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किसान ही बन सकता है भारत के विकास का इंजन

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Rajesh Das

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इंडियन काउन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के मुताबिक भारत की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा कृषि पर ही निर्भर है. भारत की आज़ादी के बाद से अब तक हालांकि कृषि पर ना केवल आबादी की निर्भरता कम हुई है बल्कि GDP में इसका योगदान भी 61% से घटकर वर्तमान में 19% पर आ गया है, और जबकि भारत को अपनी आबादी को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिए 2050 तक अपने उत्पादन को दोगुना करना  ही होगा.  वर्षा यहां सामान्य रूप से ही होती है, परंतु जल छाजन  की सुविधाओं के अभाव में वर्षा जल का पूरा लाभ यहां के किसान नहीं ले पाते हैं. दूसरे, वर्षा का पूरे साल में प्रदेश वार वितरण भी बेहद असामान्य और अनियमित है. तीसरे, यहां अभी भी ज़्यादा खेती-बारी पुरानी और अवैज्ञानिक तरीके से ही होती है.  नतीजा यहां कृषि कभी भी आय का प्रभावी माध्यम नहीं बन पाया है. चौथे, सरकारी नीतियां भी आजादी के बाद से अबतक किसानी के लिए मुनाफ़ाकारी नहीं रही है. फिर भी लोग खेती बारी में लगे हैं, ठीक है सिर्फ़ आपने खाने पीने के लिए ही फसल की कामना के साथ लोग खेती बारी में लगे हैं. ये अच्छी बात है, क्योंकि पूरे देश में उद्योगों की स्थिति भी कोई खास अच्छी नहीं है. खेती से बेहद कम उत्पादन और उद्योगों में रोज़गार की कमी की वजह से देश के कई प्रदेशों में पलायन भी अपने चरम पर है. ख़ासतौर पर झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के कई गावों में युवा वर्ग अपने गावों में नहीं मिलेंगे. पलायन दोनों ही वर्ग में हो रहा है, और यह लगातार बढ़ रहा है.

अगर सरकार चाहे तो निम्नलिखित उपायों के साथ कृषि का विकास, पलायन की रोकथाम और पर्यावरण संरक्षण एवं स्वास्थ्य समेत कई हितों को एक साथ साध सकती है और देश को एक बड़े कैनवास पर तेज़ी से उभरते विकास के नवाचारी इंजन के रूप में पेश कर सकती है-

