Opinion

इस वैश्विक महामारी के दौर में भी अमेरिकी राष्ट्रपति की गैर मानवीय नीतियां ही सामने आ रही हैं

Faisal Anurag

डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के बाद अब अपना निशाना विश्व स्वस्थ्य संगठन पर साधा है. अमेरिका की यह पुरानी रणनीति है कि वह अपनी विफलता के लिए खलनायक की तलाश करता है.

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अमेरिका के लोकतंत्रवादी लंबे समय से ट्रंप की नीतियों पर सवाल करते रहे हैं. अमेरिकी मीडिया का एक प्रभावी हिस्सा ट्रंप की विफलताओं को उजागर करता रहा है. और वह ट्रंप की कठोर आलोचना का शिकार होता आया है.

आलोचकों को भद्दे तरीके से अपमानित करने की उनकी जिद को अमरीकी आदलातों ने गंभीरता से लिया. और ट्रंप के खिलाफ कई बार कठोर टिप्पणी की. सीएनएन के जिम अकोस्टा को तो ट्रंप ने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दे कर व्हाइट हाउसे से बाहर निकलवा दिया था. जब वे एक प्रेस कांफ्रेंस में तीखे सवाल कर रहे थे. और कई सवालों का जवाब महाबली समझने वाले इस अमरीकी शासक के पास नहीं था.

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अकोस्टा पर व्हाइट हाउस में प्रवेश पर भी राक लगा दी गयी थी, जिसे अमरीकी आदालत के फैसले के बाद रद्द किया गया. वे उन चंद अमरीकी शासकों में हैं जो दुनिया के देशों को अपने से कमतर मानते हैं. वे विश्व के तानाशाह बनने का ख्वाब देखते हैं. जिसे अमेरिका के अनेक बुद्धिजीवियों ने अमरीकी ड्रिम के खिलाफ बताया है. दुनिया बदल गयी है.

और अनेक बड़ी आर्थिक शक्तियों का उभार हुआ है. इसे अमेरिका अब भी समझ नहीं पाता है. अमेरिका के वर्चस्व को बनाए रखने की प्रवृति इस मानवीय त्रासदी में भी उजागर हो रही है. अमेरिका में मरीजों की बढ़ती संख्या और मौतों के आकड़े की भयावहता अमरीकी जीवनशैली में अनेक सवालों को जन्म दे रही है.

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ट्रंप इस परिस्थिति में खुद को एक ऐसे शासक के रूप में पेश करना चाहते हैं जो कि मानव जाति को मुक्ति दिलाने आया है. ट्रंप के रणनीतिकार जान रहे हैं कि कोविड 19 ने ट्रंप की चुनावी संभावनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. पिछले चार सालों में अमेरिका में जिस तरह नस्लवाद का विस्तार हुआ है, वह एक अलग खतरा है.

ट्रंप भी सत्ता में नस्लवादी सवालों को ही उठा कर आए थे. उनके चार सालों के शासनकाल में अमेरिका में जो बेरोजगारी नियंत्रण में आ रही थी वह बेलगाम हो गयी है. और अमेरिका की शक्ति् का मिथ टूटने लगा है.

भारत जैसे देश के लिए जिस तरह की धमकी भरे शब्दों का प्रयोग ट्रंप ने किया है उसकी तीखी प्रक्रिया हुई है. अमरीकी साम्राज्यवादी चरित्र के खिलाफ भारत के संघर्ष का इतिहास नया नहीं है. 1971 में इंदिरा गांधी ने रेडियो से देश को संबोधित करते हुए जिस तरह अमेरिका के सातवें बेडे पर कड़ी प्रतिेक्रिया व्यक्त की थी, उससे तब के महाबली निक्सन और उनके सहायक किसिंजर तक तिलमिला गए थे.

और अपशब्द तक पर उतर आए थे. ऐसे अमेरिका में उसी रिपब्लिक पार्टी के ट्रंप इस दौर में अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना चाहते हैं. जिसे दुनिया के अनेक देशों ने अस्वीकार कर दिया है. अमेरिका जब किसी मामले में उलझता है, वह चीन को खलनायक बनाने लगता है. शीतयुद्ध के दौर में यही खलनायक सोवियत संघ को बनाया जाता था.

