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भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट सरकार का सिरदर्द, अमीर वर्ग है जिम्मेदार!

भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) सरकार के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द हो गया है. ऐसा डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के कारण हो रहा है.

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NewDelhi : भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) सरकार के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द हो गया है. ऐसा डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के कारण हो रहा है. बता दें कि वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात से ज्यादा आयात की स्थिति चालू खाता का घाटा (CAD) मानी जाती है. हालांकि जून क्वॉर्टर में इसमें थोड़ा सा सुधार देखने को मिला. यह जीडीपी का 2.4 प्रतिशत था. पिछले साल के जून क्वॉर्टर में देखें तो यह जीडीपी का 2.5 प्रतिशत रहा था. वैसे राशि के मामले में यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में ज्यादा है. पिछले साल जून क्वॉर्टर में करंट अकाउंट डेफिसिट 15 अरब डॉलर (लगभग 1,08,360 करोड़ रुपये) था, जो इस साल जून क्वॉर्टर में बढ़कर 15.8 अरब डॉलर (लगभग 1,14,140 करोड़ ) तक पहुंच गया है.

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मौजूदा वित्त वर्ष में करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के 2.8 प्रतिशत तक पहुंच जाने की संभावना

एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट इकोरैप की मानें तो कच्चे तेल की कीमतों के बढ़ने और निर्यात में वृद्धि के कारण मौजूदा वित्त वर्ष में करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के 2.8 प्रतिशत तक पहुंच जाने की संभावना है. पीएम के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य और नैशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के डायरेक्टर रतिन रॉय के अनुसार CAD एक ढांचागत समस्या है, जिसका समाधान किया जाना जरूरी है. रतिन रॉय ने इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक इंटरव्यू में बताया कि करंट अकाउंट डेफिसिट में बढ़ोतरी के लिए वह संपन्न वर्ग जिम्मेदार है जो चारपहिया वाहनों का इस्तेमाल करता है. उच्च शिक्षा, सिविल एविएशन जैसी सेवाएं लेता है और मौजमस्ती के लिए टूर करता हैं.

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आयात बढ़ने से करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ रहा है

अपने इंटरव्यू में रॉय ने कहा कि हालांकि यह वर्ग आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है (लगभग 10 करोड़). रॉय ने कहा कि उन उपभोक्ताओं से आर्थिक विकास को गति मिलती है, जो अर्थव्यवस्था में उपभोग के मामले में शीर्ष पर हैं. कहा कि ऐसे लोगों की डिमांड पूरी करने के लिए भारत को बहुत ज्यादा आयात की जरूरत पड़ती है. और आयात बढ़ने से करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ रहा है. रॉय ने कहा कि विकासशील देश से विकसित देश बने चीन और दक्षिण कोरिया जैसे  देशों का जोर निर्यात पर रहा है. इन देशों ने अमीर देशों के उपभोक्ताओं की मांगों की सस्ते दरों पर सामानों और सेवाओं की आपूर्ति के जरिए पूर्ति कर अपना विकास किया  यह निर्यात-आधारित विकास था.

 

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