  1. प्रयास हो कि देश की जनता के खाने पीने की मूल ज़रूरतों को मुनाफाकारी और पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए अनुकूल तरीके से देश में ही उत्पादित  किए जाने की नीति बने ताकि भारत की एक बड़ी आबादी किसानी के लिए आकर्षित हो.
  2. उत्पादन के पूर्व ही फसल की संभावित समर्थन कीमत और उत्पादित की जाने वाली वाली मात्रा तय की जाए.
  3. प्रखंड स्तर पर एक स्वावलंबी कृषि उत्पादन एवं विपणन एजेंसी बने. प्रत्येक प्रखंड के BDO साहब को ही अपने प्रखंड में प्रस्तावित कृषि उत्पादन का टारगेट दिया जाय और उत्पादन के बाद उत्पाद के रखरखाव और अग्रतर परिवहन आदि की व्यवस्था भी उन्हीं के ज़िम्मे हो. किसान को फसल कम दूरी तक लाना पड़े, इसकी व्यवस्था भी हो. साथ ही फसल उत्पादन हेतु ज़रूरी पूंजी, फसल बीमा, मशीनों और फसल उत्पाद का मूल्य किसानों को मिले इसकी पूरी और प्रभावी व्यवस्था हो. मूल भावना यह है कि “किसान कहीं से भी अकेला नहीं है”. अगर यह वर्तमान में पूरे देश में किया जाना संभव नहीं दिख रहा हो तो इसे सांसद आदर्श प्रखंड योजना के तर्ज पर लेने योग्य परियोजनाओं के रूप में भी लिया जा सकता है. सांसद महोदय, विधायकगण एवं स्थानीय पंचायत के प्रतिनिधिगण से भी आग्रह किया जाय कि प्रत्येक सांसद क्षेत्र के एक प्रखंड को प्रत्येक वर्ष इसी प्रकार वैज्ञानिक तरीके से आत्म निर्भर बनाया जाएगा, अतः वे भी इसमें अपना पूरा- पूरा योगदान दें.
  4. यदि सरकार चाहे तो निजी क्षेत्र या स्थानीय और सबसे बेहतर सामाजिक संस्थाओं, ग्रामीण विकास प्रबंधन के छात्रों को टारगेट के साथ इस प्रयास में जोड़ सकती है परंतु पूरा ज़ोर टारगेट को अच्छे ढंग से पूरा करने पर हो और ना केवल निधि को खर्च करने में. एक नवाचारी प्रयोग के रूप में ग्रामीण विकास प्रबंधन के उत्तीर्ण छात्रों को निधि समेत 10 गांव की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है.
  5. चुने गए प्रखंडों में बुनियादी सुविधाएँ (सड़क, पानी, बिजली, मशीन बैंक, क्रियाशील पूंजी बैंक आदि) तुरंत मिलें, इससे संबंधित लाभराज्य स्तर पर एक नोडल एजेन्सी बनाकर दी जाय, ना कि पुराने विभागों या BDO कार्यालय के माध्यम से इसे उपलब्ध करने की कोशिश की जाय.
  6. खेती बारी या कृषि उत्पाद प्रसंस्करण पर आधारित उद्योग, यदि कोई व्यापारी या निजी क्षेत्र की कंपनियां लगाना चाहें, तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाय. जापान के तर्ज पर उन्हें प्रॉजेक्ट बनाने में मदद किया जाय, उन्हें तुरंत निशुल्क ज़मीन दी जाए और सारे सरकारी दस्तावेज़ “ईज़ ऑफ डूयिंग बिजनेस” के आधार पर तुरंत तैयार करवाएं जाए. इस प्रकार स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिल सकेगा. उद्योग लगाने वालों को कम से कम 5 वर्षो तक हर प्रकार की टैक्स और श्रमिक क़ानूनों से छूट मिले ताकि व्यापार को लाभप्रद भी बनाया जा सके और ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस क्षेत्र में काम करने के लिए आएं.
  7. BDO साहब और प्रखंड के अन्य कर्मचारियों काओरियेंटेशन निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की तरह करना खास ज़रूरी होगा और टारगेट पूर्ण करने की स्थिति में उन्हें अच्छे किसानों के साथ इन्सेंटिव भी मिले, इसकी व्यवस्था भी हो तो बहुत ही ज्यादा अच्छा होगा.
  8. तकनीक को हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाय, एंडराय्ड या अन्य अप्लिकेशन के माध्यम से हर खेत, गाँव, अधिकारीगण और लाभूक संपर्क में रहें, इसकी व्यवस्था सबसे ज़रूरी होगी. साथ ही सरकार द्वारा प्रोत्साहित कैशलेस अर्थव्यवस्था से उस प्रखंड का हर एक व्यक्ति जुड़ जाए इस ओर भी विशेष प्रयास करने की जरूरत है.
  9. इस नवाचारी इनिशियेटिव को राज्यों के माननीय मुख्यमंत्री शुरू में यदि स्वयं नियंत्रित करें, तो ज्यादा अच्छा होगा. अगर ऐसा हो तो मैं एक नाम भी सुझाना चाहूंगा, इसे “स्वर्णिम आर्यावर्त खाद्य आत्मनिर्भर योजना” के नाम से जाना जाय तो बहुत खुशी होगी.
  10. और अंत में पूरे देश में खेती कार्य का एक ऐसा वैज्ञानिक नेटवर्क तैयार हो, जिसमें कार्पोरेट्स भी ज़मीन की उर्वरा शक्ति को संरक्षित रखते हुए और मानव स्वास्थ्य की सबसे बढ़िया अवधारणा के साथ खेती भी करें और लोगों को रोज़गार भी दें तो बहुत ही बढ़िया और शानदार उदाहरण पूरे विश्व समुदाय तक जाएगा.

पूर्ण विश्वास है कि आप मेरे सुझावों पर गौर करते हुए जरूरी संज्ञान लेने की कृपा जरूर करेंगे!!

श्रेष्ठ भारत के निर्माण के निमित्त और न्यू इंडिया की कामना सहित,

नोट- हर वर्ष 23 दिसंबर को भारत के 5वें प्रधानमंत्री आदरणीय चौधरी चरण सिंह जी के जन्मदिवस के मौके पर राष्ट्रीय किसान दिवस ऑब्जर्व किया जाता है परंतु हमारे देश को अभी केवल ऑब्जरवेशन से काफी आगे जाना है!!

यह पत्र राजेश दास की किताब “My Letters to a King named Pradhan Sevak” से लिया गया है.

इसे भी पढ़ें – मध्यप्रदेश : कर्जमाफी नहीं मिली, आदिवासी किसान ने की आत्महत्या

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