालंपिकों की अदम्य इच्छाशक्ति, जिजीविषा और क्षमता को यह देश नए सिरे से सलाम कर रहा है. समाज में जिस मान-सम्मान के ये पात्र हैं उसका पूरी इमानदारी के साथ उन्हें एहसास करवाना होगा तभी जाकर समरसतापूर्ण समाज का निर्माण हो सकेगा. इन दिव्यांग प्रतिभाओं ने अपने नायाब प्रदर्शन से इस बात को साबित कर दिखाया है कि मन में दृढ़ संकल्प और दिल में कुछ कर गुजरने की ललक हो तो हर उस मुकाम को पाया जा सकता है जिसे लोग कठिन मानकर बैठ जाते हैं.

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: