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चिरियाबेड़ा आदिवासियों की पिटाई की घटना सुरक्षाबलों के आदिवासी विरोधी चहरे का पर्दाफाश करती है: महासभा

Ranchi: पश्चिमी सिंहभूम के चिरियाबेड़ा गांव में सीआरपीएफ जवानों ने ग्रामीणों की पीटाई की थी. 20 लोगों में से 11 बुरी तरह पीटे थे. घटना 15 जून की है. इस मामले में झारखंड जनाधिकार महासभा के बैनर तले फैक्ट फाइडिंग की गयी. टीम ने पाया कि पुलिस की ओर से दर्ज प्राथमिकी में कई तथ्यों को नजरअंदाज किया गया है. महासभा का कहना है कि चिरियाबेड़ा आदिवासियों की पिटाई की घटना सुरक्षाबलों के आदिवासी विरोधी चहरे का पर्दाफाश करती है

पीड़ितों के मुताबिक उन्होंने पुलिस को स्पष्ट रूप से बताया था कि सीआरपीएफ ने उनकी पीटाई की. प्राथमिकी में उल्लेख किया गया है कि पीड़ितों को अज्ञात अपराधियों द्वारा पीटा गया. उसमें एक बार भी सीआपीएफ का जिक्र नहीं किया गया. पुलिस ने अस्पताल में पीड़ितों पर दबाव भी दिया कि वे सीआरपीएफ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न करवाएं और हिंसा में उनकी भूमिका का उल्लेख न करें.

इस टीम में आदिवासी महिला नेटवर्क, आदिवासी अधिकार मंच, बगईचा, भूमि बचाओ समंवय मंच, कोल्हान, मानवाधिकार कानून नेटवर्क, जोहार, कोल्हान आदिवासी युवा स्टार एकता, हमारी भूमि हमारा जीवन आदि के प्रतिनिधि शामिल हुए.

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घर की मरम्मत के दौरान जवान पहुंचे गांव

टीम ने पाया कि गांव में बोंज सुरीन नाम के ग्रामीण की झोपड़ी की मरम्मत की जा रही थी. जिसमें लगभग बीस ग्रामीण लगे थे. इसी दौरान सीआरपीएफ जवान गांव पहुंचे. जिनकी संख्या लगभग 200 के करीब थी. सीआरपीएफ ने ग्रामीणों को हिंदी भाषा में नीचे आने कहा, जबकि ग्रामीण हिंदी नहीं समझते थे. इस दौरान ग्रामीणों से नक्सलियों के ठीकाने की जानकारी मांगी गयी.

जानकारी नहीं होने पर सीआरपीएफ ने ग्रामीणों की पीटाई की. टीम ने पाया की सीआरपीएफ की इस छापेमारी के दौरान ग्रामीणों के घरों को बुरी तरह से तहस-नहस किया गया. यहां तक की उनके राशन तक को फेंक दिया गया. वहीं अखबारों में खबर छपी कि नक्सलियों ने घटना को अंजाम दिया न की सीआरपीएफ ने. यह दर्शाता है कि सीआरपीएफ को बचाने की कोशिश की जा रही है.

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ये मांग की गयी

  • घटना में शामिल सीआरपीएफ जवानों का नाम दर्ज किया जाए.
  • न्यायिक जांच का गठन करते हुए रिपोर्ट समय पर सार्वजनिक की जाए.
  • पीड़ितों को मुआवजा दिया जाए.
  • चिरियाबेड़ा गांव में लोगों के वनाधिकार के लंबित आवेदनों को तुरंत स्वीकृत की जाए.
  • प्रशासन को निर्देश दिया जाए कि ग्रामीणों के अधिकारों को हनन न करें. इसके साथ ही अन्य कई मांगे की गयी हैं.

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