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बढ़ता तापमान, सूखते जलागार, मॉनसून अच्छा रहे तो भी नुकसान की भरपायी मुश्किल !  

Ranchi : इस साल मानसून से पूर्व तक देश के अधिकतर हिस्से भयावह गर्मी की चपेट में रहे. चैत माह के दिन जेठ की दुपहरिया की तरह तपते रहे और देश के कई इलाकों में अप्रैल महीने में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर 46 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा जो कि सामान्य से कम से कम 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहा. बता दें कि पिछले साल लू के कारण लगभग 2500 लोगों की मौत हुई, जबकि इस साल गर्म हवाओं ने सरकारी अनुमान के अनुसार अप्रैल महीने तक 370 लोगों की जान ली है. लगातार दो सालों (2014-15 और 2015-16, 2016-17 ) में सामान्य से क्रमशः 12 और 14 फीसदी कम बारिश के कारण सूखे की मार झेल चुका देश को इस साल अच़्छे मानसून की उम्मीद है.

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पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा, झारखंड में तेज गर्म हवा तथा लू का प्रकोप रहा

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इस साल 21 से 27 अप्रैल के बीच पश्चिम बंगाल, ओड़ीशा, झारखंड, बिहार, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, मराठवाड़ा, विदर्भ, तटीय आंध्रप्रदेश, रायलसीमा तथा तमिलनाडु के बहुत से इलाकों में तेज गर्म हवा तथा लू का प्रकोप रहा. इन इलाकों में सामान्य से ज्यादा तापमान दर्ज किया गया.   मौसम विज्ञानिकों के अनुसार भयावह गर्मी के लिए जिम्मेदार अल निनो का असर अब कम हो रहा है और इस कारण मॉनसूनी बारिश के सामान्य से ज्यादा होने की उम्मीदें जतायी जा रही हैं, लेकिन केंद्रीय जल आयोग के आकड़ें कुछ अलग तरह की कहानी बयान कर रहे हैं.

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देश के बड़े जलागारों में पानी 79 फीसद कम हो चला है

जल आयोग के आंकड़े कहते हैं कि  देश के बड़े जलागारों में पानी 79 फीसद कम हो चला है. जल-बेसिन में पिछले दस साल के औसत से लगभग 75 प्रतिशत कम पानी है. कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि मॉनसून अच्छा रहे तो भी प्रचंड गर्मी से हुए नुकसान की भरपायी मुश्किल हो सकती है. देश के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा विद्वानों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर सूखते जलागार, कई इलाकों में पेयजल की भारी किल्लत, मरता पशुधन कुछ इलाकों में भुखमरी को लेकर मदद की अपील की है. बता दें कि अपने पत्र में विद्वानों ने ध्यान दिलाया है कि जहां किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं वहां ऊपज नहीं के बराबर हुई है और जहां सिंचाई की सुविधाएं हैं वहां भी भूजल-स्तर घट रहा है और जलागार सूख रहे हैं.

ऐसी भयावह स्थिति में भी केंद्र और राज्य सरकारों की पहल उत़्साहजनक नहीं हैं. पीएम को लिखे गये पत्र के अनुसार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने के तीन साल बाद भी केंद्र और राज्य सरकारें इसके क्रियान्वयन को लेकर बहुत उत्साहित नहीं नजर आतीं. कहा है कि इस अधिनियम को  ठीक से लागू किया जाये, तो गरीब राज्यों के 80 फीसद से ज्यादा ग्रामीण परिवारों को माह भर की अनाज की जरुरत का 50 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त हासिल हो सकता है.

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