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कॉरपोरेट घरानों का भारतीय राजनीति में बढ़ता प्रभाव

‘पूंजी ही विकास की दिशा तय करे, यह उचित नहीं’

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Faisal Anurag

कॉरपोरेट घरानों के रिश्तेत को लेकर भारतीय राजनीति में खुली बहस शुरू हो गयी है.  एक समय था, जब राजनीतिक दलों के नेता आमतौर पर पूंजी घरानों के साथ रिश्ते को छिपाते थे. तब भारत एक कल्याणकारी राज्य था. लेकिन नरेंद्र मोदी ने इस पूरे विमर्श को ही बदल दिया है. ग्लो‍बलाइजेशन ही वह समझ है जो मानती है कि पूंजी घरानों से रिश्ते ही उसे सत्ता तक पहुंचा सकते हैं. भारत की राजनीति में यह पहला अवसर है जब एक प्रधानमंत्री अपनी सरकार को गरीबों और पूंजीपतियों दोनों का हिमायती बता रहा है.

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यह विमर्श, अविश्वानस प्रस्ताव में राहुल गांधी के उस आरोप के बाद शुरु हुआ है जिसमें राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी पर 15 कॉरपोरेट घरानों को अहमियत देने और उन्हें गलत तरीके से लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया था. इस आरोप में राफेल डील का एक बड़ा मामला भी है जिसमें एक सरकारी क्षेत्र की कंपनी से छीन कर एक खास घराने के चंद दिनों पहले बनी कंपनी को ठेका दिलाने का मामला गंभीरता से उठा है.

लखनऊ में प्रधानमंत्री ने कहा कि वे खुलकर कॉरपोरेट घरानों के साथ खडे होते हैं. उन्होिने कुछ दलों पर इन्हीं  पूंजीपतियों से चारी छिपे मिलने का आरोप भी लगाया. प्रधानमंत्री ने कहा देश निर्माण में पूंजीपतियों की भी बड़ी भूमिका है.

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प्रधानमंत्री के बयान के बाद अब बहस यह हो रही है कि किस दल ने किन घराने के लोगों को महत्वन दिया है. लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन चोरी छिपे मिलता है और कौन खुले आम फोटो खिंचवाता है. जाहिर है प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी को ही अपने भाषण में जवाब दिया. कांग्रेस की ओर से उसके प्रवक्ताै ने तुंरत बयान दिया कि कांग्रेस पूंजीपतियों के खिलाफ नहीं है वह गलत तरीके से किन्ही  खास घरानों को मदद पहुंचाने के विरोध में है. प्रधानमंत्री ने  महात्मा गांधी और बिड़ला के संबंधों की भी चर्चा की.

इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस चल रही है. आमतौर पर विकास की जिस अवधारणा पर भारत की सरकारों ने पहल लिया है, उसमें विदेशी पूंजी की ही महत्ता  है. इस तरह के विमर्श में आमतौर पर इस तथ्यप को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि पूंजी का अपना चरित्र होता है और सत्ता् को गहरे तौर पर वह प्रभावित करता है. भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में नीतियों के निर्धारण में पूंजी घराने को मदद पहुंचाने की खास कोशिश की जाती है. और एक दौर आता है जब पूंजी ना केवल सत्ताम में बइे व्य क्ति का निर्धारण करने लगती है बल्कि उसे नियंत्रित भी करने लगती है.

लो‍कतंत्र के इस स्याह पहलू पर आमतौर पर विमर्श नहीं किया जाता है. अमरीका सहित अनेक देशों में वहां के सत्तालशीर्ष पर बैठने वालों को कई बार यही घराने तय करते हैं. ऐसी स्थिति बना दी जाती है कि पर्दे के पीछे से काम करने वाले पूंजी घराने सत्ता् निर्धारित कर खुलकर खेलने लगते हैं. खतरा यही है कि एक समय आता है जब वे खुद ही सत्ता् अपने हाथ में ले लेते हैं. भारत को इस परिघटना से बचने की जरूरत है, क्यों कि गरीब और पूंजीपति के हित एक नहीं हो सकते. दोनों की प्राथमिकता भी एक नहीं हो सकती है.

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भारत के लोकतंत्र की परिपक्विता रही है कि उसने अबतक इन हालातों को अपने देश में खुले आम पनपने नहीं दिया है. लेकिन मीडिया सहित इनके इरादों पर पूंजी के बढ़ते प्रभाव से लोकतंत्र की प्राथमिकताओं में बदलाव के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुनिया के अनेक देश के उदाहरण सामने है, जहां लोकतंत्र का अपहरण किस तरह कॉरपोरेट घरानों ने किया है. सेना की राजनीतिक महत्व कांक्षा और क्रोनी कैपिटल के खुले खेल और संश्रय से लोकतंत्र दुनिया में कराहता रहा है. भारत में अबतक लोकतंत्र ने इस तरह की चुनौती का सामना नहीं किया है. यह एक अच्छी  बात है लेकिन विमर्श को लोकतंत्र की परिपक्वनता के साथ आगे ले जाते हुए ही अंजाम देना चाहिए.

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2014 के चुनावों में भारत ने पहली बार पूंजी के दबाव को महसूस किया. पूंजी के खेल ने पूरी चुनाव की प्रक्रिया इतनी महंगी कर दी है कि एक आम आदमी के लिए चुनाव लड़ना और जीतना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. किसी भी लोकतंत्र के लिए यह सबसे बुरी बात है. विकास में पूंजी की भूमिका है लेकिन पूंजी ही विकास की दिशा तय करे, यह आवाम के हित में नहीं होता है.

नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी ने कॉरपोरेट विमर्श ने भारतीय राजनीति के कई गोपनीय  मुददों को भी सामने ला दिया है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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