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OPINION: अमेरिका के जॉर्ज फ्लॉयड के साथ खड़े होने वाले भारतीयों को दिल्ली का फैज़ान याद होना चाहिए

Asif Asrar

अमेरिका के रहने वाले 46 वर्षीय जॉर्ज फ्लॉयड के साथ खड़े होने वाले भारतीयों को दिल्ली के कर्दमपुरी का रहने वाला 23 साल का फैज़ान भी याद होना चाहिए. क्योंकि जो अमेरिकी अश्वेत जॉर्ज के साथ हुआ वही भारतीय फैज़ान के साथ भी हुआ था.

25 मई, दिन सोमवार अमेरिका के मिनियापोलिस शहर में एक घटना घटती है. या यूं कहें तो मिनियापोलिस पुलिस द्वारा दुनिया के सबसे संपन्न लोकतंत्र कहे जाने वाले अमेरिका की ज़मीन पर एक अश्वेत व्यक्ति की कथित तौर पर हत्या कर दी जाती है.

क्या हुआ था? मिनियापोलिस पुलिस विभाग के पास एक व्यक्ति का फ़ोन जाता है. फ़ोन करने वाला पुलिस को कहता है कि उसे एक व्यक्ति पर जालसाजी करने का शक़ है. महज़ शक़. व्यक्ति द्वारा फ़ोन किये जाने के बाद पुलिस बताए हुए पते पर पहुंचती है और जॉर्ज को गिरफ्तार करने की कोशिश करती है. फिर जॉर्ज गिरफ्तारी का विरोध करते हैं. तभी डेरिक चाउविन नाम का श्वेत पुलिस अधिकारी उन्हें ज़मीन पर पटक देता है और अपने घुटने से उनके गर्दन को दबाए रखता है. यह सबकुछ करीब सात मिनट तक चला. इस बीच जॉर्ज श्वेत पुलिस वाले से कहते रहे कि मुझे छोड़ दो, मेरे पेट में दर्द हो रहा है, मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं.

लेकिन मिनियापोलिस विभाग के एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने अमेरिका के एक अश्वेत नागरिक को नहीं छोड़ा. नतीजतन यह हुआ की ज़मीन पर पड़े जॉर्ज की मौत हो गई.

यह घटना अमेरिका में श्वेत और अश्वेत के बीच सैंकड़ों सालों से चली आ रही असमानता कहानी कहता है. श्वेत और अश्वेत के बीच 400 साल से चली आ रही ग़ुलामी और भेदभाव का इतिहास जानने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट ‘प्रोजेक्ट 1691’ पढ़ सकते हैं.

इसके बाद, आसपास के लोगों ने मिनियापोलिस पुलिस द्वारा इस बर्बरता को अपने मोबाइल में क़ैद कर लिया. देखते ही देखते घटना का वीडियो वायरल हो गया और अमेरिका के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया.

जॉर्ज के समर्थन और अमरीकी पुलिस की भेदभाव से भरी इस क्रूर हरक़त को लेकर ट्विटर पर भी ट्रेंड शुरू हुआ. फ्लॉयड की मौत के बाद ट्विटर पर #BlackLivesMatter  ट्रेंड करने लगा. इस ट्रेंड में अमेरिका में अफ़्रीकन अमेरिकन पर गोरों द्वारा हमले की निंदा की गयी. इस ट्रेंड में भारतीयों ने भी भाग लिया.

इसमें कई ऐसे लोग भी अमेरिका को कोस रहे थे, जो अपने देश भारत में मुसलमानों व दलितों को भला बुरा कहने का एक मौका नहीं छोड़ते. भारत में मुसलमानों के प्रति ज़हर उगलने वाले व दक्षिणपंथी विचारों का समर्थन करने वालों का अमेरिका में अल्पसंख्यक समुदायों की हक़ की पैरोकारी करना महज़ एक दिखावा और पाखंडी हरक़त लगता है.

आपको फैज़ान याद है? जो अमेरिका में जॉर्ज के साथ हुआ वही फरवरी महीने में भारत की राजधानी दिल्ली में फैज़ान के साथ हुआ था.

दिल्ली दंगों के दौरान सामने आए एक वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी ज़मीन पर पड़े कुछ घायल युवकों से राष्ट्रगान गाने को कहते दिख रहे थे. उन्हें में एक था फैज़ान जिसकी मौत पुलिस के मार से हो गई थी.

वीडियों में पांच युवक घायल हालत में ज़मीन पर लेटे हुए थे और राष्ट्रगान गाते दिखाई दे रहे थे. उन लोगों के चारों ओर कम से कम सात पुलिस वाले थे.

उनमें से दो पुलिसकर्मी उनके चेहरे की ओर लाठी ले जाते हुए कहता है, ‘अच्छी तरह गा.’  इस वीडियो में पुलिस इन्हें बुरी तरह से पीटती दिख रही है. घटना के दो-तीन दिनों बाद 27 फरवरी को दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में मौत हो गई.

