Opinion

मुस्लिम समाजः आजादी का दिन और देश में सांप्रदायिकता की फैलती गंध

Dr. Mahfooz Alam

खुशी की बात है कि हमारे देश को आजाद हुए 72 वर्ष पूरे हो गये हैं. इन 72 वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया,  इसके आकलन की जरूरत है. इन वर्षों में हमने पृथ्वी से लेकर चंद्रमा तक की यात्रा की है तो दूसरी और हमने प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत की हैं. देश में एकता और भाईचारा का माहौल बना रहा. हमारे संविधान निर्माताओं एवं हमारे नेताओं ने एक लोक कल्याणकारी एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य का स्वप्न देखा था. संविधान के निर्माण के समय उनका ध्येय था कि देश में नफ़रत का नहीं प्यार की फिजा कायम हो.

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संविधान ने देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया है, अस्पृश्यता को समाप्त किया है.  संविधान के अनुच्छेद 15  द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध किया गया है और अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया है.  मगर इतने वर्षों के बाद भी कुछ ऐसी घटनाएं सामने आ जाती हैं जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं चूक तो नहीं हुई है या कोई गलती तो नहीं हो रही है. जोमैटो की घटना हमारे सामने है.

मध्यप्रदेश के एक  व्यक्ति  ने  अपने खाने का ऑर्डर इसलिए कैंसिल कर दिया कि डिलीवरी ब्वॉय एक मुसलमान था.  इसी प्रकार एक  न्यूज़ चैनल के पैनल डिस्कशन में “ हम हिंदू”  संगठन के संस्थापक अजय गौतम कार्यक्रम के दौरान अपनी आंखों पर इसलिए  हाथ रखे रहे, क्योंकि कार्यक्रम के एंकर का नाम सउद  मोहम्मद खालिद था, जिसकी शक्ल भी वह देखना नहीं चाहते थे. इसे पूरे देश ने देखा.

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ये घटनाएं देखने में बहुत छोटी और व्यक्तिगत हैं.  मगर बहुत कुछ कहती हैं. ऐसी हरकतें  असंवैधानिक, निंदनीय एवं चिंताजनक हैं. ऐसा महसूस हो रहा है कि पिछले कुछ दिनों से सामाजिक ताना-बाना कमजोर हुआ है. विश्वास एवं भाईचारे में अद्वितीय कमी आयी है.

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आज  किसी भी परिवर्तन को एक खास राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है. एक समुदाय अपने आप को निशाना बनता हुआ महसूस कर रहा है. उदाहरण के लिए तीन तलाक कानून. यह सीधे तौर पर मुस्लिम समाज का मामला था, मगर  इसे इस तरह पेश किया गया कि यह देश की एक बड़ी समस्या है.  वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों में तलाक की दर 0•56% है जबकि हिंदुओं में यह 0• 76% है. एक बार में तीन तलाक दिये जाने पर सरकार द्वारा कोई सर्वे नहीं कराया गया है. इसे पारित होने पर जश्न ऐसे मनाया गया जैसे हमने दुश्मन देश पर फतह हासिल कर ली हो.

देश को आजाद कराने में सभी धर्म संप्रदाय और जाति के लोगों का योगदान रहा है. यदि किसी की  कुर्बानी को हम नजरअंदाज करते हैं तो यह  हमारी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचायक होगा. कर्नाटक की वर्तमान  सरकार ने  टीपू सुल्तान का जन्म उत्सव नहीं मनाने का फैसला किया है जो प्रत्येक वर्ष मनाया जाता रहा है. हालांकि टीपू सुल्तान ने आजादी की खातिर अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जान दे दी थी. उनकी जयंती मनाने  या नहीं मनाने से इतिहास बदल नहीं जायेगा,  लेकिन इससे लोगों का माइंटसेट पता चलता है.

आज प्रत्येक घटना एवं परिवर्तन पर मीडिया और सोशल मीडिया पर जो प्रतिक्रिया व्यक्त  की  जा रही है, वह और भी हास्यापद और तथ्य से परे होता है. तीन तलाक और धारा 370 पर सोशल मीडिया में जो ओछी पोस्ट आ रही है वह बीमार एवं संकीर्ण मानसिकता का द्योतक है. जो देश के लिए शुभ संकेत नहीं है. देश में चाहे जो भी सरकार हो, उसे कोई भी फैसला संविधान के दायरे में ही लेना है  ताकि संविधान का मूल ढांचा प्रभावित न हो और उसकी आत्मा जिन्दा रहे. लेकिन अभी-अभी कश्मीर के मामले में जिस तरह की प्रक्रिया अपनायी गयी है, उसने इस विश्वास को हिलाने का काम किया है.

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