Opinion

दुविधाग्रस्त विपक्षी दलों के समक्ष अस्तित्व का गहराता संकट

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Faisal Anurag

झारखंड की राजनीति की त्रासदी यह बनती जा रही है कि अनेक दल एक ऐसे मनोविज्ञान के शिकार होते दिखे, जिसमें हताशा से निकलने की राह ही नहीं दिख रही है. लोकसभा चुनाव के पहले तक झारखंड में सत्तारूढ खेमा जनांदोलनों और विपक्षी दलों के गठबंधनों के दबाव में था.

चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी दलों के गठबंधन की नाकामयाबी का असर इतना गहरा है कि वे ठोस वास्तविकताओं का विश्लेषण करने में भी सक्षम नहीं दिख रहे हैं. दरअसल गठबंधन के प्रति राजनीतिक दलों का अविश्वास शुरू से ही गहरा था और चुनाव में साझा चुनाव अभियान की रणनीति तक वे नहीं बना सकें.

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इसके साथ ही गठबंधन के ही कुछ दल अपने ही गठबंधन के पराजय की ठोस रणनीति बनाते नजर आये, जिसमें किसी की भी राजनीतिक ताकत प्रभावी बन नहीं उभरे. नतीजा यह हुआ कि वोटरों के रूझान को समझने में तो नाकमयाबी ही रही. अपने वोट आधारों को रोक पाने का राजनीतिक कौशल  दिखाने में भी वे नाकामयाब रहे.

इसी का नतीजा वह त्रासदी है जिसके सामने निकलने की न तो छटपटाहट दिख रही है और न ही वे आपसी संवाद के किसी प्रक्रिया को शुरू कर पा रहे हैं. इसका परिणाम उन दलों की आंतरिक संरचना भी दिख रहा है. इन दलों के कई अवसरवादी नेता और कमजोर विचार वाले पाला बदल के अवसर की तलाश में लग गए हैं. सक्षापक्ष तो इस अवसर को अपने लिए और उपयोगी बनाने के लिए जमीनी पकड़ वाले कुछ विपक्षी नेताओं पर डोरे डाल रहा है. राजनीति में हताशा राजनीतिक मनोबल और प्रतिबद्धता के लिए खतरनाक होती है.

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यदि जमीनी हालात को देखा जाए तो अतीत के कई चुनाव इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि लोकसभा और  विधानसभा चुनावों में वोटरों का रूझान एक समान नहीं रहता है. लोकसभा चुनाव में भी ओडिशा में देखा गया कि लोकसभा में जिन क्षेत्रों में मतदाताओं की पसंद भाजपा थी, तो विधानसभा के लिए उन्होंने बिजू जनता दल को प्राथमिकता दिया. झारखंड के विपक्षी दलों का मनोबल वोट शेयर ने बहुत तोडा है.

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पहली बार भाजपा ने झारखंड में 55 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किया है और इससे विपक्षी दलों को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि राज्य सरकार की नाकामयाबियों के बाद भी वोटरों ने उन्हें इस तरह नजरअंदाज क्यों किया.

झारखंड के अनेक सवाल रहे हैं, जिन्हें विपक्षी दल पांच सालों में स्वर दे ही नहीं सके. वे सड़क पर स्वत संज्ञान लेते नजर ही नहीं आये. सवाल आर्थिक क्षेत्र का हो या सामजिक क्षेत्र का. बावजूद इसके झारखंड में अनेक आंदोलन संसाधनों पर अधिकार को लेकर हुए. टेनेंसी एक्ट के संशोधन के मामले पर विपक्षी दलों की भूमिका जरूर दिखती है, लेकिन अनेक जनसंगठनों के पीछे ही वे नजर आये.

दरअसल राजनीतिक साख का एक ऐसा संकट विपक्ष ने खुद ही तैयार किया, जो निरंतर गहराता ही गया. लोकसभा चुनाव के पहले उन्हें भरोसा था कि जनता के आंदोलनों से आक्रोश को वे अपने पक्ष में कर लेंगे. इन दलों को यह गलतफहमी भी थी कि जनता के पास उन्हें चुनने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है. वे वोटरों के मनोविज्ञान को समझने में इन कारणों से विफल रहे.

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अब जब कि भाजपा ने झारखंड में आक्रामक राजनीति की रणनीति को अंजाम देना शुरू किया है, वे हमप्रभ हैं. विपक्ष के पास नेतृत्व की साख का भी एक ऐसा संकट बन गया है, जिसे उन्होंने ही क्रिएट किया है. ऐसा लगता है कि विपक्षी दल सत्तापक्ष के एजेंडे के आसपास ठिकने का हौसला दिखाने के लिए अपनी सक्रियता भी नहीं दिखा पा रहे हैं. चुनाव में पराजय के बाद जिस तरह इन दलों ने आत्म मूल्यांकन किया है, इसमें भी गंभारता नहीं दिख रही है.

इस हताशा के बाद भी सत्तापक्ष इस बात को समझ रहा है कि, लोकसभा चुनाव के समय वोटरों के रुझान को वह बहुत देर तक टिकाए नहीं रख सकता है. उसके पास 2014 का ही अनुभव है. 2014 में उसे भारी जीत मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अकेले दम पर बहुमत नहीं पा सकी. इस बार फर्क यह है कि उसके पास पांच सालों की एक सरकार है और प्रशासन और प्रचार के तंत्र को अपने अनुकूल करने की शक्ति है.

विपक्ष अपने साझा अभियानों से भाजपा को परेशान कर सकता था, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद की निराशा उसपर इतना हावी है कि वह अपने राजनीतिक दायित्व को समझ नहीं पा रहा है. विपख के लिए अब भी बड़ी चुनौती उसे अपने वोट आधार में साख को पुख्ता कर उन्हें वापस अपने खेमे में लाने की बड़ी चुनौती है और इसे साझा अभियानों के बगैर हासिल करना संभव नहीं है.

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