जॉर्ज फ्लायड अमेरिकी ब्लैक थे और फैजान हिंदुस्तानी मुसलमान. दोनों अपने-अपने देशों में अपनी नस्लीय और धार्मिक पहचान के चलते पूर्वाग्रहों के शिकार हुए. पुलिस की रक्षक की भूमिका, राक्षस में बदल गई. जॉर्ज और फैजान दोनों ही नस्ल और धर्म के विरुद्ध मन में जमी घृणात्मक हिंसा का शिकार हो गए.

2011 के जनगणना के मुताबिक भारत में मुसलमानों की आबादी करीब 14% है. वहीं अमेरिका में अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय की आबादी 12% है. दोनों अपने-अपने देशों में अल्पसंख्यक हैं. जिस तरह अमेरिका में गोरा होना एक प्रिविलेज है. वैसे ही अपने यहां ऊंची जाति का हिंदू होना प्रिविलेज है.

भारत के बहुसंख्यक समाज के अंदर नफरत इस कदर भर चुका है कि, महामारी के बीच भी वह जमातियों के बहाने पर पूरे समुदाय पर निशाना साधने का एक मौक़ा नहीं छोड़ रहे.

यह नफरत दक्षिणपंथी सरकार से होते हुए लोगों तक पहुंची. लोगों के बाद अब सिस्टम के भीतर जड़ें मजबूत कर चुका है. वैसे ये सिस्टम पहले से ही अल्पसंख्यक समाज के लिए क्रूर रहा है. बस मोदी सरकार के दौरान यह सब खुलेआम हो रहा है.

पुलिस की नौकरी करने वाले अधिकारियों के भीतर नस्ल और धर्म को लेकर मन में जमी घृणा का अंदाज़ा हम सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन के वक़्त पुलिस द्वारा जामिया के छात्रों को बेहरमी पिटे जाने से लगा सकते हैं.

भारतीय पुलिस के भीतर मुसलमानों के प्रति नफरत इस उबाल पर पहुंच गयी है कि वह (पुलिस अधिकारी) सिर्फ किसी के दाढ़ी रखने से उसे मुसलमान समझ लेती है और उसकी पिटाई कर देती है.

मार्च महीने में मध्यप्रदेश के बैतूल में वकील दीपक बुंदेले की पुलिस सिर्फ इस वजह से पिटाई कर थी क्योंकि पुलिसवाले को लगा कि वह मुसलमान है.

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वालो की गिरफ्तारी सिस्टम के सलेक्टिव नेचर का ताज़ातरीन उदाहरण है. यह भी जान लीजिये कि हाशिए पर पड़े समुदाय की संख्या भारतीय जेलों में सबसे अधिक है. 2018 की एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी संख्या लगभग दो तिहाई है.

फरवरी के महीने में जब फैजान की मौत पुलिस की पिटाई के तीन-चार दिनों बाद अस्पताल में हो गई थी. तब याद कीजिये सत्तारूढ़ पार्टी के गृहमंत्री से लेकर मंत्री तक भारतीय मुसलमानों के बारे में क्या कुछ कह रहे थे. गोली,  करंट, कपड़ों से पहचान, गद्दार वगैरह वगैरह.

फ्लॉयड की हत्या के बाद अमेरिका में लोग नस्लीय हिंसा के खिलाफ सड़कों पर हैं. कई जगह आगजनी की गयी. इनमें बड़ी संख्या में गोरे लोग यानि श्वेत लोग भी हैं. दो दिन पहले कैंटुकी में अश्वेत प्रदर्शनकारियों को पुलिस से बचाने के लिए व्हाइट लोगों ने एक ह्यूमन चेन बना ली.

भारत में भी यह ज़िम्मेदारी बहुसंख्यक समाज की है कि कैसे वो अपने बीच रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय को सुरक्षित महसूस कराने के साथ ही उसे अपने होने का यकीन भी दिलाता है. साथ ही जब कभी अल्पसंख्यक के प्रति कोई अन्याय हो तो उनकी आवाज़ को बुलंद करने का भार भी बहुसंख्यक समाज से आने वाले लोगों को उठाने की ज़रूरत है.

जॉर्ज हो या फैज़ान,  दोनों ही वारदात एक से महसूस होते हैं. फर्क सिर्फ विरोध करने वालों के बीच है. जो लोग अमेरिका में श्वेत पप्रिविलेज्ड को गाली दे रहे हैं, वहीं लोग खुद को भारत में ऊंची जाति बहुसंख्यक होने पर गौरवशाली मानते हैं. फ्लॉयड की हत्या पर दुखी होने वाले बहुत से भारतीय लोगों को फैजान की हत्या एक परजीवी की मौत सी लगती है.

डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं.

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