शीतयुद्ध के बाद की दुनिया को समानता के आधार पर लोकतांत्रिक होने की जो बात की जा रही थी. ट्रंप सहित दुनिया के अनेक शासक उसके खिलाफ हैं.ट्रंप को पता है कि पोस्ट कोरोना के अमेरिका की अर्थव्यवस्था भयवाह होगी.

मौजूदा नीतियां उसे शायद ही नयापन दे पाए. यह नवंबर में होने वाले चुनावों में ट्रप के लिए बडी चुनौती होगी. उनके प्रतिद्धंदी बर्नी सैंडर्स ट्रंप की नीतियों के कठोर आलोचक हैं. उन्होने अमरीकी युवाओं का भारी समर्थन हासिल किया है.

इन सवालों ने ट्रंप को बदहवास कर दिया है. लेकिन WHO के लिए जिस तिक्तता और धमकी का इस्तेमाल किया गया है, आज के संकट के दौर में बेहद गंभीर मामला है. क्योंकि अमेरिका के सीनेटर भी ट्रंप  के स्वर में स्वर मिला रहे हैं. दुनिया भर में WHO एक बड़ी भूमिका निभा रहा है. वैसे समय में उस की दी जाने वाली अमीरीकी मदद को रोकने का मामला अमानवीय है. यही नहीं उस पर चीन का पक्ष लेने और उस पर ज्यादा ध्यान देने का आरोप बेहद चिंताजनक है.

इस समय दुनिया के 200 देश इस महामारी के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. ऐसे वक्त में ट्रंप जिस तरह केवल अमरीकी हितों की बात बार-बार उठा रहे हैं, यह अतीत के उन सवालों को रू-ब-रू कर देता है जो दुनिया की अनेक त्रासदियों के कारक रहे हैं. इस दोर में परस्पर सहयोग की जो कूटनीति का अभाव दिखा रहा है वह दुनिया के लिए बड़ी चिंता की बात है.

जिन देशों को अपनी मेडिकल विशोषताओं से दुनिया को मदद करना चाहिए, उसने जिस तरह का स्वार्थी रुख प्रदर्शित किया है, वह दुनिया के संदर्भ को नए तरीके से सोचने का अवसर भी देता है.

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यह सच है कि अमीरीका WHO को बड़ा अनुदान देता है. लेकिन यह एक स्वतंत्र इकाई है, जो दूसरे महायुद्ध के बाद के अनेक वैश्विक समझौतों के बाद अस्तित्व में आया था. दुनिया के वे देश जिनके संसाधनों की लूट के बल पर ही महाशक्तियों की ताकत उभरी है, को इस समय इस  संस्था की मदद और विशेषज्ञता की खासी जरूरत है. अमेरिका के मित्र देशों को भी अपने बल पर इस जंग के खिलाफ खड़ा होना पड़ा है.

एक तरफ क्यूबा अपने 60 हजार चिकित्साकर्मियों को दुनिया के अनेक देशों में भेज कर फ्रंटलाइन मदद कर रहा है, वहीं अमेरिका चीन के खिलाफ तमाम आरोपों की राजनीति करते हुए इसका शिकार WHO  को बना रहा है. चीन ने तो वुहान से लॉकडाउन खत्म कर जीवन को पटरी पर सामान्य कर दिखाया है. और मेडिकल सामग्री और विशेषज्ञता दुनिया के अनेक देशों को भेज रहा है, जिसमें अमेरिका भी है.

राजनीतिक वर्चस्व दिखाने का यह दौर नहीं है. ट्रंप को इस तथ्य को गंभीरता से समझना चाहिए और अपनी दादागिरी वाली भूमिका को खत्म करनी चाहिए. उसे समझना चाहिए कि यह शीतयुद्ध का दौर नहीं है. और कई बड़ी आर्थिक ताकतें दुनिया भर में उभर रही हैं.

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