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Incredible Jharkhand : आदिवासियों के खास व्यंजन के मुरीद हो रहे लोग, साल के पत्ते में बने इस देसी बिरयानी को नहीं चखा, तो क्या खाया

ABHISHEK PIYUSH

Jamshedpur : झारखंड की मुकम्मल पहचान आदिवासी समुदाय और उनकी लोक संस्कृति से है. इनकी अनूठी परंपरा, जीवन शैली, खान-पान और भाषा-संस्कृति के कारण ही देश-दुनिया में झारखंड को जाना जाता है. यहां लोक आस्था के पर्व-त्योहार पर गीत-संगीत व नृत्य के साथ-साथ आप पारंपरिक लजीज व्यंजनों का भी भरपूर आनंद उठा सकते हैं. कभी आदिवासियों के चूल्हे-चौके तक सीमित रहे ये लजीज व्यंजन अब इनके रसोई से निकलकर सड़कों की शोभा बढ़ा रहे है. दरअसल, आदिवासी भोजन की सिर्फ सामग्री में ही नहीं, बल्कि इन्हें इकट्ठा, संरक्षित और पकाने में भी आदिवासियों की रीति-रिवाज और विचारधारा झलकती है.

साल के पत्ते में पकाते व परौसते हैं लजीज देसी बिरयानी

कोल्हान प्रमंडल के पश्चिमी सिंहभूम जिला मुख्यालय स्थित चाईबासा में ‘हो’ आदिवासी समाज का खास व्यंजन ‘पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट या लड जिल्लू’ (देसी बिरयानी) का स्वाद लोगों को खूब भा रहा है. इतना ही नहीं, आदिवासी व्यंजनों की देसी महक व लाजवाब स्वाद ने लोगों को दिवाना तक बना दिया है. यह आदिवासी व्यंजनों को खास पहचान दिलाने के साथ-साथ आदिवासी युवाओं को स्वरोजगार भी दे रहा है. पश्चिमी सिंहभूम जिले में ‘हो’ जनजातीय समाज का पारंपरिक व्यंजन ‘पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट या लड जिल्लू’ (देसी बिरयानी) की चाईबासा शहर से बाहर खप्परसाई से बरकुंडिया तक दर्जनों दुकानें सजती हैं, जो काफी लोगों को रोजगार दे रहा है. पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट को गैर आदिवासी समाज देसी बिरयानी के तौर पर बड़े चाव से खाना पसंद कर रहे है.

आदिवासी व्यंजनों में साल पत्ता का खास महत्व

आदिवासी ‘हो’ समाज का खास व्यंजन ‘पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट’ (देसी बिरयानी) को पकाने में साल के पत्ता का खास महत्व है. दरअसल, पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट बनाने से लेकर परौसने तक साल पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है. सर्वप्रथम एक बड़े बर्तन में मीट (मुर्गा व बकरी) के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर उसमें सील-लोढ़ा से पीसे हुए देसी मसाले का लेप लगाया जाता है. इसके बाद भींगा हुआ चावल मीट के चारों ओर अच्छे से चार से पांच साल का पत्ता में रखकर लपेटा जाता है. इसके बाद साल के पत्तो को अच्छी तरह पतले-पतले तारों से बांध दिया जाता है. उसके बाद आग की भट्ठी में साल पत्ते में बंधे मीट को पकने के लिए डाल दिया जाता है. 15 से 20 मीनट बाद मीट के साथ चावल भी पूरी तरह पक कर तैयार हो जाता है. इसके बाद इसे साल के पत्ते में ही खाने के लिए परौसा जाता है.

लाजवाब स्वाद के साथ ही सेहत के लिए भी फायदेमंद

चाईबासा में साल के पेड़ के नीचे साल के पत्ते में पकने वाले इस खास व्यंजन को बनते देखने जितना मजेदार है, खाने में उतना ही स्वादिष्ट है. इसके साथ ही यह सेहत के लिए भी फायदेमंद है. स्थानीय लोग तो इसके मुरीद हैं ही, बाहर से आने वाले लोगों की जुबां पर भी इसका स्वाद खूब चढ़ रहा है. साल के पत्ते में बनने के साथ ही यह उसी में परोसा भी जाता है. 20 से 30 रुपये में एक पत्ता चिकन और उसके साथ चावल भी मिल जाता है.

पतपुड़ा मीट खाने में जितनी स्वादिष्ट है, उतना ही सेहत के लिए भी फायदेमंद है. पत्ता में मीट पकने के कारण पत्ता मीट का सारा तेल व मसाला सौख लेता है. जिस कारण चावल में भरपूर रूप से मीट का स्वाद मिलता है. वहीं मसालेदार खाना में चिकन-मटन का स्वाद खो जाता है. यह सेहत के लिए बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं है.

  • डॉ जगन्नाथ हेम्ब्रम, चिकित्सा पदाधिकारी, खरसवां.

आदिवासी विधि-विधान से जुड़ा है साल पत्ते का महत्व

साल का पत्ता आदिवासी ‘हो’ समाज के विधि-विधान से जुड़ा हुआ है. किसी भी तरह के अच्छे काम में साल के पत्ते का इस्तेमाल आदिवासी ‘हो’ समाज के द्वारा किया जाता है. दरअसल, पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट या लड जिल्लू को आदिवासी ‘हो’ समाज के लोगों द्वारा पहले अपने पूर्वजों को अर्पित करने के लिए पकाया जाता था. जो कि पूरी तरह से शुद्ध होता था. बलि वाले मुर्गा का मांस, हल्दी, मिर्च और नमक के साथ गीले चावल को मिलाकर इसे तैयार किया जाता था. पूर्वजों को अर्पित करने के बाद इसे प्रसाद के रूप में भी खाया जाता था. आज इसे चाईबासा में आदिवासी समाज के युवाओं के द्वारा व्यावसायिक इस्तेमाल में लाया जा रहा है.

खप्परसाई से बरकुंडिया तक सजती हैं दो दर्जन दुकानें

चाईबासा शहरी क्षेत्र से बाहर खप्परसाई से लेकर बरकुंडिया तक पोड़ाम जिल्लू-पतपुड़ा मीट या लड जिल्लू (देसी बिरयानी) की लगभग दो दर्जन से अधिक दुकानें सड़क किनारे रोजाना सजती है. यह खप्परसाई, बांधसाई, सिकुरसाई, तांबों व बरकुंडिया तक करीब 25 आदिवासी परिवार के लिए आजीविका का साधन बना है. चाईबासा के सिकुरसाई से लेकर बरकुंडिया तक इस व्यंजन को सड़कों के किनारे तैयार किया जाता है. इसे बनाना बहुत ही आसान है. चाईबासा में इसकी डिमांड बढ़ रही है. लोग इस व्यंजन को काफी पसंद कर रहे हैं. चाईबासा में साल के पेड़ भरे पड़े हैं. ऐसे में इसे बनाने के लिए यह मुफीद जगह है.

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