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खूंटी विवाद: प्रशासनिक अक्षमता, राजनीतिक शून्यता या कुछ और…

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Pravin Kumar
Khunti: मुंडा अंचल में पत्थलगढ़ी को लेकर 2017 से ही कवायाद शुरू हो गए थे. जिसमें जमीन की हिफाजत को लेकर लैंड बैंक में दर्ज की गई जमीन के विरोध में पांचवी अनुसूची लागू करने की बात ग्रामसभा में की जाने लगी थी. वहीं संभावित विस्थापन के खिलाफ मुंडा अंचल के ग्रामीण सीएनटी आंदोलन के बाद संगठित होने लगे थे. सरकार ने इन विषयों पर समय से ध्यान न दिया जाना सरकारी मशीनरी की एक बड़ी अक्षमता के रूप में देखा जाय तो गलत नहीं होगा.
इतना ही नहीं हाल के दिनों में कई ग्राम सभाओं में जिला प्रशासन के द्वारा जमीन का सर्वे कराने की सूचना ग्रामीण अंचल से आने लगी थी. ग्रामीणों ने खूंटी जिला प्रशासन के द्वारा किए जा रहे सर्वे कार्य का विरोध भी किया था. बाद में कोचांग में हुई दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध को जिला प्रशासन ने पत्थलगड़ी से जोड़ मामले को उलझा दिया.

दुष्कर्म और पत्थलगड़ी को आपस में जोड़ा गया

भले ही पत्थलगड़ी के वर्तमान स्वरुप को लेकर आदिवासी समुदाय में भी बहस चल रही हो, लेकिन ये भी सच है कि पत्थलगड़ी मुंडाओं की सदियों पुरानी परंपरा है. वर्तमान में पत्थलगड़ी नेता ग्रामीणों को ये समझाने में कामयाब रहे कि दुष्कर्म का सहारा लेकर सरकार अपने दूसरे एजेंडे को लागू करवा रही है. इसी ने मुंडा अंचल को उग्र बना दिया और यही उग्रता पत्थलगड़ी समर्थकों द्वारा तीन जवानों के अपहरण के रूप में सामने आया. सरकार ने अपनी तरफ से ग्रामीणों से संवाद स्थापित किये बिना जवानों की रिहाई के लिए सीधे गांवों में विशेष अभियान शुरु कर दिया.डर है कि सरकार के जोर-जबरदस्ती के कारण कहीं हालात और हिंसक ना हो जाएं.

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पत्थलगड़ी समर्थकों का अतिवाद पहुंचा रहा समाज को नुकसान

हाल के दिनों में एक साथ कई घटनाएं घटी हैं. सीएनटी-एसपीटी को लेकर विवाद, स्थानीयता नीति को लेकर राजनीतिक जोर-आजमाइश, धर्म स्वतंत्रता विधेयक और अब पत्थलगड़ी. इन सब विवादों ने आदिवासी बहुल ग्रामीण अंचलों में माहौल बनाया. ये भी सच है कुछ लोगों ने उस माहौल का फायदा भी उठाया है. कभी राजनीतिक हित की खातिर तो कभी किन्ही दूसरी वजहों से. ग्रामीणों के गुस्से या यों कहें कि सरकार के साथ संवेदनहीनता ने पत्थलगड़ी समर्थकों को एक तरह से अतिवादी बना दिया है. कहीं पत्थलगड़ी सर्मथकों का अतिवाद समाज को कहीं नुकसान तो नहीं पहुंचा रहा है, इसपर पत्थलगड़ी समर्थकों को विचार करना चाहिए.

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आक्रोश का फायदा उठाकर आंदोलन खड़ा करने की कोशिश

सीएनटी संशोधन, लैंड बैंक को लेकर पहले से ही ग्रामीणों के मन में शंका थी, उपर से इलाके की बनावट ऐसी कि जिला प्रशासन अंदर के गांवों में जाने से कतराता रहा. प्रशासन की पहुंच से दूर ग्रामीणों के पास पत्थलगड़ी समर्थक पहुंच गये. विकास न होने से उपजे आक्रोश और सरकार से संवादहीनता से पैदा हुई खाई का फायदा कुछ वैसी ताकतें भी उठाने के लिए सक्रिय हुई, जिन्होंने संविधान की अपने ढंग से व्याख्या की. उनकी कहीं बातें पूरी तरह गलत भी नहीं थी, लेकिन थी अर्धसत्य. धीरे-धीरे ये पत्थलगड़ी को एक बड़ा आंदोलन का रूप देने में सफल हो गये. क्षेत्र में पूर्व से सक्रिय जनसंगठन या तो इलाके से गायब होते  या ये पत्थलगड़ी समर्थक बन गये. इसका परिणाम ये हुआ कि कई लोग पत्थलगड़ी कराने वाले नेताओं की बातों से प्रेरित हुए तो कुछ लोग मजबूरी में पत्थलगड़ी समर्थक बन गये.

