Opinion

…इस मायने में अहम है राहुल का प्रवासी श्रमिकों से वार्तालाप का यह वीडियो

Faisal Anurag  

राहुल गांधी ने एक मार्मिक वीडियो यूट्यूब और ट्वीटर पर अपलोड कर एक साथ मीडिया और केंद्र सरकार, दोनों पर निशाना साधा है. राजनीतिक इतिहास का यह एक ऐसा वीडियो है जिसके न केवल राजनीतिक संदेश मुखर हैं बल्कि हाशिये पर धकेल दिये गये मजूदरों के सवाल के लिए भी महत्वपूर्ण है. जिसे मीडिया का बड़ा हिस्सा नजरअंदाज करता रहा है.

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इससे पहले राहुल गांधी ने अपने ट्वीट में कहा, “कुछ दिन पहले, इन मजदूर भाई-बहनों से भेंट हुई. जो हरियाणा से सैकड़ों किमी दूर यूपी के झांसी में अपने गांव पैदल ही जा रहे थे. आज सुबह 9 बजे इनके धैर्य, दृढ़ संकल्प और आत्मनिर्भरता की अविश्वसनीय कहानी मेरे YouTube चैनल पर देखिए.”

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 इस वीडियों में शुरू में राहुल गांधी पत्रकारीय भाषा में अपनी बात रखते हैं. और फिर मजूदरों से आत्मीय बातचीत करते हैं. और अंत में यह दिखाते हैं कि इन मजूदरो से बात करना ही काफी नहीं, बल्कि मदद भी जरूरी है. मजदूरो के उस जत्थे को झांसी पहुंचाने का कुछ सेकेंड का दृश्य भी दिखाते हैं.

राहुल गांधी ने जब मजदूरों से बात की थी तो भारतीय जनता पार्टी ने उस पर तीखा प्रहार किया था. यहां तक कि वित्तमंत्री निर्मला सीतरमण ने राहत पैकेज के अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में बेहद तल्खी और गुस्से से राहुल गांधी पर हमला करते हुए उन्हें ड्रामाबाज कहा था. भारतीय राजनीति का यह दौर मूल्यों के क्षरण का नजारा पेश कर रहा है.  

सरकार को न्यायसंगत ठहराने के लिए तमाम तरह के हमले किए जा रहे हैं. बस विवाद की आंच तो अभी ठंढी भी नहीं हुई है. उत्तर प्रदेश सरकार और प्रियंका गांधी का विवाद बताता है कि मजूदरों के सवालों को सत्तापक्ष किस तरह प्रस्तुत करता है. सड़क पर चलते मजदूर का सैलाब न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्यों की सरकारों के संवेदनहीनता को उजागर करता है. भारत में श्रम करने वालों के सम्मान को ले कर जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे लोकतंत्र भी शर्मिंदा है.

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दुनिया भर की मीडिया ने इन मजूदरों की बेबसी को लेकर जिस तरह का नजरिया प्रकट किया है, वह न केवल सरकार की परेशानी का सबब है, बल्कि मुख्यधारा की मीडिया को भी बेपर्दा करता है.

 मीडिया को भी यह आत्मलोचना करनी चाहिए कि उसने अपने सामूहिक कर्तव्य के निर्वाह में किस तरह की लापरवाही की है. और मजूदरों के सवाल को हल करने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के दायित्व को नहीं निभाया है. देश के राजमागों पर परेशान हाल मजूदरों का काफिला चल रहा है.

और प्राइम टाइम बहसों में उसके लिए खास जगह भी नहीं है. कोई भी लोकतांत्रिक और स्वतंत्र मीडिया इस तरह का नजरिया नहीं अपना सकता है. मीडिया ने जिस तरह अपना भरोसा खोया है वह बेहद चिंता की बात है.

 इस निराशा के दौर में मीडिया के वे लोग जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से मजूदरों की तकलीफों को दिखाया है, उनकी संख्या कम है. लेकिन लोकतंत्र के प्रहरी की उनकी भूमिका इतिहास के इस कालखंड में महत्वपूर्ण है. इस वीडियो के बाद राहुल गांधी आईटी सेल के ट्रोल के निशाने पर आ सकते हैं. लेकिन लॉकडाउन में इसे एक सार्थक हस्तक्षेप के रूप में याद रखा जाएगा.

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