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रविंद्र नाथ टैगोर का भारतीय शिक्षा दर्शन

Amardeep Yadav

1913 में एशिया के प्रथम नोबल पुरस्कार विजेता और लगभग 2230 गीतों (अंग्रेजी और बांग्ला) के रचयिता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे.

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इनकी सबसे अधिक ख्याति साहित्य के क्षेत्र में है. भारत का ‘जन गण मन’, बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला’ श्रीलंका का ‘श्रीलंका माता’, तीनों देशों के राष्ट्रगान उन्हीं की रचना है.

भारत में समाज सुधार, राष्ट्रीय जागरण और राष्ट्रवाद की भावना के विकास के लिए उन्होंने जो कार्य किए हैं, उनके लिए इन्हें युगों युगों तक याद रखा जाएगा. गुरुदेव ने भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए बहुत कार्य किया.

1892 में उन्होंने ‘शिक्षा हेरफेर’ की रचना की जिसमें शिक्षा पद्दति के दोषों को इंगित किया और मूलभूत सुधार हेतु सुझाव भी दिये. 19वीं शताब्दी के अंत तक गुरुदेव की अनेक साहित्यिक रचनाएं और शिक्षा संबंधी लेख प्रकाशित हुए.

1901 में उन्होंने अपने शैक्षिक विचारों को मूर्तरूप देने के उद्देश्य से बोलपुर के निकट स्थापित ‘शांति निकेतन’ में ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ की स्थापना की, जिसमें आजीवन उन्होंने शांतिनिकेतन का विकास और साहित्यिक साधना किये.

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1901 से 1941 तक गुरुदेव ने शिक्षा संबंधित अद्भुत रचनाएं लिखी. टैगोर ने रूसो तथा स्पेंसर के समान शिक्षा पर कोई विशेष पुस्तक नहीं लिखी थी लेकिन उनके लेखों, साहित्यिक रचनाओं और व्याख्यानों से इनके शिक्षा के संबंध में हमें जो विचार मिले, उन्ही पर आधारित हम उनके शिक्षा का दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं.

उनकी रचनाओं में ‘शिक्षा हेरफेर (1892) के बाद विश्वविद्यालय (1911), धर्म शिक्षा (1912), शिक्षा विधि (1912), स्त्री शिक्षा (1915), हाई स्कूल (1915) , विश्व भारती (1919) , श्री निकेतन (1927) , आइडियल्स आफ़ एजुकेशन (1929), शिक्षा सार कथा (1930), माई एजुकेशन मिशन (1931), टू दी स्टूडेंट्स (1935), शिक्षा और संस्कृति (1935) और गुरुकुल कांगड़ी (1941) मुख्य हैं.

गुरुदेव ने अपने समय की अंग्रेजी माध्यम से चलने वाली शिक्षा को अव्यावहारिक बताते हुए मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने पर बल दिया था.

1906 में उन्होंने “शिक्षा की समस्याएं” विषय पर अपने एक संबोधन में स्कूलों को शिक्षा की फैक्ट्री का दर्जा देते हुए कहा कि फैक्टरियों में किताबी ज्ञान और तोता प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता हैं जबकि व्यवहारिक और रचनात्मक पहलू पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.

शिशिर कुमार घोष अपनी पुस्तक में लिखते हैं- “गुरुदेव एक घटना सुनाया करते थे कि भारत मे अंग्रेजी शिक्षा की अजब झूठी शान है जो इलाहाबाद के एक मेधावी छात्र ने नदी की परिभाषा तो बता दी लेकिन नदी का नाम गंगा नही बता सका जबकि गंगा का यमुना नदी से संगम इलाहाबाद में ही होता है.”

उन्होंने शिक्षा से व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामंजस्य क्षमता, सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक आदि विषयों पर जोर दिया है.

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उनका कहना था कि विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भारतीय महापुरुषों एवं दर्शन के प्रमुख विचारों को स्थान दिया जाना चाहिए और यह राष्टीयता की विचारधारा पर आधारित हो, शिक्षा का कोई भी राष्ट्रीय प्रणाली विदेशी मॉडल पर आधारित नहीं हो.

इसका तात्पर्य है जो देशवासियों के अंदर संचित मूल्यों, परंपराओं, प्रथाओ,  गौरवपूर्ण आदर्शों से स्वाभाविक रूप से विकसित कर सके, भारत को ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता है. इसके लिए बच्चों में सामाजिक संवेदना, जन कल्याण की भाव जागृति,  नैतिक आदर्शों की प्रेरणा समेत देशज परंपराओं, प्रथाओं और रीति-रिवाजों के ज्ञान के लिए उन्हें राष्ट्र की मौलिक शिक्षा देना जरूरी है.

शिक्षा से जनसाधारण की भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए जिससे मनुष्य की जन्मजात शक्तियों तथा उसके व्यक्तित्व का चतुर्मुखी विकास हो.

इसके लिए विद्यार्थियों को नगरों की भागमभाग, भीड़, कोलाहल और अशांति से दूर प्रकृति के शांत तथा एकांत वातावरण में रहना चाहिए जहां उसे प्रकृति का सानिध्य मिले, वे प्रकृति के साथ घनिष्ठ संपर्क स्थापित करे और आंतरिक आनंद की अनुभूति करें.

(लेखक भाजपा ओबीसी मोर्चा के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष हैं)

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