पत्थलगड़ी नेता गांव-गांव में समर्थकों की टोली बना रहे हैं

पत्थलगड़ी के सबसे बड़े शीर्ष नेता भले ही बाहरी हों, लेकिन उन्होंने इलाके में दूसरी पंक्ति के नेताओं की फौज खड़ी की है. हर गांव में वे पत्थलगड़ी समर्थकों की टोली खड़ी कर रहे हैं, जिनमें महिलाएं और पढ़े-लिखे नौजवान हैं. ये पत्थलगड़ी समर्थक उनके लिए पैदल सिपाही की तरह हैं. आसपास के गांवों में उनकी रिश्तेदारी है, वे स्थानीय भाषा में बात करते हैं और इलाके से भली-भांति परिचित हैं.
दूसरी ओर सरकार क्या कर रही है. एक ओर सरकार के द्वारा कड़िया मुंडा के हाउस गार्ड को तलाश करने के लिए जगह-जगह पर छापेमारी की गयी. लेकिन गार्डों की सकुशल वापसी के लिए किसी भी तरह का कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना खूंटी जिला में राजनीतिक शुन्यता को दिखाता है. हालांकि 72 घंटे के बाद गार्डों की वापसी हो गयी.

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गार्ड वापस भी लौट आए तो समस्या बनी रहेगी

आज खूंटी के खूंटकटी इलाके में जहां पत्थलगड़ी हुई है, वहा ग्रामसभा की बैठक का दौर शुरू हो गया है. यह बैठक किस विषय में हो रही है, ये स्पष्ट नहीं हो पाया है. वहीं सरकार और जिला प्रशासन के बीच बानी खाई को पाटने के लिए संवाद की शुरूआत अब तक नहीं हो पाई है. वहीं खूंटी के राजनीतिक हालात ऐसे दिख रहे हैं मानो कई राजनीतिक दल के नेता जानबूझकर संवाद प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ने देना चाहते. आखिर क्यूं ? क्या संवाद प्रक्रिया को कायम करने में राजनीतिक दलों के स्वार्थ आड़े आ रहे हैं.

नुकसान तो ग्रामीणों का है

खूंटी में पुलिस और ग्रामीण आमने-सामने हैं. ऐसे में राजनीतिक दलों की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है.  साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा भी वर्तमान हालात से जिले को निकालने के लिए सार्थक पहल नहीं करना,  हालात को बद से बदतर बना रहा है. अभी तो यही लग रहा है कि पुलिस सुरक्षा गार्डें की बरामदगी के लिए बल प्रयोग करेगी और इसके बाद विपक्षी दल राजनीतिक प्रतिवाद करेंगे. बयानबाजी के जरिए राजनीति साधने की कोशिश होगी. इससे बेहतर ये होगा कि समय रहते ही सभी लोग मिलकर संवाद कायम करें.

खूंटी में लाठी और डंडे के बल पर शांति स्थापित करना संभव नहीं

क्या स्थानीय सांसद ,विधायक ,पंचायत के मुखिया, जिला परिषद, पंचायत समिति सदस्य, स्थानीय जनसंगठन एवं राज्य की सत्ताधारी राजनीतिक दल से लेकर गोलबंद विपक्ष की भूमिका मंगलवार को घटित घटना के बाद आम जनमानस नहीं देख रही ?
दूसरा सवाल ये है कि अगर पत्थलगड़ी समर्थकों संविधान की गलत व्याख्या कर लोगों को भड़का रहे थे तो सरकार क्या कर रही थी ? जनता के बीच सही तथ्यों को क्यों नहीं रखा गया ? इसमें कानूनविदों कि सहायता क्यों नहीं ली गयी ? सरकार ने इस  दिशा में अब तक ग्रामीणों से टकराव के अलावा क्या रास्ता अपनाया है ? और अगर सरकार ने अपना काम किया है और उसमें सफलता नहीं मिल रहा है, तो इसमें दोषी कौन है ?
क्या बिना योजना के सिर्फ लाठी और डंडे के बल पर शांति स्थापित करना संभव है ? कहीं ये संवादहीनता आने वाले समय में खूंटी को और अराजक न बना दे ? ये संवादहीनता कहीं खूंटी जिले को  पुन: माओवाद-नक्सलवाद की ओर न धकेल दे.

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