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भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है नोटबंदी का गहरा नकारात्मक प्रभाव

नोटबंदी के दूसरी सालगिरह पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया से यह जाहिर होता है. मोदी सरकार नोटबंदी के मकसद पर लगातार अपने दावे से पलट जा रही है.

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Faisal Anurag

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तमाम दावों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार नोटबंदी के सवाल पर बैकफुट पर है. नोटबंदी के दूसरी सालगिरह पर मोदी सरकार की प्रतिक्रिया से यह जाहिर होता है. मोदी सरकार नोटबंदी के मकसद पर लगातार अपने दावे से पलट जा रही है. वित मंत्री जेटली ने अब नया दावा किया है कि नोटबंदी से 18 लाख ऐसे लोगों का पता चला है, जिनके पास घोषित आय से ज्यादा का धन था. लेकिन सरकार यह बताने में कामयाब नहीं है कि इन लोगों के पर क्या कार्रवाई हुयी है और  ये कौन लोग हैं.

नोटबंदी की कामयाबी को लेकर किए गए दावे में सरकार के बदलते रूख से राजनीतिक तौर पर सरकार की साख लगातार प्रभावित हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान करते हुए जिन दावों को किया था, अब केंद्र सरकार उन्हें ही दोहराने से बचती है. रिजर्व बैंक भी परोक्ष रूप से कह चुका है कि नोटबंदी विफल रही है. भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा  है. इस तथ्य को सरकार की ही कई एजेंसियां स्वीकार रही है. यह भी माना जा रहा है कि दुनिया के जिन देशों ने भी नोटबंदी का प्रयोग किया है, उनकी राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों ही प्रभावित हुई है.

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भारत में 2016 20016 की नोटबंदी को लेकर भारत के विभिन्न मेहनतकश तबकों में छाया भ्रम भी अब दूर हो गया है. खासकर बैंक घोटाले और उसके बाद की फरारी ने यह बता दिया है कि क्रोनी पूंजीपतियों के काले धंधे इससे प्रभावित नहीं हुए हैं. भारत के बैंक अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं. केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के बीच का तनाव भी बताता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के घोषित  आंकड़े और हकीकत जमीनी हकीकत में भारी फर्क है. यह फर्क तब और गहरा हो जाता है, जब विभिन्न सेक्टर के आंकड़े जीडीपी और इज ऑफ डुइंग बिजनेस के आंकड़ों से मेल नहीं खाते हैं.

यही कारण है कि केंद्र सरकार अब राजनीतिक तौर पर नोटबंदी से पैदा हुए संकट को समझते हुए इसे चुनावी मुद्दा बनाने से बच रही है. इस समय देश के पांच राज्यों में चुनाव अभियान चल रहा है. लेकिन भाजपा की कोशिश यही है कि इसमें नोटबंदी का सवाल कोई मुद्दा बनकर नहीं उभरे. भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि अब इस सवाल पर मतदाताओं को यह नहीं समझाया जा सकता है कि इस प्रक्रिया ने काले धन को समाप्त किया है. इसका एक कारण तो यह है कि नोटबंदी के पहले जितनी मुद्रा प्रचलन में थी, उससे कहीं ज्यादा मुद्र इस समय प्रचलन में है. नकली नोट का धंधा भी खत्म नहीं हुआ है और आतंकवाद को खत्म करने में यह कामयाब हुआ है. यहां तक कि नक्सलवाद भी समाप्त नहीं हो सका है. नोटबंदी का एलान करते हुए प्रधानमंत्री ने इन्हें ही इस प्रक्रिया का मकसद बताया था. केंद्र सरकार पिछले दो सालों में लगातार अपने दावे से पलटते हुए नए-नए दावे करती जा रही है. भारत के आमलोगों में इस वजह से संशय बढ़ा है.

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विपक्षी दलों ने नोटबंदी की विफलता को मुद्दा बनाते हुए इससे हुए आर्थिक और राजनीतिक नुकसान के सवाल को उठाया है. देश और दुनिया के ज्यादातर अर्थशास्त्रियों ने भी नोटबंदी के नतीजों को घातक बताया है. ऐसे हालात में राजनीतिक तौर पर भाजपा इस सवाल को उठाने से बचने लगी है. कांग्रेस लगातार इसे प्रधानमंत्री का अकेले लिया गया निर्णय बताती रही है. कांग्रेस ने अब इस सवाल को और ज्यादा तेजी से उठाते हुए आर्थिक मामलों के जानकारों की सरकार द्वारा की गयी उपेक्षा को देश की अर्थव्यवस्था के संकट का कारण बताया है. गैर राजनीतिक क्षेत्र के जानकार भी इसी से मिलीजुली बातें कर रहे हैं. पिछले दो सालों में नोटबंदी को लेकर अनेक जमीन अध्ययन हुए हैं, इसमें यह बताया गया है कि मझोले और छोटे उद्योगों पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है और दो सालों के बाद भी ये उद्योग पहले की तरह नतीजे नहीं दे पा रहे हैं. इनफॉर्मल सेक्टर के कामगारों के जीवन स्तर को लेकर किए गए कई अध्ययनों में यह स्पष्ट हुआ है कि नोटबंदी ने उसकी अर्थ प्रक्रिया को झकझोर दिया है और इनफॉर्मल सेक्टर को दोबारा खड़ा होने के लिये अनेक कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ रहा है.

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(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

 

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